nazmKuch Alfaaz

तू ने क्यूँँ अपने गालों पे सरसों मली तू ने क्यूँँ अपनी आँखों में चूना भरा तेरी गोयाई किस दश्त के भेड़िये ले गए बोलता क्यूँँ नहीं बोलता क्यूँँ नहीं तिफ़्ल-ए-मासूम तो कब से बीमार है कैसा आज़ार है जिस ने तेरी शबों से तिरी नींद तेरे दिनों से खिलौने चुराए तू सोया नहीं है मगर जागता क्यूँँ नहीं देखता क्यूँँ नहीं तेरे बाबा के बालों में खुजली है और उँगलियाँ झड़ चुकी हैं हिसाब-ए-शब-ओ-रोज़ करते हुए तेरी अम्माँ के रा'शा-ज़दा हाथ ख़ुश-हालियाँ ढूँडते ढूँडते इन धुले बर्तनों में पड़े रह गए सुब्ह-ए-ताबीर ने शाख़ पर सब्ज़ होने की हसरत लिखी आँख को मोतिया दे दिया देखता क्यूँँ नहीं आज बाज़ार में जश्न-ए-इफ़्लास है शहर की भूक चोरी हुई और ख़बरों ने अख़बार गुम कर दिया लोग रोते रहे लोग हँसते रहे तेरे बिस्तर पे अश्कों की चम्पा खिली और तू चुप रहा तेरे माथे पे मुस्कान का इत्र छिड़का गया और तू चुप रहा मेरी हंडिया जली मेरा चूल्हा बुझा मेरी झोली से हर्फ़-ए-दुआ गिर गया मेरे बच्चे तू लब खोलता क्यूँँ नहीं बोलता क्यूँँ नहीं

Related Nazm

"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

25 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

54 likes

मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

52 likes

"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

46 likes

More from Jawayd Anwar

मैं सफ़र में हूँ मिरे जिस्म पर हैं हज़ार रंगों की यूरिशें कहीं सुर्ख़ फूल खिला हुआ कहीं नील है कहीं सब्ज़ रंग है ज़हर का मगर आइना शब-ए-शहर का मिरी ढाल है जो विसाल है वही अस्ल हिज्र-मिसाल है मिरे सामने वही रास्ते वही बाम-ओ-दर वही संग हैं वही सूलियाँ मुझे शाम आई है शहर में मुझे शाम आई है शहर में जहाँ आसमाँ की वुसअ'तों से सवाल कासा-ब-दस्त लौटे थे याद है शब हीला जो तुझे याद है वो सलीब जिस पे मचान नज्म-ए-सहर की थी वो ख़तीब जिस का ख़िताब अबरू हुआ से था वो सदा-ए-ज़ब्त अजीब थी कहीं कोढ़ियों की शिफ़ा बनी कहीं अब्र-ओ-बाद से चोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर से बड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाब पाँव की धूल हैं मैं सफ़र में हूँ मुझे शाम आई है शहर में मिरे हाथ में भी कमान है मुझे तीर दे

Jawayd Anwar

0 likes

ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा तुझे तो मैं ढूँडने चला था मुझे ख़बर ही नहीं थी तू मेरी उँगलियों में खिला हुआ है मिरे सदफ़ में तिरे ही मोती हैं मेरी जेबों में तेरे सिक्के खनक रहे हैं नवा-ए-गुमराह-ए-दश्त-ए-शब के नुजूम तेरी हथेलियों पर चहक रहे हैं मिरे ख़ला में तमाम सम्तें तिरे ख़ला से उतर रही हैं मुझे ख़बर ही न थी कि मेरी नज़र की ऐनक में तेरे शीशे जुड़े हुए हैं तुझे तो मैं ढूँडने चला था तुझे तो मैं ढूँडने चला था किसी सलीब-ए-कुहन पे दार-ओ-रसन के तारीक रास्तों की थकन में फ़रहाद कोहकन की सदा-ए-सद-चाक में किसी चूक मैं उबलते हुए लहू में खिले गुल तिफ़्ल-ए-बे-गुनह के बिखरते रंगों की उँगली था में तुझे तो मैं ढूँडने चला था शब-ए-तरब है शब-ए-तरब में न साज़ उतरे न नूर बिखरा न बादलों ने फुवार भेजी न झील ने माहताब उगला शब-ए-तरब है ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा शब-ए-तरब में मरी तलब का रबाब बन जा बुझी रगों में शराब बन जा ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा मिरी अँगेठी का ख़्वाब बन जा कि शब का आहन पिघलने तक मेरी चिमनियों के धुएँ में जुगनू मल्हार गाएँ

Jawayd Anwar

0 likes

वही क़स्में शब-ए-ना-मो'तबर की वही रस्में हैं शहर-ए-संग-दिल की वही दीवार-ए-बे-रौज़न कि जिस को ज़बानें दिन ढले तक चाटती हैं किसे पूछें बिरुन-ए-सहन क्या है कहाँ किस खेत में गंदुम उगी है कहाँ किस झील में सूरज गिरा है कहाँ हैं तेरी ज़िरहें मेरी ढालें कहाँ वो चाँद है जिस की तलब में ख़ला में फेंक दीं चेहरों ने आँखें कहाँ है इस घनी दीवार-ए-शब में इकहरी ईंट की चुनवाई पूछें कहाँ से कोई ख़िश्त-ए-ग़म उखाड़ें कहाँ दीवार में रौज़न बनाएँ

Jawayd Anwar

0 likes

सूरज ढलता है और बम गिरता है और बम गिरते हैं सूरज ढलने से सूरज चढ़ने तक चढ़े हुए दिन में भी इधर उधर बम गिरते रहते हैं लेकिन कोई चीख़ सुनाई नहीं देती पहले देती थी अब कोई नहीं रोता गहरे गहरे गढ़े हैं और गढ़ों में गलता हुआ इंसानी मास है बचा-खुचा और चारों जानिब ईंटें पत्थर सरिया टूटे हुए दरवाज़े खिड़कियाँ कुत्ता बिल्ली चील और डरे डरे कुछ लोग उधर उधर से झाँकते हैं उधर उधर छुप जाते हैं बम गिरता है लेकिन एक खंडर में सिगरेट जलता है बुझता है जलता है डर ग़ुस्से में ढलता है रॉकेट चलता है रॉकेट चलता है दुनिया चीख़ती है और बम गिरता है तो किसी को सुनाई नहीं देता किसी को दिखाई नहीं देता

Jawayd Anwar

0 likes

अधूरी लड़कियो तुम अपने कमरों में पुराने साल के बोसीदा कैलन्डर सजा कर सोचती हो ये बदन 'उम्रों की साज़िश में न आएँगे तुम्हें किस ने बताया है घड़ी की सूइयों को रोकने से दौड़ता और हाँफता सूरज मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा अफ़्लाक पर जम जाएगा तुम्हें मालूम है उर्यानियों को ढाँप कर तुम और उर्यां हो रही हो रोज़ इन आँखों की तिकड़ी में तुम्हारे जिस्म तुलते हैं हर इक शब हॉस्टल में ताश की बाज़ी में तुम को जीत कर इक जश्न होता है हमारी ख़्वाब-गाहों में तुम्हारे ख़्वाब रौशन हैं चली आओ कि बाहर बर्फ़ है और अब हमें तुम से जुदा बिस्तर कहाँ तस्लीम करते हैं चली आओ कि 'उम्रें राएगाँ होने से बच जाएँ!

Jawayd Anwar

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Jawayd Anwar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Jawayd Anwar's nazm.