चाँद का मुँह उतरा हुआ है आज घंटों आसमान में दूर तक पैदल चला है कोई बादल नहीं दिखा जो थोड़ी दूर तक साथ चले सितारों ने भी अपना अपना झुंड बना लिया है एक झुंड का सितारा दूसरे से बात नहीं कर रहा वो जो पेड़ की शाख थी जिस पे रुककर चाँद थोड़ी देर सुस्ताता था किसी ने काट डाला है उस शाख को चाँद रूआंसा सा हो गया है उसे देख कर लिपट कर रोना चाहता है उस पेड़ से दिलासा देना चाहता है एक चेहरा जो छत की मुंडेर पर आ कर चाँद को ताका करता था आज अभी तक दिखा नहीं चाँद सोच में है क्या हुआ होगा बार बार नजरें उस चेहरे को ढूँढ़ती हुई मुंडेर पर चली जाती हैं हवा में ठंडक बढ़ती जा रही है चाँद ख़ुद में सिकुड़ना चाह रहा है एक बूढ़ा बाबा जो घर के सामने खाट डालकर लेटा रहता था,और गुनगुनाता रहता था विरह के गीत अपनी बिछड़ी हुई बूढ़ी के लिए उस सेे कंबल उधार ले कर थोड़ी देर को सुस्ताना चाहता है चाँद और गुनगुनाना चाहता है वही गीत किसी की याद में
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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है
ABhishek Parashar
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"क्या लगती हो" मैं जब कोई नज़्म कहता हूँ तुम उस का उनवान लगती हो मुझ सेे मिरी बातें करती हो कौन हो तुम मेरी क्या लगती हो कितनी कम मुयस्सर हो तुम मुझ को फिर भी सारी की सारी लगती हो तुम्हें तितलियाँ तलाश करती हैं बारिशों में भीगा गुलाब लगती हो सितारे तुम्हारा तवाफ़ करते हैं फ़लक पर चमकता चाँद लगती हो आँखें ग़ज़ल हिरणी ज़ुल्फ़ घटा सावन पहाड़ी पर रक़्स करता बादल लगती हो हर एक बात वली सी करती हो जैसे किसी मज़ार की दुआ लगती हो ये हुस्न-ए-आतिश दहकता शबाब कितने ही कोह-ए-तूर जलाती हो तुम्हें ख़ामोशियाँ इस तरह पुकारती हैं जैसे गाँव में मग़रिब की अज़ान लगती हो अब क्या ज़ेहमत करें ये कहने में फ़लक से उतरा हुआ फरिश्ता लगती हो
ALI ZUHRI
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"कब तक ख़ैर मनाते हम" उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं उन पर जान लुटाएंगे हुक़्म करें वो, आसमान से तारे भी ले आएँगे पर क़िस्मत और क़ुदरत इक थाली के चट्टे बट्टे थे कोशिश अपनी पूरी रहती पर अंगूर तो खट्टे थे बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का उन को चटनी खानी थी बेचारा दिल, बेवकूफ़ था कुछ अपनी नादानी थी अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम? हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम हम ने पूरी जुगत लगाई मगर सफलता ना मिल पाई फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी ख़ुदस छेड़ी एक लड़ाई अब बातों में ना आएँगे उन जैसे ही बन जाएँगे उन की जानिब ना देखेंगे नाम 'नयनसुख' कह लाएँगे लेकिन हम थे सावन वाले और ऊपर से दिल के छाले छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर हम ने रूखी सूखी खाई ऊँट सो गया उलटी करवट जमके ली उस ने जम्हाई पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम इधर प्रिये मधु है, और हम हैं तुम उस पार नज़र आते हो कैसे बीन बजाएँ हिय की तुम तो ऐसे पगुराते हो कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर हम प्रयत्न करते रहते हैं तिस पर तुम क्रोधित होते हो हम तुम सेे डरते रहते हैं ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते तुम थोड़ा सा इतरा लेते हम थोड़ी मनुहार लगाकर कोप तुम्हारा छितरा देते किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था और ना इस का कोई बोध था हम सेे तुम कटते जाते थे यथा दुग्ध, फटते जाते थे इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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