nazmKuch Alfaaz

अक़ल्लीयत कहीं की हो तह-ए-ख़ंजर ही रहती है हलाकत-ख़ेज़ हाथों के हज़ारों जब्र सहती है ख़स-ओ-ख़ाशाक की मानिंद सैल-ए-ग़म में बहती है न कोई ख़्वाब आँखों में न दिल में आसरा कोई न जू-ए-ख़ूँ से बचने का नज़र में रास्ता कोई न मुस्तक़बिल की आवाज़ें न मंज़िल की सदा कोई ख़ुद अपनी ही फ़ज़ा में ख़ौफ़ का एहसास हर लम्हा अदम-महफ़ूज़ियत का दूर तक ग़मनाक सन्नाटा सुहानी हो के भी बे-रौनक़-ओ-बे-कैफ़ सी दुनिया हक़ारत की नज़र नफ़रत की चिंगारी तआक़ुब में मुसीबत आगे आगे ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी तआक़ुब में जिधर जाए वहीं तूफ़ान-ए-बे-ज़ारी तआक़ुब में ज़बाँ मातूब तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त दार की ज़द में घर आँगन इज़्ज़त-ओ-नामूस कुल तलवार की ज़द में लबों की मुस्कुराहट आतिशीं यलग़ार की ज़द में अक़ल्लीयत जहाँ भी है यही उस का मुक़द्दर है ये ज़ख़्मी बे-अमाँ मख़्लूक़ हर सू ज़ेर-ए-ख़ंजर है बता ऐ दिल ये ग़म की रात है या रोज़-ए-महशर है

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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"अगर तुम न होती" अगर तुम न होती वबा के दिनों में तो मुझे कौन कहता है कि काढ़ा बना लो सुनो कुछ दिनों को मेरी बात मानो और ठंडी चीज़ों से ख़ुद को बचा लो बर्फ़ का ठंडा पानी जो मुँह से लगाता बताओ मुझे कौन नख़रे दिखाता भला कौन कहता है मुझे तुम सेे कोई बात करनी नहीं है जो मर्ज़ी में आए करो तुम मरो तुम मुझे मार डालो करो ख़ूब मन की अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता सुनो तुम सुनो ना मेरी जान सुन लो न रूठो तुम मुझ सेे चलो मान जाओ हमारे लिए ही तो बाग़-ए-बहिश्त से आदम और हव्वा निकाले गए हैं कभी हम मिलेंगे कभी हम बनेंगे हम इक दूजे के हाथों में हाथों को देकर इक मंज़िल चुनेंगे, उसी पर चलेंगे अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता हूँ तुम्हारी ये गहरी अंटलाटिक सी आँखों में कई टाइटैनिक दफ़न हो रहे हैं सँभालो इन्हें तुम बचा लो इन्हें तुम मुझे डूबने दो, मैं एंटिक बनूँगा अगर तुम न होती तो नज़्में ये ग़ज़लें किसे मैं सुनाता भला कौन कहता सताओ ना मुझ को रुलाओ ना मुझ को मेरी वहशतों से बचा लो ना मुझ को सुनो ना गले से लगा लो मुझ को

Anand Raj Singh

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ये इडेन गार्डेन हमदम निगाह-ओ-दिल की जन्नत है यहाँ हव्वा की रंगीं बेटियाँ हर शाम आती हैं जवाँ मर्दों को अपनी जाज़बिय्यत से लुभाती हैं दिलों को शर्मगीं नज़रों से पैहम गुदगुदाती हैं सुहागन है तो उस की माँग में झूमर चमकता है कुँवारी है तो उस के जिस्म से ख़ुशबू निकलती है गुलाबी मध-भरी आँखों से इक मस्ती उबलती है वो मस्ती जो दिलों के साग़र-ए-रंगीं में ढलती है कहीं जोड़े में कोई फूल गूँधे कोई लट खोले फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-हुगली में रंग-ओ-नूर भरती है भरे मज में' में अपने हुस्न का एलान करती है तमाशा देखने वालों की रूहों में उतरती है सुनहरी बालियाँ शोख़ी से रुख़्सारों को तकती हैं खनकती चूड़ियाँ गीतों की मीठी धुन सुनाती हैं जबीं पर नन्ही नन्ही कहकशाएँ जगमगाती हैं हिनाई उँगलियाँ लहरा के साजन को बुलाती हैं ये बंगाली हसीनाओं की जल्वा-गाह है हमदम यहाँ पीर-ओ-जवाँ आ कर मता-ए-दिल लुटाते हैं जुनूँ-अंगेज़ लै में नर्म-ओ-शीरीं गीत गाते हैं निगाहों में निगाहें डालते हैं मुस्कुराते हैं ठहर ऐ जज़्बा-ए-बे-ताब इसी रंगीन दुनिया में लबों की सुर्ख़ मय से दिल के ख़ाली जाम को भर लें शमीम-ए-ज़ुल्फ़ से बे-रब्त साँसें अम्बरीं कर लें जवानी के बहार-आगीं गुलिस्ताँ में क़दम धर लें

