रोने की उम्र है न सिसकने की उम्र है जाम-ए-नशात बन के छलकने की उम्र है शबनम की बूँद पी के चटकने की उम्र है गुलशन में फूल बन के महकने की उम्र है सद-मर्हबा ये गुमरही-ए-शौक़ चश्म-ओ-दिल हाँ राह-ए-आरज़ू में भटकने की उम्र है इक जुर्म है ख़याल-ओ-तसव्वुर गुनाह का ये उम्र सिर्फ़ पी के बहकने की उम्र है दीवाना बन के नज्द के सहरा में घूमिए लैला की जुस्तुजू में भटकने की उम्र है बेचैन क्यूँँ हो रूह किसी एक के लिए हर माह-वश पे जान छिड़कने की उम्र है इस दौर-ए-इम्बिसात में ब-हालत-ए-जुनूँ हर कू-ए-दिलबराँ में भटकने की उम्र है लाज़िम नहीं कि ख़ुद को बचाता फिरूँ तमाम शीशा हूँ चोट खा के दरकने की उम्र है तस्कीं वो दे रही हैं पर ऐ क़ल्ब-ए-ना-सुबूर तू और भी धड़क कि धड़कने की उम्र है जब चल पड़ा हूँ घर से तो मंज़िल की शर्त क्या हूँ रह-नवर्द-ए-शौक़ भटकने की उम्र है हूँ आफ़्ताब-ए-ताज़ा हुआ हूँ अभी तुलू'अ अपने जहान-ए-नौ में चमकने की उम्र है ऐवान ओ तख़्त-ओ-ताज हैं मेरी लपेट में शो'ला हूँ मैं ये मेरे भड़कने की उम्र है 'दौराँ' मैं बज़्म-ए-दोस्त में छेड़ूँ न क्यूँँ ग़ज़ल ये ज़मज़ में के दिन हैं लहकने की उम्र है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
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मुझ पे तेरी तमन्ना का इल्ज़ाम साबित न होता तो सब ठीक था ज़माना तेरी रौशनी के तसलसुल की क़स में उठाता है और में तेरे साथ रह कर भी तारीखियों के तनज़ूर में मारा गया मुझ पे नज़र-ए-करम कर मुखातिब हो मुझ सेे मुझे ये बता मैं तेरा कौन हूँ? इस तअल्लुक़ की क्यारी में उगते हुए फूल को नाम दे मुझ को तेरी मोहब्बत पे शक तो नहीं पर मेरे नाम से तेरे सीने में रखी हुई ईंट धड़के तो मानो कब तलक मैं तेरी ख़ामोशी से यूँंही अपने मर्ज़ी के मतलब निकालूँगा मुझ को आवाज़ दे चाहे वो मेरे हक़ में बुरी हो तेरी आवाज़ सुनने की ख़्वाहिश में कानों के परदे खींचे जा रहे हैं बोलदे कुछ भी जो तेरा जी चाहे.. बोल ना! तेरे होंठों पे मकड़ी के जालों के जमने का दुख तो बरहाल मुझ को हमेशा रहेगा तू ने चुपी ही सादनी थी तो इज़हार ही क्यूँ किया था? ये तो ऐसे है बचपन में जैसे कहीं खेलते खेलते कोई किसी को 'स्टेचू' कहे और फिर उम्र भर उस को मुड़ कर न देखे
Tehzeeb Hafi
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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है
Ammar Iqbal
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"एक लड़की" बुलंद क़ामत की एक लड़की बिखेरती खुशबुएँ बदन की मेरी निगाहों की रहगुज़र से गुज़र गई है गरीब-मुफ़लिस किसी कुटी का है चाँद शायद है ख़ूब-सूरत, फ़टे-पुराने लिबास में भी बला की सुंदर ज़रा सा मेरे क़रीब आ कर हसीं लबों से यूँँ मुस्कुरा कर तमाम आलम को ख़ुशबुओं से वो भर गई है जबीं कुशादा चमक रही है कमर भी उस की है शाख जैसी लचक रही है लबों पे बिखरा हुआ तबस्सुम सियाह गेसू भी उस बदन से लिपट रहे हैं यूँँ जैसे कोई शजर से लिपटी हो बेल जैसे क़दम-क़दम पे ज्यूँ फूल खिलते हैं सुर्ख़ गोया, जिधर गई है वो जिस्मे-नाज़ुक तराश जिस की हो गोया हीरा वो बेश-क़ीमत हर इक अदा में ग़ज़ब की है शबनमी लताफ़त किसी परी-वश से ख़ूबसरत सुख़नवरों के ख़याल-सी है कि सुर्ख़-रू उस हसीन की मैं मिसाल क्या दूँ गुलाल-सी है निगाह ख़ंजर, अदाएँ क़ातिल कमाल लहजा, बस इक नज़र से मेरे जिगर में उतर गई है मैं हूँ एक शाइ'र सो मुझ को उस में ग़ज़ल दिखी है लगा है मुझ को कि जैसे बादे-सबा उसे गुनगुना रही है मगर वो लड़की जिसे गुमाँ तक नहीं है शायद