nazmKuch Alfaaz

मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे मलूल ओ मुज़्महिल चेहरा पे ठंडी चाँदनी का अक्स मत ढूँडो मिरा बे-रंग-ओ-बू चेहरा जमी है अन-गिनत फ़ाक़ों की जिस पर धूल बरसों से ज़मीं के चंद फ़िरऔनों को अपनी ख़शमगीं नज़रों से तकता है मिरे अज्दाद भी मेरी तरह भूके थे लेकिन मुझ में और उन में ज़मीन-ओ-आसमाँ का फ़र्क़ है शायद वो अपनी भूक को तक़दीर का लिक्खा समझते थे क़नाअ'त उन का तकिया था तवक्कुल उन का शेवा था मगर मैं ऐसी हर झूटी तसल्ली का मुख़ालिफ़ हूँ मुक़द्दर के अँधेरों में नहीं मेरा यक़ीं है रौशनी-ए-सुब्ह-ए-फ़र्दा में मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे लबों पर नाला-ओ-फ़रियाद की लय के एवज़ इक आग है तेवर में ग़ुस्सा है ये वो ग़ुस्सा है जिस से मेरा दुश्मन थरथराता है

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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ये इडेन गार्डेन हमदम निगाह-ओ-दिल की जन्नत है यहाँ हव्वा की रंगीं बेटियाँ हर शाम आती हैं जवाँ मर्दों को अपनी जाज़बिय्यत से लुभाती हैं दिलों को शर्मगीं नज़रों से पैहम गुदगुदाती हैं सुहागन है तो उस की माँग में झूमर चमकता है कुँवारी है तो उस के जिस्म से ख़ुशबू निकलती है गुलाबी मध-भरी आँखों से इक मस्ती उबलती है वो मस्ती जो दिलों के साग़र-ए-रंगीं में ढलती है कहीं जोड़े में कोई फूल गूँधे कोई लट खोले फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-हुगली में रंग-ओ-नूर भरती है भरे मज में' में अपने हुस्न का एलान करती है तमाशा देखने वालों की रूहों में उतरती है सुनहरी बालियाँ शोख़ी से रुख़्सारों को तकती हैं खनकती चूड़ियाँ गीतों की मीठी धुन सुनाती हैं जबीं पर नन्ही नन्ही कहकशाएँ जगमगाती हैं हिनाई उँगलियाँ लहरा के साजन को बुलाती हैं ये बंगाली हसीनाओं की जल्वा-गाह है हमदम यहाँ पीर-ओ-जवाँ आ कर मता-ए-दिल लुटाते हैं जुनूँ-अंगेज़ लै में नर्म-ओ-शीरीं गीत गाते हैं निगाहों में निगाहें डालते हैं मुस्कुराते हैं ठहर ऐ जज़्बा-ए-बे-ताब इसी रंगीन दुनिया में लबों की सुर्ख़ मय से दिल के ख़ाली जाम को भर लें शमीम-ए-ज़ुल्फ़ से बे-रब्त साँसें अम्बरीं कर लें जवानी के बहार-आगीं गुलिस्ताँ में क़दम धर लें

Owais Ahmad Dauran

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तेरे भी दिल में हूक सी उट्ठे ख़ुदा करे तू भी हमारी याद में तड़पे ख़ुदा करे मजरूह हो बला से तिरे हुस्न का ग़ुरूर पर तुझ को चश्म-ए-शौक़ न देखे ख़ुदा करे खो जाएँ तेरे हुस्न की रानाइयाँ तमाम तेरी अदा किसी को न भाए ख़ुदा करे मेरी ही तरह कश्ती-ए-दिल हो तिरी तबाह तूफ़ान इतने ज़ोर का उट्ठे ख़ुदा करे राहों के पेच-ओ-ख़म में रहे ता-हयात गुम मंज़िल तिरे क़रीब न आए ख़ुदा करे ज़ुल्मत हो तू हो और तिरी रहगुज़ार हो दुनिया में तेरी सुब्ह न फूटे ख़ुदा करे तुझ पर नशात-ओ-ऐश की रातें हराम हों मर जाएँ तेरे साज़ के नग़्में ख़ुदा करे आएँ न तेरे बाग़ में झोंके नसीम के तेरा गुल-ए-शबाब न महके ख़ुदा करे हर लम्हा तेरी रूह को इक बे-कली सी हो और बे-कली में नींद न आए ख़ुदा करे हो तेरे दिल में मेरी ख़लिश मेरी आरज़ू मेरे बग़ैर चैन न आए ख़ुदा करे तू जा रही है बज़्म-ए-तरब में तो ख़ैर जा पर तेरा जी वहाँ भी न बहले ख़ुदा करे अल-मुख़्तसर हों जितने सितम तुझ पे टूट जाएँ लेकिन ये रब्त-ए-ज़ीस्त न टूटे ख़ुदा करे जो कुछ मैं कह गया हूँ जुनूँ में वो सब ग़लत तुझ पर कोई भी आँच न आए ख़ुदा करे तू है मता-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र बे-वफ़ा सही है रौशनी-ए-दाग़-ए-जिगर बे-वफ़ा सही

