वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक फ़र्द के हमदर्द ग़म-गुसार-ए-वतन सदाक़तों के परस्तार झूट के दुश्मन निज़ाम-ए-अम्न के रूह-ए-रवाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी वो एकता के पुजारी हर एक के भाई वो फ़ख़्र-ए-क़ौम वो इंसानियत के शैदाई ज़मीं पे रह के भी इक आसमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी कली कली को तबस्सुम का एक ढंग दिया हर एक फूल को अपने लहू का रंग दिया बहार-ए-गुलशन-ए-अम्न-ओ-अमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक दिल में जलाया चराग़-ए-आज़ादी है जिन के ख़ून से शादाब बाग़-ए-आज़ादी हमारे मुल्क के वो बाग़बाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी सुनी न बात तशद्दुद भरे उसूलों की महक लुटाई अहिंसा के नर्म फूलों की ख़ुलूस-ओ-इज्ज़ के इक गुलिस्ताँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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ये दौर-ए-नौ-मुबारक फ़र्ख़न्दा-अख़तरी का जम्हूरियत का आग़ाज़ अंजाम क़ैसरी का क्या जाँ-फ़ज़ा है जल्वा ख़ुर्शीद-ए-ख़ावरी का हर इक शुआ-ए-रक़्साँ मिस्रा है अनवरी का रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का भारत की बरतरी में किस को कलाम है अब था जो रहीन-ए-पस्ती गर्दूं-मक़ाम है अब जम्हूरियत पे क़ाएम सारा निज़ाम है अब आला है या है अदना बा-एहतिराम है अब रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का सदियों के बंद टूटे आज़ाद होगए हम क़ैद-ए-गिराँ से छूटे दिल-ए-शाद हो गए हम बे-ख़ौफ़ बे-नियाज़-ए-सय्याद हो गए हम फिर बस गया नशेमन आबाद होगए हम रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का जो मुज़्तरिब थी दिल में वो आरज़ू बर आई तकमील-ए-आरज़ू ने दिल की ख़लिश मिटाई जिस मुल्क पर ग़ुलामी बन बन के शाम छाई सुब्ह-ए-मसर्रत उस को अल्लाह ने दिखाई रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-'गाँधी' तफ़्सीर-ए-हाल-ए-'नेहरू' 'आज़ाद' की रियाज़त 'सरदार' की तगापू रख़्शाँ है हुर्रियत का ज़ेबा-निगार दिल-जू तस्कीन-ए-क़ल्ब मुस्लिम आराम-ए-जान-ए-हिन्दू रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का क़ुर्बां हुए जो इस पर रूहें हैं शाद उन की हम जिस से बहरा-वर हैं वो है मुराद उन की है बस-कि सरफ़रोशी शायान-ए-दाद उन की भारत की इस ख़ुशी में शामिल है याद उन की रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का आज़ाद हो गया जब हिन्दोस्ताँ हमारा है सूद के बराबर हर इक ज़ियाँ हमारा मंज़िल पे आन पहुँचा जब कारवाँ हमारा क्यूँँ हो गुबार-ए-मंज़िल ख़ातिर-निशाँ हमारा रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का ऐवान-ए-फ़र्रुख़ी की तामीर-ए-नौ मुबारक आईन-ए-ज़िंदगी की तदबीर-ए-नौ मुबारक हर ज़र्रा-ए-वतन को तनवीर-ए-नौ मुबारक भारत के हर बशर को तौक़ीर-ए-नौ मुबारक रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का भारत का अज़्म है ये तौफ़ीक़ ऐ ख़ुदा दे दुनिया से ईन-ओ-आँ की तफ़रीक़ को मिटा दे अम्न-ओ-अमाँ से रहना हर मुल्क को सिखा दे हर क़ौम शुक्रिये में हर साल ये सदा दे रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का
Tilok Chand Mahroom
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लर्ज़ा था जिस के बच्चों का नाम सुन के आलम होता था जिन के आगे शे'रों का ख़त्म दम-ख़म जिन का उड़ा हमेशा अर्श-ए-बरीं पे परचम अज़्मत का जिन की डंका बजता रहेगा दाइम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में करोड़ों बे-मिस्ल थे दिलावर लाखों थे भीम अर्जुन बलराम श्याम 'रघुबर' थे तीर जिन के ज़ेवर बिस्तर थे जिन के ख़ंजर रू-ए-ज़मीं पे जिन का पैदा हुआ न हम-सर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क पर था नाज़ाँ अकबर सा शाह-ए-आज़म उड़ता था आसमाँ पर शोहरत का जिस की परचम था अद्ल का ज़माना इंसाफ़ का था आलम हिंदू मुसलमाँ दोनों रहते थे मिल के बाहम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा थे कालीदास जैसे जिस देश में सुख़न-वर क्या चीज़ उन के आगे यूरोप का शेक्सपियर पामाल हो चुका है वो गुलिस्ताँ सरासर इस ग़ैर-हाल में भी है कुल जहाँ से बेहतर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा 