समुंदर की कुछ बूंदों से बात की वो भी अपने वजूद को ले कर व्याकुल हैं विशाल समुंदर में कहा कोई उन की है सुनता जबकि उन से ही समुंदर है उन के बिना समुंदर बस मरुस्थल है बूँदें दिन-रात प्रयत्न करती हैं एक बूँद दूसरे को आगे ढकेल कर समुंदर का वजूद क़ाएम रखती हैं उन को एहसास है अपने होने का लेकिन समुंदर हर बार इस बात को भूल जाता है सोचों अगर बूँदें विद्रोह कर दें बना कर दोस्त सूरज को ऊपर आकाश में बादल से मिल जाएँ हो सकता है दोस्ती धरा से कर लें उस के गर्त में समा जाएँ सूख जाएगा समुंदर बूंदों का वजूद तो हमेशा बना रहेगा समुंदर को अभिमान किस बात का क्या पता क्या उसे नहीं पता किस ने किया उस का वजूद क़ाएम मिट जाएगा एक दिन बस बूंदों को क़दम विद्रोह का उठाना है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म
Tehzeeb Hafi
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क्या होगी पेड़ों की ज़ात कभी सोचा है आप ने सवाल अटपटा है लेकिन क्यूँँ नहीं बाँटा उसे हम ने ज़ात-पात में चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को फल वाले पेड़ और फूल वाले पेड़ बड़ी बड़ी भुजाओं वाले छोटी छोटी टहनियों वाले पेड़ वो आम का पेड़ जो हवन में जलता हैं बाभन होगा क्यूँँकि उस के पत्तों की पूजा भी होती हैं फल भी खुब रसीला मंत्रो की तरह बबूल का पेड़ छाया नहीं देता उस के काँटे चुभ जाए तो दर्द होता है और ख़ून निकलता है लेकिन बड़ा मज़बूत होता है बबूल शायद ठाकुर होगा बनिया तो महुवा होगा उस के पत्तों से पत्तल बनती हैं रसीले फल आँटे में मीज कर गुजिया बनाते हैं सुखा कर उस के फल दुकान पर बेच देते हैं तेल भी मिलता है महुए की कोइय्या से लकड़ी तो उस की बड़े काम आती हैं कुछ पेड़ है जो जल्दी जल्दी बढ़ते है उन की लकड़ी जलावन बनती हैं अमलतास मेरा हरीजन होगा बस बढ़ता है और कटता है उस के कटने पर किसी को दुख नहीं होता सवाल मेरा पढ़ कर सोचोगे तुम पागल हो गया बस्ती बहकी बहकी सी बातें करता है तो क्यूँँ नहीं सोचते इंसानो को ज़ात-पात में बाँटने पर चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को
Kamal Upadhyay
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जब कभी तुम सिगरेट जलाने की कोशिश करते थे मैं फूँक मार कर बुझा देती थी कितनी बार कहा था तुम से ये ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है मेरा जो दिल है वो तुम्हारे सिगरेट के धुएँ स ख़राब हो रहा है ऐश-ट्रे में बढ़ती राख स ज़िंदगी मेरी सियाह हुई जाती है बुझाया करो इन्हें जलाने से पहले एक कश ज़िंदगी का बुझी हुई सिगरेट से लगाना मैं ने संजो कर रखे है कुछ पुराने डब्बे सिगरेट के जिस पर हम ने ज़िंदगी का प्लान बनाया था वो सिगरेट ख़राब हो गई है लेकिन प्लान अभी भी संजीदा लगता है अब ना जलाना सिगरेट अब मैं वहाँ नहीं हूँ जलती सिगरेट बुझाने को
Kamal Upadhyay
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वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं कोई बता दो उन को कोई बता दो उन को मेरा चाँद कैसा दिखता है कभी देखना पूनम की रात में एक धुंदली धुंदली सी छवी नज़र आएगी जैसे कोई बच्चा माँ स लिपटा हो वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहाँ से झूटी तस्वीरें लाए हैं कहते हैं चाँद मरुस्थल हैं अरे मैं ने तो कई रातें चाँद के पानी से पी कर गुज़ार दी एक रात बाढ़ आ गई चाँद पर सुब्ह गीला तकिया मैं ने धूप में सुखाया था वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं चाँद की बदलती चाँदनी से कई दिल जुड़े हैं वो चाँद की अठखेलियों को कोई विग्यान बताते हैं कहते हैं एक उपग्रह है अरे हम तो बचपन स मामा कहते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो शरमा के पल भर के लिए छुप जाता है उसे ऐ चंद्र पर ग्रहन कहते हैं उन्हें क्या पता कैसे गुज़ारता हूँ मैं अमावस की रातें बिना उस के वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं मुझे लगता किसी ग़लत पते पर चले गए थे ऐ एस्ट्रोनॅाट और चाँद से है उन की पुरानी दुश्मनी इस लिए सारा दोश चाँद को देते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं
Kamal Upadhyay
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दूर गगन में कहीं था अब तक खोया बादल आज कई दिनों के बा'द रोया बादल रोता मैं मुस्कुराता हूँ वो ग़म बिताता मैं ख़ुशियाँ मनाता हूँ बादल के आँसू ने सारा जग भिगोया बादल आज कई दिनों के बा'द रोया अब बादल रोता मैं हँसता नहीं था उस के आँसू पर मज़ा कसता नहीं था बादल के आँसू ने हरियाली का मंज़र लाया सपनों सा था दर्पन जग को आँसू ने चमकाया बादल ने जैसे रोने की ज़िद थी ठानी उस के आँसू धरती पर कर रहे थे मन-मानी अब बादल रोता तो मैं भी रोता हूँ अपने सपने उस के आँसू से भिगोता हूँ हरियाली का मंज़र जैसे उजड़ा कही खोया बादल आज कई दिनों के बा'द रोया कुछ महीने बीते बादल मान गया अपने आँसू को थामना जैसे जान गया अब बदल मुस्कुराता मैं मुस्कुराता हूँ रोने पर किसी के न हँसना सब को समझाता हूँ दूर गगन में कही था अब तक खोया बादल आज कई दिनों के बा'द रोया
Kamal Upadhyay
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क्यूँँ नहीं सोने देते मुझ को जब ज़िंदा था तब पर भी यही करते थे यहाँ तो सुकून दो मुझे हर रोज़ चले आते हो दफ़नाने एक मुर्दा लाश को ज़िंदा कर जाते हो अभी तो गला नहीं मैं पूरी तरह सुना है कुछ दिन में खोद कर मुझ को एक छोटे बक्से में भर दोगे अब यही बचा है मुर्दों को भी चैन की साँस ना लेने देना वो जो क्रॉस मेरे सीने पर लगाया है हटा दो उसे चुभता है मुझे करवट भी नहीं ले पाता क्यूँँकि जगह कम है यहाँ पड़ोस की क़ब्र में एक नया मुसाफ़िर आया है बड़ा ख़ुश-मिज़ाज है कहता है ये ज़िंदगी जीने में बड़ा मज़ा आता है अब मना कर दो लोगों को ना जलाया करे मोम-बत्ती उस की पिघलती बूँदें जब गिरती है मेरे ऊपर तो छाले निकल आते हैं चलो अब चलता हूँ आज सारी रात जाग कर काट दी चलो अब चल कर सोता हूँ
Kamal Upadhyay
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