सारी दुनिया में ला-जवाब बनो इंतिख़ाबों का इंतिख़ाब बनो अम्न-ओ-इंसानियत की आब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम हो हिन्दोस्ताँ के मुस्तक़बिल तुम से रौशन हो जादा-ए-मंज़िल आरज़ूओं के माहताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो कामयाबी की शाह-राहों में मादर-ए-हिन्द की निगाहों में जगमगाते हसीन ख़्वाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो दूर दुनिया से तीरगी कर दो सारे आलम में रौशनी कर दो इल्म-ओ-हिकमत के आफ़्ताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम से दुनिया में शांति फैले मुर्दा क़ौमों में ज़िंदगी फैले अपने मक़्सद में कामयाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिंद के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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अगर तेरे मेदे में है कुछ गिरानी तो लेमू का रस पी ले अदरक का पानी अगर दाँत के दर्द से तू है बेकल तो सरसों का तेल और सेंधा नमक मल थकन से अगर तेरे आ'ज़ा हैं ढीले तो थोड़ा सा तू गुनगुना दूध पी ले गले में ख़राबी है नज़ले के मारे तो नमकीन पानी के कर ले ग़रारे अगर ख़ूँ है कम और बल्ग़म ज़ियादा तो गाजर भी खा और शलजम ज़ियादा जिगर ही के दम से है इंसान जीता जिगर का मरज़ है तो खा ले पपीता अगर ज़ेहन कमज़ोर रहता है अक्सर तो खा शहद के साथ बादाम घिस कर अगर तुझ को एहसास है ज़ोफ़-ए-दिल का तो हर रोज़ ले आँवले का मुरब्बा
Kaif Ahmad Siddiqui
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अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे हमीं गौतम हमीं 'गाँधी' हमीं 'ज़ाकिर' हमीं 'नेहरू' हमीं 'चिश्ती' हमीं नानक हमीं हैदर हमीं टीपू हमीं अपने वतन की सरहदों के पासबाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं में कोई टीचर और कोई डॉक्टर होगा कोई ता'लीम का अफ़सर कोई इंजीनियर होगा हमीं हर चीज़ के महरम हमीं साइंसदाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं रौशन करेंगे चाँद का हर राज़-ए-पोशीदा हमीं ज़ाहिर करेंगे हक़ की हर आवाज़-ए-पोशीदा हमीं क़ुदरत के हर राज़-ए-निहाँ के राज़-दाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं हैं 'सूर'-ओ-'तुलसी' 'ग़ालिब'-ओ-'टैगोर' भी होंगे हमीं क्या 'कैफ़' हम लोगों से बेहतर और भी होंगे कि जो दुनिया के गुलशन में बहार-ए-जावेदाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे
Kaif Ahmad Siddiqui
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ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले इक साथ रह के कैसा बचपन गुज़र रहा था कितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना फिर एक दूसरे को आपस ही में मनाना अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले
Kaif Ahmad Siddiqui
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वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक फ़र्द के हमदर्द ग़म-गुसार-ए-वतन सदाक़तों के परस्तार झूट के दुश्मन निज़ाम-ए-अम्न के रूह-ए-रवाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी वो एकता के पुजारी हर एक के भाई वो फ़ख़्र-ए-क़ौम वो इंसानियत के शैदाई ज़मीं पे रह के भी इक आसमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी कली कली को तबस्सुम का एक ढंग दिया हर एक फूल को अपने लहू का रंग दिया बहार-ए-गुलशन-ए-अम्न-ओ-अमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक दिल में जलाया चराग़-ए-आज़ादी है जिन के ख़ून से शादाब बाग़-ए-आज़ादी हमारे मुल्क के वो बाग़बाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी सुनी न बात तशद्दुद भरे उसूलों की महक लुटाई अहिंसा के नर्म फूलों की ख़ुलूस-ओ-इज्ज़ के इक गुलिस्ताँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी
Kaif Ahmad Siddiqui
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सारे वतन के राज दुलारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे भारत माँ की आँख के तारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे बुनियादी ता'लीम के बानी हुब्ब-ए-वतन की ज़िंदा कहानी इल्म के दरिया अम्न के धारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मा'मूली उस्ताद से बढ़ कर बन गए सारे मुल्क के रहबर ग़म से कभी हिम्मत ही न हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे देख के तेरी जेहद-ए-मुसलसल छट गए ख़ुद ही दुख के बादल फूल बने ग़म के अंगारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे गाँधी जी के राज़ के महरम और जवाहर लाल के हमदम अम्न-ओ-अमाँ के पालन-हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे आज़ादी के दीप जलाए तू ने वतन से दूर भगाए अहद-ए-ग़ुलामी के अँधियारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मुश्तरका तहज़ीब के मज़हर इज्ज़-ओ-ख़ुलूस अख़्लाक़ के पैकर सब की उम्मीदों के सहारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे तू है वतन का रहबर सच्चा क्यूँ न वतन का बच्चा बच्चा नाम तिरा इज़्ज़त से पुकारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर पियारे
Kaif Ahmad Siddiqui
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