Owais Ahmad Dauran

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तेरे भी दिल में हूक सी उट्ठे ख़ुदा करे तू भी हमारी याद में तड़पे ख़ुदा करे मजरूह हो बला से तिरे हुस्न का ग़ुरूर पर तुझ को चश्म-ए-शौक़ न देखे ख़ुदा करे खो जाएँ तेरे हुस्न की रानाइयाँ तमाम तेरी अदा किसी को न भाए ख़ुदा करे मेरी ही तरह कश्ती-ए-दिल हो तिरी तबाह तूफ़ान इतने ज़ोर का उट्ठे ख़ुदा करे राहों के पेच-ओ-ख़म में रहे ता-हयात गुम मंज़िल तिरे क़रीब न आए ख़ुदा करे ज़ुल्मत हो तू हो और तिरी रहगुज़ार हो दुनिया में तेरी सुब्ह न फूटे ख़ुदा करे तुझ पर नशात-ओ-ऐश की रातें हराम हों मर जाएँ तेरे साज़ के नग़्में ख़ुदा करे आएँ न तेरे बाग़ में झोंके नसीम के तेरा गुल-ए-शबाब न महके ख़ुदा करे हर लम्हा तेरी रूह को इक बे-कली सी हो और बे-कली में नींद न आए ख़ुदा करे हो तेरे दिल में मेरी ख़लिश मेरी आरज़ू मेरे बग़ैर चैन न आए ख़ुदा करे तू जा रही है बज़्म-ए-तरब में तो ख़ैर जा पर तेरा जी वहाँ भी न बहले ख़ुदा करे अल-मुख़्तसर हों जितने सितम तुझ पे टूट जाएँ लेकिन ये रब्त-ए-ज़ीस्त न टूटे ख़ुदा करे जो कुछ मैं कह गया हूँ जुनूँ में वो सब ग़लत तुझ पर कोई भी आँच न आए ख़ुदा करे तू है मता-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र बे-वफ़ा सही है रौशनी-ए-दाग़-ए-जिगर बे-वफ़ा सही

Owais Ahmad Dauran

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मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे मलूल ओ मुज़्महिल चेहरा पे ठंडी चाँदनी का अक्स मत ढूँडो मिरा बे-रंग-ओ-बू चेहरा जमी है अन-गिनत फ़ाक़ों की जिस पर धूल बरसों से ज़मीं के चंद फ़िरऔनों को अपनी ख़शमगीं नज़रों से तकता है मिरे अज्दाद भी मेरी तरह भूके थे लेकिन मुझ में और उन में ज़मीन-ओ-आसमाँ का फ़र्क़ है शायद वो अपनी भूक को तक़दीर का लिक्खा समझते थे क़नाअ'त उन का तकिया था तवक्कुल उन का शेवा था मगर मैं ऐसी हर झूटी तसल्ली का मुख़ालिफ़ हूँ मुक़द्दर के अँधेरों में नहीं मेरा यक़ीं है रौशनी-ए-सुब्ह-ए-फ़र्दा में मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे लबों पर नाला-ओ-फ़रियाद की लय के एवज़ इक आग है तेवर में ग़ुस्सा है ये वो ग़ुस्सा है जिस से मेरा दुश्मन थरथराता है