ये हुस्न उस पर ही बोझ बन जाएगा यक़ीनन उसे कहो कि नक़ाब में रक्खे हुस्नो-इस्मत वगरना पछताएगी बा'द में वो वो मर्द कहते हैं जो यहाँ पर वो ख़ुद को साबित करेंगे बेशक दिखाएँगे उस गरीब पर ही वो ज़ोर अपनी मर्दानगी का करेंगे ज़ाहिर वो पाक-दामन को तार कर के कि मर्द हैं हम न उस में उन को दिखेगा बेबस बुज़ुर्ग आँखों का इक सितारा उन्हें फ़क़त वो फ़टे लिबासों से झाँकता इक बदन दिखेगा हवस-कदे में, पड़ी मिलेगी बस एक उरियाँ वो लाश बन कर न मर्द की शक्ल में उन दरिंदों को उस में कोई बहन दिखेगी न माँ दिखेगी, न कोई बेटी न उन को उस में ग़ज़ल दिखेगी न शा'इरी ही
KARAN
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ये इडेन गार्डेन हमदम निगाह-ओ-दिल की जन्नत है यहाँ हव्वा की रंगीं बेटियाँ हर शाम आती हैं जवाँ मर्दों को अपनी जाज़बिय्यत से लुभाती हैं दिलों को शर्मगीं नज़रों से पैहम गुदगुदाती हैं सुहागन है तो उस की माँग में झूमर चमकता है कुँवारी है तो उस के जिस्म से ख़ुशबू निकलती है गुलाबी मध-भरी आँखों से इक मस्ती उबलती है वो मस्ती जो दिलों के साग़र-ए-रंगीं में ढलती है कहीं जोड़े में कोई फूल गूँधे कोई लट खोले फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-हुगली में रंग-ओ-नूर भरती है भरे मज में' में अपने हुस्न का एलान करती है तमाशा देखने वालों की रूहों में उतरती है सुनहरी बालियाँ शोख़ी से रुख़्सारों को तकती हैं खनकती चूड़ियाँ गीतों की मीठी धुन सुनाती हैं जबीं पर नन्ही नन्ही कहकशाएँ जगमगाती हैं हिनाई उँगलियाँ लहरा के साजन को बुलाती हैं ये बंगाली हसीनाओं की जल्वा-गाह है हमदम यहाँ पीर-ओ-जवाँ आ कर मता-ए-दिल लुटाते हैं जुनूँ-अंगेज़ लै में नर्म-ओ-शीरीं गीत गाते हैं निगाहों में निगाहें डालते हैं मुस्कुराते हैं ठहर ऐ जज़्बा-ए-बे-ताब इसी रंगीन दुनिया में लबों की सुर्ख़ मय से दिल के ख़ाली जाम को भर लें शमीम-ए-ज़ुल्फ़ से बे-रब्त साँसें अम्बरीं कर लें जवानी के बहार-आगीं गुलिस्ताँ में क़दम धर लें
Owais Ahmad Dauran
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तेरे भी दिल में हूक सी उट्ठे ख़ुदा करे तू भी हमारी याद में तड़पे ख़ुदा करे मजरूह हो बला से तिरे हुस्न का ग़ुरूर पर तुझ को चश्म-ए-शौक़ न देखे ख़ुदा करे खो जाएँ तेरे हुस्न की रानाइयाँ तमाम तेरी अदा किसी को न भाए ख़ुदा करे मेरी ही तरह कश्ती-ए-दिल हो तिरी तबाह तूफ़ान इतने ज़ोर का उट्ठे ख़ुदा करे राहों के पेच-ओ-ख़म में रहे ता-हयात गुम मंज़िल तिरे क़रीब न आए ख़ुदा करे ज़ुल्मत हो तू हो और तिरी रहगुज़ार हो दुनिया में तेरी सुब्ह न फूटे ख़ुदा करे तुझ पर नशात-ओ-ऐश की रातें हराम हों मर जाएँ तेरे साज़ के नग़्में ख़ुदा करे आएँ न तेरे बाग़ में झोंके नसीम के तेरा गुल-ए-शबाब न महके ख़ुदा करे हर लम्हा तेरी रूह को इक बे-कली सी हो और बे-कली में नींद न आए ख़ुदा करे हो तेरे दिल में मेरी ख़लिश मेरी आरज़ू मेरे बग़ैर चैन न आए ख़ुदा करे तू जा रही है बज़्म-ए-तरब में तो ख़ैर जा पर तेरा जी वहाँ भी न बहले ख़ुदा करे अल-मुख़्तसर हों जितने सितम तुझ पे टूट जाएँ लेकिन ये रब्त-ए-ज़ीस्त न टूटे ख़ुदा करे जो कुछ मैं कह गया हूँ जुनूँ में वो सब ग़लत तुझ पर कोई भी आँच न आए ख़ुदा करे तू है मता-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र बे-वफ़ा सही है रौशनी-ए-दाग़-ए-जिगर बे-वफ़ा सही
Owais Ahmad Dauran
