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"यादों के सहारे" वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे चाहे आँसू आँखों के दोनों किनारे काट लेंगे अपनी अपनी बात है होगा कहीं वो भी अकेले याद करता हो कहीं यूँँ ही अकेली रातों में भी पर ये मेरा ही भरम है वो बहुत ख़ुश हो कहीं पे और हो तो बात अच्छी है कि सबकी ज़िंदगी है अपना क्या है यार तन्हाई बहारें काट लेंगे ख़ूब-सूरत होश वाले सब इशारे काट लेंगे होंठों पे मुस्कान ले के सब शरारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

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उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस के सारे आँसू गंगा जल में बदल रहे थे उस दिन उस के होंठ गुलाबी नीलकमल में बदल रहे थे उस दिन आँखों के सपने काले बादल में बदल रहे थे उस दिन हम दोनों के निर्णय अंतिम पल में बदल रहे थे उस दिन कुछ पाने की आशा नहीं मगर सब कुछ खोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस की दो आँखों में अनबोये बबूल उग आए उस दिन आँखें पछतातीं थीं क्यूँ सपने फिजूल उग आए उस दिन दोनों के चेहरों पर चारों तरफ़ शूल उग आए उस दिन जहाँ गिरे थे आँसू फौरन वहाँ फूल उग आए उस दिन पता चला था हम को फूल नहीं आँसू बोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन दोनों हर दुविधा को कर स्वीकार लिपट कर रोए उस दिन दोनों जग से छुप कर नदिया पार लिपट कर रोए उस दिन हर-पल ख़ुश रहने वाले त्योहार लिपट कर रोए उस दिन दोनों पहले पहले अंतिम बार लिपट कर रोए उस दिन की यादों को सारे जीवन दोनों को ढोना था उस दिन हमें अलग होना था

Gyan Prakash Akul

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तुम को बताते कि उस पार क्या है निगाहों से होकर कभी दिल में जाते कलेजे पे रख सर सदा सी सुनाते वो ख़्वाबों की लोरी हक़ीक़त बनाते दु'आओं में जैसे कोई बात लाते मुझे अपने दिल की जो बातें बताती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है छुपा के जो रक्खे थे लफ़्ज़ों में जज़्बें किए थे मिरे दिल पे तुम ने ही क़ब्ज़े तेरे नाम वाले सभी ख़त वहीं थे तेरे होंठ पे गीत मेरे भी बसते कभी पास आ कर अगर तुम जो पढ़ते तो तुम को बताते कि उस पार क्या है वो ख़्वाबों की रातें वो तन्हा सवेरा वो सन्नाटे जिन में था तेरा बसेरा लबों पे दुआ थी तेरे नाम वाली दुआ में थी बस रौशनी काली काली अगर एक पल को भी तुम मिलने आती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है कभी धड़कनों में जो लफ़्ज़ों को पाते कभी साँसों से शे'र मेरे बनाते तेरे होंठ खुल के अगर कुछ भी कहते दिलों में मिरे लफ़्ज़ तेरे ही रहते जो तुम मेरी ख़ामोशियों को समझते तो तुम को बताते कि उस पार क्या है हरी धार लहरों की चलके जो आती मुहब्बत के मानी तुम्हें तब बताती मेरे दिल में बजते सभी राग गाते ज़रा सा कभी तुम जो वो राग गाती नज़र से नज़र को कभी तुम मिलाती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है मुझे जो बताते अगर सब जताते तो मालूम होता कि उस पार क्या है ज़रा सा बताऊॅं कि उस पार क्या है है उस पार इक बेज़बाॅं सी कहानी जिसे पढ़ के आँखों में आ जाए पानी जिसे मैं ने ख़ुद को सुनाया हमेशा जिसे पढ़ के ख़ुद को है पाया अकेला न जाने वो इक चेहरा दिखने में प्यारा उसी के लिए है मिरे दिल में रिश्ते वही बन गए हैं मिरे दिल के हिस्से वो अश्कों की गर्मी वो नज़रों की छाया जिधर देखा मैं ने उधर उस को पाया वहाँ ख़्वाब बुनते हैं वीराने लम्हें जिसे देख धड़कन रहे सह में सह में वहाँ हर दुआ में तेरा नाम आता वहाँ हर ग़ज़ल में तू हीं मुस्कुराता वहाँ बिन तेरे कुछ भी रौशन नहीं है वहाँ तेरी बातें ही केवल सही हैं मैं हर दर्द को इक सहारा बनाता मैं तकलीफ़ों में तुझ को जीना सिखाता कभी बहते झरने किनारे जो मिलते गले से लगाता निगाहें बिछाता मुहब्बत है हम को ये तुम जान पाती इधर से निखरती उधर से सॅंवरती हँसी ख़ूब करती लगड़ती झगड़ती अगर तू कभी दिल की तह तक उतरती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है तो तुम को बताते कि उस पार क्या है

