सहेली यूँँ तो कुछ कुछ साँवले से हैं मिरे साजन मगर तेरी क़सम बेहद रसीले हैं मिरे साजन जो मैं कहती हूँ उस को मुस्कुरा कर मान जाते हैं बहुत प्यारे बड़े ही भोले-भाले हैं मिरे साजन मैं उन से प्रेम करती हूँ भला मैं क्या बताऊँगी सखी तू बोल तुझ को कैसे लगते हैं मिरे साजन ब-ज़ाहिर वो दिखाई देते हैं मासूम दुनिया को मगर अंदर से मस्ताने रंगीले हैं मिरे साजन नहा धो कर मैं अपनी माँग जब सिंदूर से भरती हूँ तो जाने ज़ेर-ए-लब क्यूँँ मुस्कुराते हैं मिरे साजन खुले बालों की ख़ुशबू दिल को मतवाला बनाती है मिरा जूड़ा ये कह कर खोल देते हैं मिरे साजन छुपा लेती हूँ चेहरा उस घड़ी मैं लाज के मारे मुझे जब सेज पर अपनी बुलाते हैं मिरे साजन न मुझ से दिल सँभलता है न आँचल ही सँभलता है सुहाने गीत क्यूँँ रातों को गाते हैं मिरे साजन मुझे परदेस से हर बार गहना ला के देते हैं सहेली मुझ से बेहद प्यार करते हैं मिरे साजन कई दिन से मुसलसल देखती हूँ उन को सपने में पपीहे सच बता क्या आने वाले हैं मिरे साजन चमकता है मिरे माथे पे झूमर आज क्यूँँ जैसे ख़ुशी का चाँद बन कर घर में आए हैं मिरे साजन सवेरे से बहुत बेचैन हूँ घबरा रही हूँ मैं सखी परदेस में क्या जाने कैसे हैं मिरे साजन कोइलया! दिल में तेरी कूक अब नश्तर चुभोती है ज़माना हो गया है मुझ से बिछड़े हैं मिरे साजन घटा फिर झूम कर सावन की आई मोर फिर बोला मिरे साजन अब आ जाओ कि झूलें बाग़ में झूला
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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ये इडेन गार्डेन हमदम निगाह-ओ-दिल की जन्नत है यहाँ हव्वा की रंगीं बेटियाँ हर शाम आती हैं जवाँ मर्दों को अपनी जाज़बिय्यत से लुभाती हैं दिलों को शर्मगीं नज़रों से पैहम गुदगुदाती हैं सुहागन है तो उस की माँग में झूमर चमकता है कुँवारी है तो उस के जिस्म से ख़ुशबू निकलती है गुलाबी मध-भरी आँखों से इक मस्ती उबलती है वो मस्ती जो दिलों के साग़र-ए-रंगीं में ढलती है कहीं जोड़े में कोई फूल गूँधे कोई लट खोले फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-हुगली में रंग-ओ-नूर भरती है भरे मज में' में अपने हुस्न का एलान करती है तमाशा देखने वालों की रूहों में उतरती है सुनहरी बालियाँ शोख़ी से रुख़्सारों को तकती हैं खनकती चूड़ियाँ गीतों की मीठी धुन सुनाती हैं जबीं पर नन्ही नन्ही कहकशाएँ जगमगाती हैं हिनाई उँगलियाँ लहरा के साजन को बुलाती हैं ये बंगाली हसीनाओं की जल्वा-गाह है हमदम यहाँ पीर-ओ-जवाँ आ कर मता-ए-दिल लुटाते हैं जुनूँ-अंगेज़ लै में नर्म-ओ-शीरीं गीत गाते हैं निगाहों में निगाहें डालते हैं मुस्कुराते हैं ठहर ऐ जज़्बा-ए-बे-ताब इसी रंगीन दुनिया में लबों की सुर्ख़ मय से दिल के ख़ाली जाम को भर लें शमीम-ए-ज़ुल्फ़ से बे-रब्त साँसें अम्बरीं कर लें जवानी के बहार-आगीं गुलिस्ताँ में क़दम धर लें
Owais Ahmad Dauran
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तेरे भी दिल में हूक सी उट्ठे ख़ुदा करे तू भी हमारी याद में तड़पे ख़ुदा करे मजरूह हो बला से तिरे हुस्न का ग़ुरूर पर तुझ को चश्म-ए-शौक़ न देखे ख़ुदा करे खो जाएँ तेरे हुस्न की रानाइयाँ तमाम तेरी अदा किसी को न भाए ख़ुदा करे मेरी ही तरह कश्ती-ए-दिल हो तिरी तबाह तूफ़ान इतने ज़ोर का उट्ठे ख़ुदा करे राहों के पेच-ओ-ख़म में रहे ता-हयात गुम मंज़िल तिरे क़रीब न आए ख़ुदा करे ज़ुल्मत हो तू हो और तिरी रहगुज़ार हो दुनिया में तेरी सुब्ह न फूटे ख़ुदा करे तुझ पर नशात-ओ-ऐश की रातें हराम हों मर जाएँ तेरे साज़ के नग़्में ख़ुदा करे आएँ न तेरे बाग़ में झोंके नसीम के तेरा गुल-ए-शबाब न महके ख़ुदा करे हर लम्हा तेरी रूह को इक बे-कली सी हो और बे-कली में नींद न आए ख़ुदा करे हो तेरे दिल में मेरी ख़लिश मेरी आरज़ू मेरे बग़ैर चैन न आए ख़ुदा करे तू जा रही है बज़्म-ए-तरब में तो ख़ैर जा पर तेरा जी वहाँ भी न बहले ख़ुदा करे अल-मुख़्तसर हों जितने सितम तुझ पे टूट जाएँ लेकिन ये रब्त-ए-ज़ीस्त न टूटे ख़ुदा करे जो कुछ मैं कह गया हूँ जुनूँ में वो सब ग़लत तुझ पर कोई भी आँच न आए ख़ुदा करे तू है मता-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र बे-वफ़ा सही है रौशनी-ए-दाग़-ए-जिगर बे-वफ़ा सही
