"हम दोनों" चलो हम दोनों एक दूसरे पर यक़ीन करते हैं चलो ऐसे आपस में दोनों रफ़ाक़त करते हैं माना इश्क़ है आफ़ताब का गोला चलो इस को हम दोनों माहताब करते हैं ज़ख़्म माना दिए हैं गहरे ज़माने ने हम दोनों अब साथ रह कर इनसे लड़ते हैं ये लोग ऐसे दरख़्तों से हैं जो न फल देते और न ही छाँव करते हैं रश्क करते हैं तो करने दो इनको हम दोनों शजर और शाख बनते हैं ज़माना हम दोनों को मैं और तुम करता है चलो इस के ज़ेहन का भी इलाज करते हैं यहाँ जीने में हैं ग़म बहुत तो चलो फिर हम दोनों एक दूसरे में रहते हैं चाहे ये ज़माना हमारे शे'र न पढ़े चलो हम दोनों तो मीर-ओ-ग़ालिब पढ़ते हैं
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"ज़िंदगी है क्या" बे-मन उम्र गुजारना ज़िंदगी है क्या रोज़ टूट कर बिखरना ज़िंदगी है क्या हम को रोज़ आकार हर कोई जीने लगता है और उस का आकार चले जाना ज़िंदगी है क्या ज़िंदगी कितना और सीखना है मुझ पर ये तेरा सितम ढाना ज़िंदगी है क्या दो वक़्त की रोटी के ख़ातिर हर दर पर हाथ फैलाना ज़िंदगी है क्या अगर तुम रखते हो ज़रूरी डिग्री-याफ़्ता तो एक भली नौकरी को तरसना ज़िंदगी है क्या मुसलसल ख़्वाबों के लिए जगना और उन ख़्वाबों का टूटना ज़िंदगी है क्या कुछ नए तजरबे सीखने के ख़ातिर अंगारों पे यूँँ रोज़ चलना ज़िंदगी है क्या जवानी के इस सुहाने सफ़र पर मोहब्बत के लिए दर बदर भटकना ज़िंदगी है क्या ये मसअला समझ आया ही नहीं चोट खाना और फिर सँभालना ज़िंदगी है क्या एक दो नंबरों के खेल में ख़ुद को तबाह करना ज़िंदगी है क्या जितना कम हुआ नंबरों का अंतर उतना नौकरी से दूर जाना ज़िंदगी है क्या गाँव से शहर आया था एक सुलझा लड़का उस का यहाँ उलझ कर रहना ज़िंदगी है क्या
Lalit Mohan Joshi
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हुक्मरान लूटा है मुफ़्लिसी भूख ने मेरे देश को लूटा है इन अमीरों ने मेरे देश को और डंके की चोट पर कहता हूँ मैं बदलते हुक्मरानों ने लूटा है मेरे देश को रोते बच्चे के हाथ में जैसे देते हैं खिलौना वैसे ये हुक्मरान चुप कराते हैं मेरे देश को कैसे कैसे प्रलोभन से अपने कुकर्म छुपाते हैं ये हुक्मरान ऐसे बहलाते फुसलाते हैं मेरे देश को झूठ इन के बिकते हैं सर-ए-बाज़ार में इस बाज़ार का हर दुकानदार डराता है मेरे को चुप हैं लब सी गए हैं ग़लत है सो ये ज़ख़्म पे ज़ख़्म देते हैं मेरे देश को सुना है चुनावी समय है चलो कुछ करते हैं सबब बताते हैं उन को जो आँख दिखाते हैं मेरे देश को
Lalit Mohan Joshi
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नज़्म - वो क्या है उस की आँखें कैसी हैं उस की आँखें रब सी हैं उस की बातें कैसी हैं उस की बातें रौनक़ हैं उस की यादें कैसी हैं मेरी रातों जैसी हैं उस की यादें हिज्र है क्या ये फ़क़त बेकार किस ने बोली है उस का चेहरा कैसा है उस का चेहरा चाँद सा है उस की ज़ुल्फ़ें कैसी है उस की ज़ुल्फ़ें क़ाएनात है उस का साथ चलना क्या है मेरा आगे और आगे बढ़ना है उस