'गौतम' से इल्म-दाँ को जिस ने जनम दिया था 'मीराँ ने जिस ज़मीं पर ख़ुश हो के सम पिया था 'पातनजली' को पैदा जिस मुल्क ने किया था आलम ने फ़लसफ़े का जिन से सबक़ लिया था हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा गोदी में जिस की अब तक गामा सा पहलवाँ है नज़रों में कल जहाँ की जो रुस्तम-ए-ज़माँ है ताक़त का जिस की क़ाइल हर पीर और जवाँ है वो सैंकड़ों जवानों पे आज तक गराँ है हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा वो कोह-ए-नूर हीरा जिस ने किया था पैदा जिस की चमक से अक्सर शाहों का ताज चमका हीरों में कुल जहाँ के माना गया है यकता मुमकिन नहीं अबद तक जिस का जवाब मिलना हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा टैगोर से जहाँ हूँ शाइ'र भी और हुनर-वर जिस की ज़मीं पे अब तक 'गाँधी' है और जवाहर 'अबुल-कलाम' जैसे जिस मुल्क में हों लीडर अज़्मत का जिन की सिक्का है कुल जहाँ के दिल पर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा राणा ने जिस ज़मीं पर की तेग़ आज़माई जिस मुल्क पर हज़ारों वीरों ने जाँ गँवाई सहरा में जिस के मोहन ने बाँसुरी बजाई मुर्दा दिलों में उल्फ़त की आग सी लगाई हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में थीं लाखों सीता सी पाक-दामन तेग़ों के साए में जो करती थी धर्म-पालन शादाब हो रहा था इस्मत का जिन से गुलशन क़ाइल हैं जिन की इस्मत के दोस्त और दुश्मन हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा ज़रख़ेज़ मुल्क कोई जिस के नहीं बराबर रोज़-ए-अज़ल से अब तक सरसब्ज़ है सरासर कानों में आज तक भी जिस के हैं सीम और ज़र जिस की ज़मीं उगलती है ला'ल और जवाहर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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बहुत लड़ते हो तुम मैं भी तुनुक-ताबी में ख़ासी फ़र्द हूँ सो ख़ूब जमती है बहम अपनी मैं मुश्किल रास्तों की गर्द पलकों पर सँभाले आई हूँ तुम तक मिरे नज़दीक के हर मंतक़े में तुम भी अपने बालों की चाँदी पे इतराते परागंदा मिज़ाजी में गुँधे उखड़े हुए तारों की पगडंडी के दिल में घूमते हो मोहब्बत की भड़क लफ़्ज़ों में कम आँखों की हलचल में ज़ियादा ले के फिरती हूँ मिरे नोकीले लहजे की चुभन के उस तरफ़ दिल की बहुत ही रेशमी हद तक तुम्हारी आँख जाती है तअ'ल्लुक़ में रवादारी का नम जाने कहाँ से आता है और आ के हम दोनों की आवेज़िश की सब मुँह-ज़ोरियाँ ज़ंजीर करता है सुनो सब गुफ़्तुगू के सिलसिले मेरी तुम्हारी ख़ामुशी की भीग से सरसब्ज़ रहते हैं मिरी नज़्मों का मरकज़ आज के पल की सजल दुनिया में बस तुम हो तुम्हीं से बरसर-ए-पैकार हूँ और बे-तहाशा मुल्तफ़ित भी तुम तआरुज़ के गुदाज़ों में मुझे देखो मैं अपने दिल के तौसन को बहुत सरपट भगाती ख़ाक के तूफ़ाँ जगाती जिस गुलिस्ताँ की तमन्ना की डगर पर जा रही हूँ उस की हद पर तुम उस की हद पर तुम कहीं इक पेड़ के पहलू में दिल बन कर धड़कते हो कहीं फ़ितरत के पेच-ओ-ताब में ज़ंजीर हो और धूप की यलग़ार में मेरे लिए छाँव का इक ना-मुख़्ततिम एहसास बनते हो बहुत ही दूर से बस तुम ही मुझ को साफ़ सुनते हो
Mahnaz Anjum
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लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिंद ये हिन्दियों की फ़िक्र-ए-फ़लक-रस का है असर रिफ़अत में आसमाँ से भी ऊँचा है बाम-ए-हिंद इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद ए'जाज़ इस चराग़-ए-हिदायत का है यही रौशन-तर-अज़-सहर है ज़माने में शाम-ए-हिंद तलवार का धनी था शुजाअ'त में फ़र्द था पाकीज़गी में जोश-ए-मोहब्बत में फ़र्द था
Allama Iqbal
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अगर तेरे मेदे में है कुछ गिरानी तो लेमू का रस पी ले अदरक का पानी अगर दाँत के दर्द से तू है बेकल तो सरसों का तेल और सेंधा नमक मल थकन से अगर तेरे आ'ज़ा हैं ढीले तो थोड़ा सा तू गुनगुना दूध पी ले गले में ख़राबी है नज़ले के मारे तो नमकीन पानी के कर ले ग़रारे अगर ख़ूँ है कम और बल्ग़म ज़ियादा तो गाजर भी खा और शलजम ज़ियादा जिगर ही के दम से है इंसान जीता जिगर का मरज़ है तो खा ले पपीता अगर ज़ेहन कमज़ोर रहता है अक्सर तो खा शहद के साथ बादाम घिस कर अगर तुझ को एहसास है ज़ोफ़-ए-दिल का तो हर रोज़ ले आँवले का मुरब्बा
