ये मेरे दिल की पगडंडी पे चलती नज़्म है कोई कि सैल-ए-वक़्त की भटकी हुई इक लहर सा लम्हा जो आँचल पर सितारे और उन आँखों में आँसू टाँक देता है सितारों की चमक और आँसुओं की झिलमिलाहट में किसी एहसास-ए-गुम-गश्ता से लिखा बाब है शायद कोई सैलाब है शायद या इक बे-नाम सी रस्म-ए-तअ'ल्लुक़ का तराशा ख़्वाब है शायद जो आँखों में उतरते ही कभी चुप की सुरंग और बर्फ़ साँसों की लड़ी में झूलता है और कभी बहता है सच बन कर लहू की हर रवानी में नज़र से झाँकती इक उम्र जैसी राएगानी में मगर दिल की तहों में इक ख़लिश सी कसमसाती और कहती है ये सच कैसा है कि जलते हुए दिल को गुमाँ तक भी जो छाँव का न दे पाए ये कैसा सच है जिस की थाम कर उँगली कोई रस्तों में खो जाए
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
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क्या कोई ख़बर आए ज़िंदगी के तरकश में जितने तीर बाक़ी थे मेरी बे-ध्यानी से दिल की ख़ुश-गुमानी से साज़ बाज़ करते ही रूह में उतर आए धुँद इतनी गहरी है कुछ पता नहीं चलता ख़्वाब के तआ'क़ुब में कौन से ज़मानों से कितने आसमानों से हम गुज़र के घर आए फ़स्ल-ए-गुल की बातें भी अब कहाँ रहें मुमकिन उम्र की कहानी में ऐसी बे-ज़मीनी में ऐसी ला-मकानी में सिर्फ़ इतना मुमकिन है धड़कनों की गिनती में अगला मोड़ मुड़ते ही आख़िरी सफ़र आए
Nahid Qamar
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अभी ठहरो अभी से इस तअ'ल्लुक़ का कोई उनवान मत सोचो अभी तो इस कहानी में मोहब्बत के अधूरे बाब की तकमील होने तक नज़र की धूप में रक्खे हुए ख़्वाबों के सारे ज़ाइक़े तब्दील होने तक बहुत से मोड़ आने हैं मुझे उन से गुज़रने दो ज़रा महसूस करने दो कि मेरे पाँव के नीचे ज़मीं ने रंग बदला है मिरे लहजे में अपना किस तरह आहंग बदला है मुझे थोड़ा सँभलने दो अभी ठहरो अभी ठहरो कि वो ख़ुश-बख़्त साअ'त भी अभी मुझ तक नहीं पहुँची जो दिल के आईने को वहम की अंधी गली से एतिबार-ए-ज़ात की सरहद पे लाती है उसे रस्ता बताती है अभी उन रास्तों पर तुम मुझे कुछ देर चलने दो अभी ठहरो कोई ख़्वाहिश उमीद-ओ-बीम के माबैन अब भी साँस लेती है उसे इस कर्ब से आज़ाद करने दो वो सारे ख़्वाब जिन को देखने का क़र्ज़ में लूटा नहीं पाई मुझे उन के लिए ता'बीर का सफ़्हा पलटने दो अभी ठहरो किसी बीते हुए मौसम के बख़्शे ज़ख़्म अब भी आँख की पुतली में रौशन हैं ज़रा ये ज़ख़्म भरने दो मसीहाई तुम्हारी रूह की पाताल तक कैसे पहुँचती है मुझे अंदाज़ा करने दो अभी ठहरो अभी से इस तअ'ल्लुक़ का कोई उनवान मत सोचो
Nahid Qamar
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छान कर देख ली रेग-ए-दश्त-ए-ज़ियाँ ढूँढ़ पाए न हम दूसरा आसमाँ अजनबी मौसमों की उड़ानों में टूटे परों की तरह हम जिए भी तो क्या किस ने देखा हमें चश्म-ए-नम के किनारों पे ठहरे हुए मंज़रों की तरह रात की आँख से बह गए ख़्वाब भी हम भी मादूम की अन-सुली नींद में याद के ताक़ में अब तमन्ना की लो का निशाँ तक नहीं वाहिमा सा है बस कोई आहट थी हमराह या कुछ न था ख़्वाब-ए-हस्ती हमें इक अज़िय्यत भरे दाम-ए-मा'दूमियत के सिवा कुछ न था
Nahid Qamar
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