की बिंदिया कैसी है माथे पर चाँद जैसी है उस का बोलना कैसा है सारे फ़ज़ा में फ़क़त प्यार ही घोलना है बाग़ में उस का होना कैसा है सारे फूलों को बस खिलना है उस सेे मुहब्बत किस को है उस सेे मुहब्बत सब को है जिस को उस ने चाहा है उस का मुक़द्दर रब ने लिक्खा है मेरी ग़ज़लें मेरी नज़्में क्या है उन के सारे हर्फ़ और सारे मिसरे उस पर है मेरी ग़ज़ल का मतला क्या है उस का चेहरा है शे'र के मिसरे क्या हैं उस की दो आँखें हैं ग़ज़ल का क़ाफ़िया क्या है क़ाफ़िया उस के लब हैं तो रदीफ़ क्या है वो उस की सुंदरता है बताओ फिर मक़्ता क्या है वो उस का दिल है उसपर क्या क्या जँचता है उस पर साड़ी सूट सब जँचता है उस के गाल में पड़ता वो गड्ढा देखो मुझ को दीवाना करता है उस का हुस्न तो है बहुत सुंदर रूह में उस के रब बसता है
Lalit Mohan Joshi
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"अश्क" अश्क तेरे हों या मेरे अश्क अश्क होते हैं अश्क का कोई न मज़हब होता है न कोई जात होती है अश्क अश्क होते हैं कभी ये सँभालते हैं तो कभी बिगाड़ते हैं ज़िंदा हैं तो अश्क हैं है बा'द मौत के भी अश्क शजर के अपने अश्क हैं शाख के भी अपने अश्क हैं फूल के अपने अश्क हैं कली के भी अपने अश्क हैं आँख के अपने अश्क हैं ज़ेहन के अपने अश्क हैं लब के अपने अश्क हैं दिल के भी कुछ अश्क हैं दरिया के अपने अश्क हैं समुंदर के अपने अश्क हैं माशूका के अपने अश्क हैं माशूक के अपने अश्क हैं राह चलते राही के अश्क हैं तवायफ़ के अपने अश्क हैं ज़ख़्म के अपने अश्क हैं तो मरहम के अपने अश्क हैं वफ़ा के अपने अश्क हैं बे-वफ़ा के भी अपने अश्क हैं मुफ़्लिसी के अपने अश्क हैं अमीरी के अपने अश्क हैं बिना बाम-ओ-दीवार के अश्क हैं तो बाम-ओ-दीवार में भी अश्क हैं बचपन के थोड़े अश्क हैं जवानी में ज़ियादा अश्क हैं बुढ़ापे तो अश्कों का अश्क हैं ज़रूरी नहीं ग़म के अश्क हैं ख़ुशी के अपने अश्क हैं
Lalit Mohan Joshi
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"इक लड़की" ये पूरी दुनिया बहुत अच्छी लगती है जब वो लड़की रस्ता मेरा तकती है फिर ये दुनिया सारी अपनी लगती है जब प्यार से बाहों में वो लड़की भरती है और ये सारी दुनिया एक तरफ़ है या'नी बाक़ी एक तरफ़ वो लड़की है चेहरे की उस की मासूम वो हँसी जैसे मुझ को जीवन नया अता करती है फिर मुझ अधूरे से लड़के को साथ आ कर मेरे वो पूरा करती है सारे ख़्वाब भी पूरे होने लगते हैं जब मेरे साथ वो लड़की रहती है सच पूछो तो वो लड़की इस नादान लड़के को आ कर नादान से वो समझदार करती है उस प्यारी सी लड़की को मैं क्या कहूँ मेरी हर ग़ज़ल को वो मुकम्मल करती है वो लड़की मेरी ग़ज़ल के मतले से शुरू होकर शे'र क़ाफ़िया रदीफ़ से होकर मक़्ते पर रुकती है वो लड़की कभी बहर में तो कभी बिना बहर के भी ख़ूब-सूरत लगती है साथ में उस के चार क़दम बस चल पाऊँ मेरी ख़ुदा से बस यही दुआ रहती है
Lalit Mohan Joshi
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