Raunak Karn

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"दिखावा अब नहीं करना" किसी अंजान पे ये जज़्बें ज़ाया' अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना कभी पागल नहीं होना कभी दिल भी नहीं देना कभी हँसते ही रहना है कभी मर मर के जीना है कभी इज़हार मत करना कभी तुम साथ मत रहना कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है किसी को दिल नहीं देना अकेला अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना कभी जो छोड़ दे कोई बहुत तकलीफ़ होती है उसी की याद में ये आँख सारी रात रोती है ज़रा ख़ुद को निखारो अब बनाओ नाम अब अपना कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है सताए तुम को कोई ख़ुद को आधा अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना हमारे पास तो घर भी नहीं है यार रहने को कोई पूछे हमारे पास क्या ही होगा कहने को कभी हम रो नहीं सकते कभी कुछ कह नहीं सकते कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है अकेले घुट के मरने का इरादा अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना किसी से कोई झूठा सच्चा वा'दा अब नहीं करना किसी को जान या अपना पराया अब नहीं करना किसी अंजान पे ये जज़्बें ज़ाया' अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना

Raunak Karn

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"दिलबर" तुम पास अब आ जाओ, दिल में मिरे आ जाओ छोड़ो न बात ये सब, तुम बस मुझे सताओ कुछ बात मैं बताऊँ, कुछ बात तुम बताओ अब तो कहो न कुछ तुम, यूँँ दूर अब न जाओ आँखों में तुम आ जाओ, साँसों में तुम आ जाओ दिलबर मिरे आ जाओ, दिलबर मिरे आ जाओ

Raunak Karn

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लाख तकलीफ़ें लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना सर्द रातों में कभी जो ख़्वाब टूटे ज़िंदगी गर जो कभी भी तुम सेे रूठे याद रखना आस का दामन न छूटे तोड़ देना पिंजरा तुम चाहे सपन का हौसला ख़ुद का ही ख़ुद से तुम बढ़ाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना पीठ पीछे कर के देखो तुम न चलना वक़्त के जैसे कभी भी तुम न ढलना कोशिशों के साथ जीना कर न मलना राग गाना तुम ख़ुशी के तब मिलन का बारिशों के बूंदों से ख़ुद को भिगाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना क़ाफ़िला होगा तिरे पीछे चलेंगे वक़्त ले कर के सभी तुझ सेे मिलेंगे दर्द सारे घाव सब के सब भरेंगे साथ ये मत छोड़ना तुम बस जतन का दिल के रिश्ते को ज़रा दिल से निभाना नाम ऊँचा ख़ूब ऊँचा तुम बनाना रूठे लोगों को कभी दिल से मनाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना

Raunak Karn

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नज़्म- क्या लिखूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को शाम, तुम को रात, तुम को चाँद, तुम को राह, तुम को चाह, तुम को शाह, तुम को बाह, तुम को नाह, बोलो मैं लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें जीवन लिखूँ अपना या फिर लोबान मैं लिख दूँ लिखूँ महफ़िल तुम्हें अपना या फिर सुनसान मैं लिख दूँ लिखूँ दिलबर तुम्हें अपना या फिर मेहमान मैं लिख दूँ लिखूँ आँसू तुम्हें अपना या फिर मुस्कान मैं लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को तुम्हें नादान, या अंजान या साथी, या लिख दूँ राह का रहबर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को धूप सूरज सा या शामों सा सुकूँ लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मैं अपना दिल मैं अपनी जान या धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को क़लम लिख दूँ किताबें भी लिखूँ तुम को नयन की मैं चमक या फूल की धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को लिखूँ तुम को मैं ठंडी रात का चादर या लिख दूँ नींद का बिस्तर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें झुमका, तुम्हें आँचल, तुम्हें धड़कन तुम्हें चाँदी, तुम्हें सोना, तुम्हें हीरा तुम्हें पायल, तुम्हें कोमल, तुम्हें मूरत तुम्हें पीतल, तुम्हें जल थल, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर

Raunak Karn

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