Owais Ahmad Dauran

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रोने की उम्र है न सिसकने की उम्र है जाम-ए-नशात बन के छलकने की उम्र है शबनम की बूँद पी के चटकने की उम्र है गुलशन में फूल बन के महकने की उम्र है सद-मर्हबा ये गुमरही-ए-शौक़ चश्म-ओ-दिल हाँ राह-ए-आरज़ू में भटकने की उम्र है इक जुर्म है ख़याल-ओ-तसव्वुर गुनाह का ये उम्र सिर्फ़ पी के बहकने की उम्र है दीवाना बन के नज्द के सहरा में घूमिए लैला की जुस्तुजू में भटकने की उम्र है बेचैन क्यूँँ हो रूह किसी एक के लिए हर माह-वश पे जान छिड़कने की उम्र है इस दौर-ए-इम्बिसात में ब-हालत-ए-जुनूँ हर कू-ए-दिलबराँ में भटकने की उम्र है लाज़िम नहीं कि ख़ुद को बचाता फिरूँ तमाम शीशा हूँ चोट खा के दरकने की उम्र है तस्कीं वो दे रही हैं पर ऐ क़ल्ब-ए-ना-सुबूर तू और भी धड़क कि धड़कने की उम्र है जब चल पड़ा हूँ घर से तो मंज़िल की शर्त क्या हूँ रह-नवर्द-ए-शौक़ भटकने की उम्र है हूँ आफ़्ताब-ए-ताज़ा हुआ हूँ अभी तुलू'अ अपने जहान-ए-नौ में चमकने की उम्र है ऐवान ओ तख़्त-ओ-ताज हैं मेरी लपेट में शो'ला हूँ मैं ये मेरे भड़कने की उम्र है 'दौराँ' मैं बज़्म-ए-दोस्त में छेड़ूँ न क्यूँँ ग़ज़ल ये ज़मज़ में के दिन हैं लहकने की उम्र है

Owais Ahmad Dauran

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दुबला पतला नाज़ुक 'दौराँ' शीशा जैसा नाज़ुक 'दौराँ' ग़म की काली रात का मारा अपने ही जज़्बात का मारा आठों पहर यूँँ खोया खोया जैसे गहरी सोच में डूबा कम हँसना आदत में दाख़िल ख़ामोशी फ़ितरत में दाख़िल शम्अ'' की सूरत बज़्म में जलना गाह भड़कना गाह पिघलना माथे पर हर वक़्त शिकन सी चेहरा पर आज़ुर्दा थकन सी चेहरे से महरूमी ज़ाहिर मासूमी मज़लूमी ज़ाहिर आँखें हर दम उमडी उमडी पलकें हर दम भीगी भीगी कर्ब आँखों में दर्द आँखों में राह-ए-वफ़ा की गर्द आँखों में सहमा सहमा शाम-ए-बला से रूठा रूठा अपने ख़ुदा से अक़्ल-ओ-ख़िरद से जी को चुराए पागल-पन से बाज़ न आए जाने दिल में किस की लगन है रूह में किस काँटे की चुभन है ये है अपना 'दौराँ' यारो उलझा सुलझा 'दौराँ' यारो लेकिन यारो यही मुसाफ़िर राह-ए-वफ़ा का दुखी मुसाफ़िर शानों पर इक बोझ को लादे राह-ए-तलब में आगे आगे दिल में इक मज़बूत इरादा नज़रों में इक रौशन जादा ग़म की लंबी रात पे भारी ज़ुल्म का और ज़ुल्मत का शिकारी इंसानी तहज़ीब का क़ाइल दुनिया की ता'मीर पे माइल सई-ए-पैहम उस की तमन्ना जगमग जगमग उस का रस्ता उस की सारी फ़िक्र-ए-परेशाँ इंसानी तंज़ीम की ख़्वाहाँ नज़्में उस की जान-ए-मक़ासिद रूह-ए-तमद्दुन शान-ए-मक़ासिद सुब्ह पे शैदा शाम पे आशिक़ अपने वतन के नाम पे आशिक़ बातें रैब-ओ-रिया से ख़ाली हर नक़्श-ए-किरदार मिसाली प्यार इंसाँ का दिल में छुपाए दर्द-ए-जहाँ सीने में बसाए 'दौराँ' है या रूह-ए-'दौराँ' गिर्यां गिर्यां ख़ंदाँ ख़ंदाँ इस की दुनिया अपनी दुनिया इस दुनिया में सारी दुनिया

Owais Ahmad Dauran

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