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अक़ल्लीयत कहीं की हो तह-ए-ख़ंजर ही रहती है हलाकत-ख़ेज़ हाथों के हज़ारों जब्र सहती है ख़स-ओ-ख़ाशाक की मानिंद सैल-ए-ग़म में बहती है न कोई ख़्वाब आँखों में न दिल में आसरा कोई न जू-ए-ख़ूँ से बचने का नज़र में रास्ता कोई न मुस्तक़बिल की आवाज़ें न मंज़िल की सदा कोई ख़ुद अपनी ही फ़ज़ा में ख़ौफ़ का एहसास हर लम्हा अदम-महफ़ूज़ियत का दूर तक ग़मनाक सन्नाटा सुहानी हो के भी बे-रौनक़-ओ-बे-कैफ़ सी दुनिया हक़ारत की नज़र नफ़रत की चिंगारी तआक़ुब में मुसीबत आगे आगे ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी तआक़ुब में जिधर जाए वहीं तूफ़ान-ए-बे-ज़ारी तआक़ुब में ज़बाँ मातूब तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त दार की ज़द में घर आँगन इज़्ज़त-ओ-नामूस कुल तलवार की ज़द में लबों की मुस्कुराहट आतिशीं यलग़ार की ज़द में अक़ल्लीयत जहाँ भी है यही उस का मुक़द्दर है ये ज़ख़्मी बे-अमाँ मख़्लूक़ हर सू ज़ेर-ए-ख़ंजर है बता ऐ दिल ये ग़म की रात है या रोज़-ए-महशर है
Owais Ahmad Dauran
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दुबला पतला नाज़ुक 'दौराँ' शीशा जैसा नाज़ुक 'दौराँ' ग़म की काली रात का मारा अपने ही जज़्बात का मारा आठों पहर यूँँ खोया खोया जैसे गहरी सोच में डूबा कम हँसना आदत में दाख़िल ख़ामोशी फ़ितरत में दाख़िल शम्अ'' की सूरत बज़्म में जलना गाह भड़कना गाह पिघलना माथे पर हर वक़्त शिकन सी चेहरा पर आज़ुर्दा थकन सी चेहरे से महरूमी ज़ाहिर मासूमी मज़लूमी ज़ाहिर आँखें हर दम उमडी उमडी पलकें हर दम भीगी भीगी कर्ब आँखों में दर्द आँखों में राह-ए-वफ़ा की गर्द आँखों में सहमा सहमा शाम-ए-बला से रूठा रूठा अपने ख़ुदा से अक़्ल-ओ-ख़िरद से जी को चुराए पागल-पन से बाज़ न आए जाने दिल में किस की लगन है रूह में किस काँटे की चुभन है ये है अपना 'दौराँ' यारो उलझा सुलझा 'दौराँ' यारो लेकिन यारो यही मुसाफ़िर राह-ए-वफ़ा का दुखी मुसाफ़िर शानों पर इक बोझ को लादे राह-ए-तलब में आगे आगे दिल में इक मज़बूत इरादा नज़रों में इक रौशन जादा ग़म की लंबी रात पे भारी ज़ुल्म का और ज़ुल्मत का शिकारी इंसानी तहज़ीब का क़ाइल दुनिया की ता'मीर पे माइल सई-ए-पैहम उस की तमन्ना जगमग जगमग उस का रस्ता उस की सारी फ़िक्र-ए-परेशाँ इंसानी तंज़ीम की ख़्वाहाँ नज़्में उस की जान-ए-मक़ासिद रूह-ए-तमद्दुन शान-ए-मक़ासिद सुब्ह पे शैदा शाम पे आशिक़ अपने वतन के नाम पे आशिक़ बातें रैब-ओ-रिया से ख़ाली हर नक़्श-ए-किरदार मिसाली प्यार इंसाँ का दिल में छुपाए दर्द-ए-जहाँ सीने में बसाए 'दौराँ' है या रूह-ए-'दौराँ' गिर्यां गिर्यां ख़ंदाँ ख़ंदाँ इस की दुनिया अपनी दुनिया इस दुनिया में सारी दुनिया
Owais Ahmad Dauran
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मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे मलूल ओ मुज़्महिल चेहरा पे ठंडी चाँदनी का अक्स मत ढूँडो मिरा बे-रंग-ओ-बू चेहरा जमी है अन-गिनत फ़ाक़ों की जिस पर धूल बरसों से ज़मीं के चंद फ़िरऔनों को अपनी ख़शमगीं नज़रों से तकता है मिरे अज्दाद भी मेरी तरह भूके थे लेकिन मुझ में और उन में ज़मीन-ओ-आसमाँ का फ़र्क़ है शायद वो अपनी भूक को तक़दीर का लिक्खा समझते थे क़नाअ'त उन का तकिया था तवक्कुल उन का शेवा था मगर मैं ऐसी हर झूटी तसल्ली का मुख़ालिफ़ हूँ मुक़द्दर के अँधेरों में नहीं मेरा यक़ीं है रौशनी-ए-सुब्ह-ए-फ़र्दा में मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे लबों पर नाला-ओ-फ़रियाद की लय के एवज़ इक आग है तेवर में ग़ुस्सा है ये वो ग़ुस्सा है जिस से मेरा दुश्मन थरथराता है
Owais Ahmad Dauran
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