Owais Ahmad Dauran

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अक़ल्लीयत कहीं की हो तह-ए-ख़ंजर ही रहती है हलाकत-ख़ेज़ हाथों के हज़ारों जब्र सहती है ख़स-ओ-ख़ाशाक की मानिंद सैल-ए-ग़म में बहती है न कोई ख़्वाब आँखों में न दिल में आसरा कोई न जू-ए-ख़ूँ से बचने का नज़र में रास्ता कोई न मुस्तक़बिल की आवाज़ें न मंज़िल की सदा कोई ख़ुद अपनी ही फ़ज़ा में ख़ौफ़ का एहसास हर लम्हा अदम-महफ़ूज़ियत का दूर तक ग़मनाक सन्नाटा सुहानी हो के भी बे-रौनक़-ओ-बे-कैफ़ सी दुनिया हक़ारत की नज़र नफ़रत की चिंगारी तआक़ुब में मुसीबत आगे आगे ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी तआक़ुब में जिधर जाए वहीं तूफ़ान-ए-बे-ज़ारी तआक़ुब में ज़बाँ मातूब तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त दार की ज़द में घर आँगन इज़्ज़त-ओ-नामूस कुल तलवार की ज़द में लबों की मुस्कुराहट आतिशीं यलग़ार की ज़द में अक़ल्लीयत जहाँ भी है यही उस का मुक़द्दर है ये ज़ख़्मी बे-अमाँ मख़्लूक़ हर सू ज़ेर-ए-ख़ंजर है बता ऐ दिल ये ग़म की रात है या रोज़-ए-महशर है

Owais Ahmad Dauran

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दुबला पतला नाज़ुक 'दौराँ' शीशा जैसा नाज़ुक 'दौराँ' ग़म की काली रात का मारा अपने ही जज़्बात का मारा आठों पहर यूँँ खोया खोया जैसे गहरी सोच में डूबा कम हँसना आदत में दाख़िल ख़ामोशी फ़ितरत में दाख़िल शम्अ'' की सूरत बज़्म में जलना गाह भड़कना गाह पिघलना माथे पर हर वक़्त शिकन सी चेहरा पर आज़ुर्दा थकन सी चेहरे से महरूमी ज़ाहिर मासूमी मज़लूमी ज़ाहिर आँखें हर दम उमडी उमडी पलकें हर दम भीगी भीगी कर्ब आँखों में दर्द आँखों में राह-ए-वफ़ा की गर्द आँखों में सहमा सहमा शाम-ए-बला से रूठा रूठा अपने ख़ुदा से अक़्ल-ओ-ख़िरद से जी को चुराए पागल-पन से बाज़ न आए जाने दिल में किस की लगन है रूह में किस काँटे की चुभन है ये है अपना 'दौराँ' यारो उलझा सुलझा 'दौराँ' यारो लेकिन यारो यही मुसाफ़िर राह-ए-वफ़ा का दुखी मुसाफ़िर शानों पर इक बोझ को लादे राह-ए-तलब में आगे आगे दिल में इक मज़बूत इरादा नज़रों में इक रौशन जादा ग़म की लंबी रात पे भारी ज़ुल्म का और ज़ुल्मत का शिकारी इंसानी तहज़ीब का क़ाइल दुनिया की ता'मीर पे माइल सई-ए-पैहम उस की तमन्ना जगमग जगमग उस का रस्ता उस की सारी फ़िक्र-ए-परेशाँ इंसानी तंज़ीम की ख़्वाहाँ नज़्में उस की जान-ए-मक़ासिद रूह-ए-तमद्दुन शान-ए-मक़ासिद सुब्ह पे शैदा शाम पे आशिक़ अपने वतन के नाम पे आशिक़ बातें रैब-ओ-रिया से ख़ाली हर नक़्श-ए-किरदार मिसाली प्यार इंसाँ का दिल में छुपाए दर्द-ए-जहाँ सीने में बसाए 'दौराँ' है या रूह-ए-'दौराँ' गिर्यां गिर्यां ख़ंदाँ ख़ंदाँ इस की दुनिया अपनी दुनिया इस दुनिया में सारी दुनिया

Owais Ahmad Dauran

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सहेली यूँँ तो कुछ कुछ साँवले से हैं मिरे साजन मगर तेरी क़सम बेहद रसीले हैं मिरे साजन जो मैं कहती हूँ उस को मुस्कुरा कर मान जाते हैं बहुत प्यारे बड़े ही भोले-भाले हैं मिरे साजन मैं उन से प्रेम करती हूँ भला मैं क्या बताऊँगी सखी तू बोल तुझ को कैसे लगते हैं मिरे साजन ब-ज़ाहिर वो दिखाई देते हैं मासूम दुनिया को मगर अंदर से मस्ताने रंगीले हैं मिरे साजन नहा धो कर मैं अपनी माँग जब सिंदूर से भरती हूँ तो जाने ज़ेर-ए-लब क्यूँँ मुस्कुराते हैं मिरे साजन खुले बालों की ख़ुशबू दिल को मतवाला बनाती है मिरा जूड़ा ये कह कर खोल देते हैं मिरे साजन छुपा लेती हूँ चेहरा उस घड़ी मैं लाज के मारे मुझे जब सेज पर अपनी बुलाते हैं मिरे साजन न मुझ से दिल सँभलता है न आँचल ही सँभलता है सुहाने गीत क्यूँँ रातों को गाते हैं मिरे साजन मुझे परदेस से हर बार गहना ला के देते हैं सहेली मुझ से बेहद प्यार करते हैं मिरे साजन कई दिन से मुसलसल देखती हूँ उन को सपने में पपीहे सच बता क्या आने वाले हैं मिरे साजन चमकता है मिरे माथे पे झूमर आज क्यूँँ जैसे ख़ुशी का चाँद बन कर घर में आए हैं मिरे साजन सवेरे से बहुत बेचैन हूँ घबरा रही हूँ मैं सखी परदेस में क्या जाने कैसे हैं मिरे साजन कोइलया! दिल में तेरी कूक अब नश्तर चुभोती है ज़माना हो गया है मुझ से बिछड़े हैं मिरे साजन घटा फिर झूम कर सावन की आई मोर फिर बोला मिरे साजन अब आ जाओ कि झूलें बाग़ में झूला

Owais Ahmad Dauran

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