Owais Ahmad Dauran
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मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे मलूल ओ मुज़्महिल चेहरा पे ठंडी चाँदनी का अक्स मत ढूँडो मिरा बे-रंग-ओ-बू चेहरा जमी है अन-गिनत फ़ाक़ों की जिस पर धूल बरसों से ज़मीं के चंद फ़िरऔनों को अपनी ख़शमगीं नज़रों से तकता है मिरे अज्दाद भी मेरी तरह भूके थे लेकिन मुझ में और उन में ज़मीन-ओ-आसमाँ का फ़र्क़ है शायद वो अपनी भूक को तक़दीर का लिक्खा समझते थे क़नाअ'त उन का तकिया था तवक्कुल उन का शेवा था मगर मैं ऐसी हर झूटी तसल्ली का मुख़ालिफ़ हूँ मुक़द्दर के अँधेरों में नहीं मेरा यक़ीं है रौशनी-ए-सुब्ह-ए-फ़र्दा में मैं भूकी नस्ल हूँ मेरे लबों पर नाला-ओ-फ़रियाद की लय के एवज़ इक आग है तेवर में ग़ुस्सा है ये वो ग़ुस्सा है जिस से मेरा दुश्मन थरथराता है
Owais Ahmad Dauran
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अक़ल्लीयत कहीं की हो तह-ए-ख़ंजर ही रहती है हलाकत-ख़ेज़ हाथों के हज़ारों जब्र सहती है ख़स-ओ-ख़ाशाक की मानिंद सैल-ए-ग़म में बहती है न कोई ख़्वाब आँखों में न दिल में आसरा कोई न जू-ए-ख़ूँ से बचने का नज़र में रास्ता कोई न मुस्तक़बिल की आवाज़ें न मंज़िल की सदा कोई ख़ुद अपनी ही फ़ज़ा में ख़ौफ़ का एहसास हर लम्हा अदम-महफ़ूज़ियत का दूर तक ग़मनाक सन्नाटा सुहानी हो के भी बे-रौनक़-ओ-बे-कैफ़ सी दुनिया हक़ारत की नज़र नफ़रत की चिंगारी तआक़ुब में मुसीबत आगे आगे ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी तआक़ुब में जिधर जाए वहीं तूफ़ान-ए-बे-ज़ारी तआक़ुब में ज़बाँ मातूब तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त दार की ज़द में घर आँगन इज़्ज़त-ओ-नामूस कुल तलवार की ज़द में लबों की मुस्कुराहट आतिशीं यलग़ार की ज़द में अक़ल्लीयत जहाँ भी है यही उस का मुक़द्दर है ये ज़ख़्मी बे-अमाँ मख़्लूक़ हर सू ज़ेर-ए-ख़ंजर है बता ऐ दिल ये ग़म की रात है या रोज़-ए-महशर है
Owais Ahmad Dauran
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दुबला पतला नाज़ुक 'दौराँ' शीशा जैसा नाज़ुक 'दौराँ' ग़म की काली रात का मारा अपने ही जज़्बात का मारा आठों पहर यूँँ खोया खोया जैसे गहरी सोच में डूबा कम हँसना आदत में दाख़िल ख़ामोशी फ़ितरत में दाख़िल शम्अ'' की सूरत बज़्म में जलना गाह भड़कना गाह पिघलना माथे पर हर वक़्त शिकन सी चेहरा पर आज़ुर्दा थकन सी चेहरे से महरूमी ज़ाहिर मासूमी मज़लूमी ज़ाहिर आँखें हर दम उमडी उमडी पलकें हर दम भीगी भीगी कर्ब आँखों में दर्द आँखों में राह-ए-वफ़ा की गर्द आँखों में सहमा सहमा शाम-ए-बला से रूठा रूठा अपने ख़ुदा से अक़्ल-ओ-ख़िरद से जी को चुराए पागल-पन से बाज़ न आए जाने दिल में किस की लगन है रूह में किस काँटे की चुभन है ये है अपना 'दौराँ' यारो उलझा सुलझा 'दौराँ' यारो लेकिन यारो यही मुसाफ़िर राह-ए-वफ़ा का दुखी मुसाफ़िर शानों पर इक बोझ को लादे राह-ए-तलब में आगे आगे दिल में इक मज़बूत इरादा नज़रों में इक रौशन जादा ग़म की लंबी रात पे भारी ज़ुल्म का और ज़ुल्मत का शिकारी इंसानी तहज़ीब का क़ाइल दुनिया की ता'मीर पे माइल सई-ए-पैहम उस की तमन्ना जगमग जगमग उस का रस्ता उस की सारी फ़िक्र-ए-परेशाँ इंसानी तंज़ीम की ख़्वाहाँ नज़्में उस की जान-ए-मक़ासिद रूह-ए-तमद्दुन शान-ए-मक़ासिद सुब्ह पे शैदा शाम पे आशिक़ अपने वतन के नाम पे आशिक़ बातें रैब-ओ-रिया से ख़ाली हर नक़्श-ए-किरदार मिसाली प्यार इंसाँ का दिल में छुपाए दर्द-ए-जहाँ सीने में बसाए 'दौराँ' है या रूह-ए-'दौराँ' गिर्यां गिर्यां ख़ंदाँ ख़ंदाँ इस की दुनिया अपनी दुनिया इस दुनिया में सारी दुनिया
Owais Ahmad Dauran
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