Kaif Ahmad Siddiqui
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सारे वतन के राज दुलारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे भारत माँ की आँख के तारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे बुनियादी ता'लीम के बानी हुब्ब-ए-वतन की ज़िंदा कहानी इल्म के दरिया अम्न के धारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मा'मूली उस्ताद से बढ़ कर बन गए सारे मुल्क के रहबर ग़म से कभी हिम्मत ही न हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे देख के तेरी जेहद-ए-मुसलसल छट गए ख़ुद ही दुख के बादल फूल बने ग़म के अंगारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे गाँधी जी के राज़ के महरम और जवाहर लाल के हमदम अम्न-ओ-अमाँ के पालन-हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे आज़ादी के दीप जलाए तू ने वतन से दूर भगाए अहद-ए-ग़ुलामी के अँधियारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मुश्तरका तहज़ीब के मज़हर इज्ज़-ओ-ख़ुलूस अख़्लाक़ के पैकर सब की उम्मीदों के सहारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे तू है वतन का रहबर सच्चा क्यूँ न वतन का बच्चा बच्चा नाम तिरा इज़्ज़त से पुकारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर पियारे
Kaif Ahmad Siddiqui
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लो घंटा बजा इंटरवल का अब वक़्त आया है हलचल का अब जो चाहे वो शोर करे अब हर लड़का ख़ुद टीचर है जिस चीज़ को पाया तोड़ दिया हाथों में सब के सनीचर है गो आज का दिन है मंगल का लो घंटा बजा इंटरवल का देखो इक छोटे बच्चे से वो छीन रहा है लंच कोई कुर्सी को पटख़ कर कुर्सी पर वो फेंक रहा है बेंच कोई स्कूल बना घर पागल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ अपनी सेहत पर नाज़ाँ गामा की तरह से अकड़ते हैं कुछ ताल ठोंक कर मैदाँ में रुस्तम की तरह से लड़ते हैं हर सम्त है मंज़र दंगल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ मौसीक़ी के मतवाले कुछ फ़िल्मी गाने गाते हैं कुछ मीर के शे'रों के रसिया कुछ क़ौमी तराने गाते हैं कुछ क़िस्सा आल्हा ऊदल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ चाट की दूकानों में खड़े पत्तों में कचालू खाते हैं कुछ गर्म पकोड़ी के तालिब कुछ ताज़ा आलू खाते हैं कुछ पापड़ खाते हैं कल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ दौलत-मंदों के लड़के खाते हैं अपनी बिरयानी कुछ भूके मुफ़्लिस बच्चों के मुँह में भर आता है पानी है शौक़ किसी को चावल का लो घंटा बजा इंटरवल का इस नीम के नीचे मैदाँ में मौसम है जहाँ ठंडा ठंडा इक गिरोह खिलाड़ी लड़कों का है खेल रहा गिली डंडा ये लुत्फ़ है बस पल दो पल का लो घंटा बजा इंटरवल का
Kaif Ahmad Siddiqui
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अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे हमीं गौतम हमीं 'गाँधी' हमीं 'ज़ाकिर' हमीं 'नेहरू' हमीं 'चिश्ती' हमीं नानक हमीं हैदर हमीं टीपू हमीं अपने वतन की सरहदों के पासबाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं में कोई टीचर और कोई डॉक्टर होगा कोई ता'लीम का अफ़सर कोई इंजीनियर होगा हमीं हर चीज़ के महरम हमीं साइंसदाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं रौशन करेंगे चाँद का हर राज़-ए-पोशीदा हमीं ज़ाहिर करेंगे हक़ की हर आवाज़-ए-पोशीदा हमीं क़ुदरत के हर राज़-ए-निहाँ के राज़-दाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं हैं 'सूर'-ओ-'तुलसी' 'ग़ालिब'-ओ-'टैगोर' भी होंगे हमीं क्या 'कैफ़' हम लोगों से बेहतर और भी होंगे कि जो दुनिया के गुलशन में बहार-ए-जावेदाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे
Kaif Ahmad Siddiqui
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ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले इक साथ रह के कैसा बचपन गुज़र रहा था कितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना फिर एक दूसरे को आपस ही में मनाना अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले
Kaif Ahmad Siddiqui
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