क्यूँँ नहीं सोने देते मुझ को जब ज़िंदा था तब पर भी यही करते थे यहाँ तो सुकून दो मुझे हर रोज़ चले आते हो दफ़नाने एक मुर्दा लाश को ज़िंदा कर जाते हो अभी तो गला नहीं मैं पूरी तरह सुना है कुछ दिन में खोद कर मुझ को एक छोटे बक्से में भर दोगे अब यही बचा है मुर्दों को भी चैन की साँस ना लेने देना वो जो क्रॉस मेरे सीने पर लगाया है हटा दो उसे चुभता है मुझे करवट भी नहीं ले पाता क्यूँँकि जगह कम है यहाँ पड़ोस की क़ब्र में एक नया मुसाफ़िर आया है बड़ा ख़ुश-मिज़ाज है कहता है ये ज़िंदगी जीने में बड़ा मज़ा आता है अब मना कर दो लोगों को ना जलाया करे मोम-बत्ती उस की पिघलती बूँदें जब गिरती है मेरे ऊपर तो छाले निकल आते हैं चलो अब चलता हूँ आज सारी रात जाग कर काट दी चलो अब चल कर सोता हूँ
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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क्या होगी पेड़ों की ज़ात कभी सोचा है आप ने सवाल अटपटा है लेकिन क्यूँँ नहीं बाँटा उसे हम ने ज़ात-पात में चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को फल वाले पेड़ और फूल वाले पेड़ बड़ी बड़ी भुजाओं वाले छोटी छोटी टहनियों वाले पेड़ वो आम का पेड़ जो हवन में जलता हैं बाभन होगा क्यूँँकि उस के पत्तों की पूजा भी होती हैं फल भी खुब रसीला मंत्रो की तरह बबूल का पेड़ छाया नहीं देता उस के काँटे चुभ जाए तो दर्द होता है और ख़ून निकलता है लेकिन बड़ा मज़बूत होता है बबूल शायद ठाकुर होगा बनिया तो महुवा होगा उस के पत्तों से पत्तल बनती हैं रसीले फल आँटे में मीज कर गुजिया बनाते हैं सुखा कर उस के फल दुकान पर बेच देते हैं तेल भी मिलता है महुए की कोइय्या से लकड़ी तो उस की बड़े काम आती हैं कुछ पेड़ है जो जल्दी जल्दी बढ़ते है उन की लकड़ी जलावन बनती हैं अमलतास मेरा हरीजन होगा बस बढ़ता है और कटता है उस के कटने पर किसी को दुख नहीं होता सवाल मेरा पढ़ कर सोचोगे तुम पागल हो गया बस्ती बहकी बहकी सी बातें करता है तो क्यूँँ नहीं सोचते इंसानो को ज़ात-पात में बाँटने पर चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को
Kamal Upadhyay
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जब कभी तुम सिगरेट जलाने की कोशिश करते थे मैं फूँक मार कर बुझा देती थी कितनी बार कहा था तुम से ये ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है मेरा जो दिल है वो तुम्हारे सिगरेट के धुएँ स ख़राब हो रहा है ऐश-ट्रे में बढ़ती राख स ज़िंदगी मेरी सियाह हुई जाती है बुझाया करो इन्हें जलाने से पहले एक कश ज़िंदगी का बुझी हुई सिगरेट से लगाना मैं ने संजो कर रखे है कुछ पुराने डब्बे सिगरेट के जिस पर हम ने ज़िंदगी का प्लान बनाया था वो सिगरेट ख़राब हो गई है लेकिन प्लान अभी भी संजीदा लगता है अब ना जलाना सिगरेट अब मैं वहाँ नहीं हूँ जलती सिगरेट बुझाने को
Kamal Upadhyay
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चलो फिर एक नया मज़हब बनाएँ कुछ और लोगों को बाँटे आपस में बढ़ाएँ रंजिशें उन की उकसाएँ लोगों को क़त्ल-ए-आम के लिए कुछ मरेंगे कुछ लहू-लुहान होंगे चिंगारी जलती रहेगी पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक दूसरे को नीचा दिखाने की कुछ और ख़ुद-ग़रज़ कूद पड़ेंगे इस रंजिश के खेल में सकेंगे रोटियाँ मय्यत की चिंगारी पर आग बुझ गई तो मज़ार के दिए स फिर जला देंगे जला कर घर हमारा अपना महल रौशन करेंगे बीत जाएँगी कई पीढ़ियाँ भूल जाएँगी कारन आपसी लड़ाई का धर्म-गुरु फिर उठेंगे सीख देंगे धर्म-रक्षा का कहेंगे लड़-मरो अपने धर्म के लिए लेकिन कभी स्वयं धर्म की रक्षा के लिए लड़ने ना आएँगे चलो फिर एक नया मज़हब बनाएँ कुछ और लोगों को बाँटें आपस में
Kamal Upadhyay
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वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं कोई बता दो उन को कोई बता दो उन को मेरा चाँद कैसा दिखता है कभी देखना पूनम की रात में एक धुंदली धुंदली सी छवी नज़र आएगी जैसे कोई बच्चा माँ स लिपटा हो वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहाँ से झूटी तस्वीरें लाए हैं कहते हैं चाँद मरुस्थल हैं अरे मैं ने तो कई रातें चाँद के पानी से पी कर गुज़ार दी एक रात बाढ़ आ गई चाँद पर सुब्ह गीला तकिया मैं ने धूप में सुखाया था वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं चाँद की बदलती चाँदनी से कई दिल जुड़े हैं वो चाँद की अठखेलियों को कोई विग्यान बताते हैं कहते हैं एक उपग्रह है अरे हम तो बचपन स मामा कहते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो शरमा के पल भर के लिए छुप जाता है उसे ऐ चंद्र पर ग्रहन कहते हैं उन्हें क्या पता कैसे गुज़ारता हूँ मैं अमावस की रातें बिना उस के वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं मुझे लगता किसी ग़लत पते पर चले गए थे ऐ एस्ट्रोनॅाट और चाँद से है उन की पुरानी दुश्मनी इस लिए सारा दोश चाँद को देते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं
Kamal Upadhyay
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जो बाज़ार चहकता था हर शाम आज कुछ सुनसान सा लग रहा है गोल-गप्पे की दुकान का ठेला जलेबी वाले के चूल्हे पर से बर्तन चाय पे चुस्कियाँ लेते लोग कोई भी आज नज़र नहीं आ रहा नालियों में लाल रंग बह रहा है पता चला रंग नहीं पता चला रंग नहीं ये हिन्दू मुसलमान का ख़ून है कल धर्म के नाम पर फ़साद हुआ सुनता हूँ वो जलेबी वाला मियाँ था गोल-गप्पे वाला हिन्दू था मुझे कैसे पता चलता जलेबियो ने कभी अज़ान नहीं पढ़ी गोल-गप्पो ने कभी गीता नहीं सुनाई जो बाज़ार चहकता था हर शाम आज कुछ सुनसान सा लग रहा है
Kamal Upadhyay
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