अभी ठहरो अभी से इस तअ'ल्लुक़ का कोई उनवान मत सोचो अभी तो इस कहानी में मोहब्बत के अधूरे बाब की तकमील होने तक नज़र की धूप में रक्खे हुए ख़्वाबों के सारे ज़ाइक़े तब्दील होने तक बहुत से मोड़ आने हैं मुझे उन से गुज़रने दो ज़रा महसूस करने दो कि मेरे पाँव के नीचे ज़मीं ने रंग बदला है मिरे लहजे में अपना किस तरह आहंग बदला है मुझे थोड़ा सँभलने दो अभी ठहरो अभी ठहरो कि वो ख़ुश-बख़्त साअ'त भी अभी मुझ तक नहीं पहुँची जो दिल के आईने को वहम की अंधी गली से एतिबार-ए-ज़ात की सरहद पे लाती है उसे रस्ता बताती है अभी उन रास्तों पर तुम मुझे कुछ देर चलने दो अभी ठहरो कोई ख़्वाहिश उमीद-ओ-बीम के माबैन अब भी साँस लेती है उसे इस कर्ब से आज़ाद करने दो वो सारे ख़्वाब जिन को देखने का क़र्ज़ में लूटा नहीं पाई मुझे उन के लिए ता'बीर का सफ़्हा पलटने दो अभी ठहरो किसी बीते हुए मौसम के बख़्शे ज़ख़्म अब भी आँख की पुतली में रौशन हैं ज़रा ये ज़ख़्म भरने दो मसीहाई तुम्हारी रूह की पाताल तक कैसे पहुँचती है मुझे अंदाज़ा करने दो अभी ठहरो अभी से इस तअ'ल्लुक़ का कोई उनवान मत सोचो
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
Ammar Iqbal
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क्या कोई ख़बर आए ज़िंदगी के तरकश में जितने तीर बाक़ी थे मेरी बे-ध्यानी से दिल की ख़ुश-गुमानी से साज़ बाज़ करते ही रूह में उतर आए धुँद इतनी गहरी है कुछ पता नहीं चलता ख़्वाब के तआ'क़ुब में कौन से ज़मानों से कितने आसमानों से हम गुज़र के घर आए फ़स्ल-ए-गुल की बातें भी अब कहाँ रहें मुमकिन उम्र की कहानी में ऐसी बे-ज़मीनी में ऐसी ला-मकानी में सिर्फ़ इतना मुमकिन है धड़कनों की गिनती में अगला मोड़ मुड़ते ही आख़िरी सफ़र आए
Nahid Qamar
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ये मेरे दिल की पगडंडी पे चलती नज़्म है कोई कि सैल-ए-वक़्त की भटकी हुई इक लहर सा लम्हा जो आँचल पर सितारे और उन आँखों में आँसू टाँक देता है सितारों की चमक और आँसुओं की झिलमिलाहट में किसी एहसास-ए-गुम-गश्ता से लिखा बाब है शायद कोई सैलाब है शायद या इक बे-नाम सी रस्म-ए-तअ'ल्लुक़ का तराशा ख़्वाब है शायद जो आँखों में उतरते ही कभी चुप की सुरंग और बर्फ़ साँसों की लड़ी में झूलता है और कभी बहता है सच बन कर लहू की हर रवानी में नज़र से झाँकती इक उम्र जैसी राएगानी में मगर दिल की तहों में इक ख़लिश सी कसमसाती और कहती है ये सच कैसा है कि जलते हुए दिल को गुमाँ तक भी जो छाँव का न दे पाए ये कैसा सच है जिस की थाम कर उँगली कोई रस्तों में खो जाए
Nahid Qamar
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छान कर देख ली रेग-ए-दश्त-ए-ज़ियाँ ढूँढ़ पाए न हम दूसरा आसमाँ अजनबी मौसमों की उड़ानों में टूटे परों की तरह हम जिए भी तो क्या किस ने देखा हमें चश्म-ए-नम के किनारों पे ठहरे हुए मंज़रों की तरह रात की आँख से बह गए ख़्वाब भी हम भी मादूम की अन-सुली नींद में याद के ताक़ में अब तमन्ना की लो का निशाँ तक नहीं वाहिमा सा है बस कोई आहट थी हमराह या कुछ न था ख़्वाब-ए-हस्ती हमें इक अज़िय्यत भरे दाम-ए-मा'दूमियत के सिवा कुछ न था
Nahid Qamar
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