चलो फिर एक नया मज़हब बनाएँ कुछ और लोगों को बाँटे आपस में बढ़ाएँ रंजिशें उन की उकसाएँ लोगों को क़त्ल-ए-आम के लिए कुछ मरेंगे कुछ लहू-लुहान होंगे चिंगारी जलती रहेगी पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक दूसरे को नीचा दिखाने की कुछ और ख़ुद-ग़रज़ कूद पड़ेंगे इस रंजिश के खेल में सकेंगे रोटियाँ मय्यत की चिंगारी पर आग बुझ गई तो मज़ार के दिए स फिर जला देंगे जला कर घर हमारा अपना महल रौशन करेंगे बीत जाएँगी कई पीढ़ियाँ भूल जाएँगी कारन आपसी लड़ाई का धर्म-गुरु फिर उठेंगे सीख देंगे धर्म-रक्षा का कहेंगे लड़-मरो अपने धर्म के लिए लेकिन कभी स्वयं धर्म की रक्षा के लिए लड़ने ना आएँगे चलो फिर एक नया मज़हब बनाएँ कुछ और लोगों को बाँटें आपस में
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"एक लड़का" एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ जी मचलता था एक एक शय पर जैब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए आज मेला लगा है उसी शान से आज चाहूँ तो इक इक दुकाँ मोल लूँ आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ ना-रसाई का अब जी में धड़का कहाँ पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ
Ibn E Insha
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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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क्या होगी पेड़ों की ज़ात कभी सोचा है आप ने सवाल अटपटा है लेकिन क्यूँँ नहीं बाँटा उसे हम ने ज़ात-पात में चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को फल वाले पेड़ और फूल वाले पेड़ बड़ी बड़ी भुजाओं वाले छोटी छोटी टहनियों वाले पेड़ वो आम का पेड़ जो हवन में जलता हैं बाभन होगा क्यूँँकि उस के पत्तों की पूजा भी होती हैं फल भी खुब रसीला मंत्रो की तरह बबूल का पेड़ छाया नहीं देता उस के काँटे चुभ जाए तो दर्द होता है और ख़ून निकलता है लेकिन बड़ा मज़बूत होता है बबूल शायद ठाकुर होगा बनिया तो महुवा होगा उस के पत्तों से पत्तल बनती हैं रसीले फल आँटे में मीज कर गुजिया बनाते हैं सुखा कर उस के फल दुकान पर बेच देते हैं तेल भी मिलता है महुए की कोइय्या से लकड़ी तो उस की बड़े काम आती हैं कुछ पेड़ है जो जल्दी जल्दी बढ़ते है उन की लकड़ी जलावन बनती हैं अमलतास मेरा हरीजन होगा बस बढ़ता है और कटता है उस के कटने पर किसी को दुख नहीं होता सवाल मेरा पढ़ कर सोचोगे तुम पागल हो गया बस्ती बहकी बहकी सी बातें करता है तो क्यूँँ नहीं सोचते इंसानो को ज़ात-पात में बाँटने पर चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को
Kamal Upadhyay
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चाँद भी कंबल ओढ़े निकला था सितारे ठिठुर रहें थे सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ रिश्ते जो बस नाम के बचे थे खींच रहा था मैं उन को कभी वो मुझे खींचा करते थे सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ रिश्ते बहुत कमज़ोर हो चले थे उन की लपट भी बहुत कम थी कुछ इतने पतले की जलने से पहले राख हो गए सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ पुराने रिश्ते थे मेरे जनम के पहले के सजोया था उन्हें मैं ने उन्हें नहीं था कोई लगाव मुझ से सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े
Kamal Upadhyay
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जब कभी तुम सिगरेट जलाने की कोशिश करते थे मैं फूँक मार कर बुझा देती थी कितनी बार कहा था तुम से ये ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है मेरा जो दिल है वो तुम्हारे सिगरेट के धुएँ स ख़राब हो रहा है ऐश-ट्रे में बढ़ती राख स ज़िंदगी मेरी सियाह हुई जाती है बुझाया करो इन्हें जलाने से पहले एक कश ज़िंदगी का बुझी हुई सिगरेट से लगाना मैं ने संजो कर रखे है कुछ पुराने डब्बे सिगरेट के जिस पर हम ने ज़िंदगी का प्लान बनाया था वो सिगरेट ख़राब हो गई है लेकिन प्लान अभी भी संजीदा लगता है अब ना जलाना सिगरेट अब मैं वहाँ नहीं हूँ जलती सिगरेट बुझाने को
Kamal Upadhyay
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वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं कोई बता दो उन को कोई बता दो उन को मेरा चाँद कैसा दिखता है कभी देखना पूनम की रात में एक धुंदली धुंदली सी छवी नज़र आएगी जैसे कोई बच्चा माँ स लिपटा हो वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहाँ से झूटी तस्वीरें लाए हैं कहते हैं चाँद मरुस्थल हैं अरे मैं ने तो कई रातें चाँद के पानी से पी कर गुज़ार दी एक रात बाढ़ आ गई चाँद पर सुब्ह गीला तकिया मैं ने धूप में सुखाया था वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं चाँद की बदलती चाँदनी से कई दिल जुड़े हैं वो चाँद की अठखेलियों को कोई विग्यान बताते हैं कहते हैं एक उपग्रह है अरे हम तो बचपन स मामा कहते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो शरमा के पल भर के लिए छुप जाता है उसे ऐ चंद्र पर ग्रहन कहते हैं उन्हें क्या पता कैसे गुज़ारता हूँ मैं अमावस की रातें बिना उस के वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं मुझे लगता किसी ग़लत पते पर चले गए थे ऐ एस्ट्रोनॅाट और चाँद से है उन की पुरानी दुश्मनी इस लिए सारा दोश चाँद को देते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं
Kamal Upadhyay
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समुंदर की कुछ बूंदों से बात की वो भी अपने वजूद को ले कर व्याकुल हैं विशाल समुंदर में कहा कोई उन की है सुनता जबकि उन से ही समुंदर है उन के बिना समुंदर बस मरुस्थल है बूँदें दिन-रात प्रयत्न करती हैं एक बूँद दूसरे को आगे ढकेल कर समुंदर का वजूद क़ाएम रखती हैं उन को एहसास है अपने होने का लेकिन समुंदर हर बार इस बात को भूल जाता है सोचों अगर बूँदें विद्रोह कर दें बना कर दोस्त सूरज को ऊपर आकाश में बादल से मिल जाएँ हो सकता है दोस्ती धरा से कर लें उस के गर्त में समा जाएँ सूख जाएगा समुंदर बूंदों का वजूद तो हमेशा बना रहेगा समुंदर को अभिमान किस बात का क्या पता क्या उसे नहीं पता किस ने किया उस का वजूद क़ाएम मिट जाएगा एक दिन बस बूंदों को क़दम विद्रोह का उठाना है
Kamal Upadhyay
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