nazmKuch Alfaaz

क्या होगी पेड़ों की ज़ात कभी सोचा है आप ने सवाल अटपटा है लेकिन क्यूँँ नहीं बाँटा उसे हम ने ज़ात-पात में चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को फल वाले पेड़ और फूल वाले पेड़ बड़ी बड़ी भुजाओं वाले छोटी छोटी टहनियों वाले पेड़ वो आम का पेड़ जो हवन में जलता हैं बाभन होगा क्यूँँकि उस के पत्तों की पूजा भी होती हैं फल भी खुब रसीला मंत्रो की तरह बबूल का पेड़ छाया नहीं देता उस के काँटे चुभ जाए तो दर्द होता है और ख़ून निकलता है लेकिन बड़ा मज़बूत होता है बबूल शायद ठाकुर होगा बनिया तो महुवा होगा उस के पत्तों से पत्तल बनती हैं रसीले फल आँटे में मीज कर गुजिया बनाते हैं सुखा कर उस के फल दुकान पर बेच देते हैं तेल भी मिलता है महुए की कोइय्या से लकड़ी तो उस की बड़े काम आती हैं कुछ पेड़ है जो जल्दी जल्दी बढ़ते है उन की लकड़ी जलावन बनती हैं अमलतास मेरा हरीजन होगा बस बढ़ता है और कटता है उस के कटने पर किसी को दुख नहीं होता सवाल मेरा पढ़ कर सोचोगे तुम पागल हो गया बस्ती बहकी बहकी सी बातें करता है तो क्यूँँ नहीं सोचते इंसानो को ज़ात-पात में बाँटने पर चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को

Related Nazm

"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

16 likes

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

42 likes

क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

42 likes

More from Kamal Upadhyay

जब कभी तुम सिगरेट जलाने की कोशिश करते थे मैं फूँक मार कर बुझा देती थी कितनी बार कहा था तुम से ये ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है मेरा जो दिल है वो तुम्हारे सिगरेट के धुएँ स ख़राब हो रहा है ऐश-ट्रे में बढ़ती राख स ज़िंदगी मेरी सियाह हुई जाती है बुझाया करो इन्हें जलाने से पहले एक कश ज़िंदगी का बुझी हुई सिगरेट से लगाना मैं ने संजो कर रखे है कुछ पुराने डब्बे सिगरेट के जिस पर हम ने ज़िंदगी का प्लान बनाया था वो सिगरेट ख़राब हो गई है लेकिन प्लान अभी भी संजीदा लगता है अब ना जलाना सिगरेट अब मैं वहाँ नहीं हूँ जलती सिगरेट बुझाने को

Kamal Upadhyay

0 likes

समुंदर की कुछ बूंदों से बात की वो भी अपने वजूद को ले कर व्याकुल हैं विशाल समुंदर में कहा कोई उन की है सुनता जबकि उन से ही समुंदर है उन के बिना समुंदर बस मरुस्थल है बूँदें दिन-रात प्रयत्न करती हैं एक बूँद दूसरे को आगे ढकेल कर समुंदर का वजूद क़ाएम रखती हैं उन को एहसास है अपने होने का लेकिन समुंदर हर बार इस बात को भूल जाता है सोचों अगर बूँदें विद्रोह कर दें बना कर दोस्त सूरज को ऊपर आकाश में बादल से मिल जाएँ हो सकता है दोस्ती धरा से कर लें उस के गर्त में समा जाएँ सूख जाएगा समुंदर बूंदों का वजूद तो हमेशा बना रहेगा समुंदर को अभिमान किस बात का क्या पता क्या उसे नहीं पता किस ने किया उस का वजूद क़ाएम मिट जाएगा एक दिन बस बूंदों को क़दम विद्रोह का उठाना है

Kamal Upadhyay

0 likes

चाँद भी कंबल ओढ़े निकला था सितारे ठिठुर रहें थे सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ रिश्ते जो बस नाम के बचे थे खींच रहा था मैं उन को कभी वो मुझे खींचा करते थे सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ रिश्ते बहुत कमज़ोर हो चले थे उन की लपट भी बहुत कम थी कुछ इतने पतले की जलने से पहले राख हो गए सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ पुराने रिश्ते थे मेरे जनम के पहले के सजोया था उन्हें मैं ने उन्हें नहीं था कोई लगाव मुझ से सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े

Kamal Upadhyay

0 likes

क्यूँँ नहीं सोने देते मुझ को जब ज़िंदा था तब पर भी यही करते थे यहाँ तो सुकून दो मुझे हर रोज़ चले आते हो दफ़नाने एक मुर्दा लाश को ज़िंदा कर जाते हो अभी तो गला नहीं मैं पूरी तरह सुना है कुछ दिन में खोद कर मुझ को एक छोटे बक्से में भर दोगे अब यही बचा है मुर्दों को भी चैन की साँस ना लेने देना वो जो क्रॉस मेरे सीने पर लगाया है हटा दो उसे चुभता है मुझे करवट भी नहीं ले पाता क्यूँँकि जगह कम है यहाँ पड़ोस की क़ब्र में एक नया मुसाफ़िर आया है बड़ा ख़ुश-मिज़ाज है कहता है ये ज़िंदगी जीने में बड़ा मज़ा आता है अब मना कर दो लोगों को ना जलाया करे मोम-बत्ती उस की पिघलती बूँदें जब गिरती है मेरे ऊपर तो छाले निकल आते हैं चलो अब चलता हूँ आज सारी रात जाग कर काट दी चलो अब चल कर सोता हूँ

Kamal Upadhyay

0 likes

चलो फिर एक नया मज़हब बनाएँ कुछ और लोगों को बाँटे आपस में बढ़ाएँ रंजिशें उन की उकसाएँ लोगों को क़त्ल-ए-आम के लिए कुछ मरेंगे कुछ लहू-लुहान होंगे चिंगारी जलती रहेगी पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक दूसरे को नीचा दिखाने की कुछ और ख़ुद-ग़रज़ कूद पड़ेंगे इस रंजिश के खेल में सकेंगे रोटियाँ मय्यत की चिंगारी पर आग बुझ गई तो मज़ार के दिए स फिर जला देंगे जला कर घर हमारा अपना महल रौशन करेंगे बीत जाएँगी कई पीढ़ियाँ भूल जाएँगी कारन आपसी लड़ाई का धर्म-गुरु फिर उठेंगे सीख देंगे धर्म-रक्षा का कहेंगे लड़-मरो अपने धर्म के लिए लेकिन कभी स्वयं धर्म की रक्षा के लिए लड़ने ना आएँगे चलो फिर एक नया मज़हब बनाएँ कुछ और लोगों को बाँटें आपस में

Kamal Upadhyay

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Kamal Upadhyay.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Kamal Upadhyay's nazm.