nazmKuch Alfaaz

जो बाज़ार चहकता था हर शाम आज कुछ सुनसान सा लग रहा है गोल-गप्पे की दुकान का ठेला जलेबी वाले के चूल्हे पर से बर्तन चाय पे चुस्कियाँ लेते लोग कोई भी आज नज़र नहीं आ रहा नालियों में लाल रंग बह रहा है पता चला रंग नहीं पता चला रंग नहीं ये हिन्दू मुसलमान का ख़ून है कल धर्म के नाम पर फ़साद हुआ सुनता हूँ वो जलेबी वाला मियाँ था गोल-गप्पे वाला हिन्दू था मुझे कैसे पता चलता जलेबियो ने कभी अज़ान नहीं पढ़ी गोल-गप्पो ने कभी गीता नहीं सुनाई जो बाज़ार चहकता था हर शाम आज कुछ सुनसान सा लग रहा है

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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क्या होगी पेड़ों की ज़ात कभी सोचा है आप ने सवाल अटपटा है लेकिन क्यूँँ नहीं बाँटा उसे हम ने ज़ात-पात में चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को फल वाले पेड़ और फूल वाले पेड़ बड़ी बड़ी भुजाओं वाले छोटी छोटी टहनियों वाले पेड़ वो आम का पेड़ जो हवन में जलता हैं बाभन होगा क्यूँँकि उस के पत्तों की पूजा भी होती हैं फल भी खुब रसीला मंत्रो की तरह बबूल का पेड़ छाया नहीं देता उस के काँटे चुभ जाए तो दर्द होता है और ख़ून निकलता है लेकिन बड़ा मज़बूत होता है बबूल शायद ठाकुर होगा बनिया तो महुवा होगा उस के पत्तों से पत्तल बनती हैं रसीले फल आँटे में मीज कर गुजिया बनाते हैं सुखा कर उस के फल दुकान पर बेच देते हैं तेल भी मिलता है महुए की कोइय्या से लकड़ी तो उस की बड़े काम आती हैं कुछ पेड़ है जो जल्दी जल्दी बढ़ते है उन की लकड़ी जलावन बनती हैं अमलतास मेरा हरीजन होगा बस बढ़ता है और कटता है उस के कटने पर किसी को दुख नहीं होता सवाल मेरा पढ़ कर सोचोगे तुम पागल हो गया बस्ती बहकी बहकी सी बातें करता है तो क्यूँँ नहीं सोचते इंसानो को ज़ात-पात में बाँटने पर चलो एक एक कर के बाँटते हैं पेड़ों को

Kamal Upadhyay

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जब कभी तुम सिगरेट जलाने की कोशिश करते थे मैं फूँक मार कर बुझा देती थी कितनी बार कहा था तुम से ये ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है मेरा जो दिल है वो तुम्हारे सिगरेट के धुएँ स ख़राब हो रहा है ऐश-ट्रे में बढ़ती राख स ज़िंदगी मेरी सियाह हुई जाती है बुझाया करो इन्हें जलाने से पहले एक कश ज़िंदगी का बुझी हुई सिगरेट से लगाना मैं ने संजो कर रखे है कुछ पुराने डब्बे सिगरेट के जिस पर हम ने ज़िंदगी का प्लान बनाया था वो सिगरेट ख़राब हो गई है लेकिन प्लान अभी भी संजीदा लगता है अब ना जलाना सिगरेट अब मैं वहाँ नहीं हूँ जलती सिगरेट बुझाने को

Kamal Upadhyay

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समुंदर की कुछ बूंदों से बात की वो भी अपने वजूद को ले कर व्याकुल हैं विशाल समुंदर में कहा कोई उन की है सुनता जबकि उन से ही समुंदर है उन के बिना समुंदर बस मरुस्थल है बूँदें दिन-रात प्रयत्न करती हैं एक बूँद दूसरे को आगे ढकेल कर समुंदर का वजूद क़ाएम रखती हैं उन को एहसास है अपने होने का लेकिन समुंदर हर बार इस बात को भूल जाता है सोचों अगर बूँदें विद्रोह कर दें बना कर दोस्त सूरज को ऊपर आकाश में बादल से मिल जाएँ हो सकता है दोस्ती धरा से कर लें उस के गर्त में समा जाएँ सूख जाएगा समुंदर बूंदों का वजूद तो हमेशा बना रहेगा समुंदर को अभिमान किस बात का क्या पता क्या उसे नहीं पता किस ने किया उस का वजूद क़ाएम मिट जाएगा एक दिन बस बूंदों को क़दम विद्रोह का उठाना है

Kamal Upadhyay

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चाँद भी कंबल ओढ़े निकला था सितारे ठिठुर रहें थे सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ रिश्ते जो बस नाम के बचे थे खींच रहा था मैं उन को कभी वो मुझे खींचा करते थे सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ रिश्ते बहुत कमज़ोर हो चले थे उन की लपट भी बहुत कम थी कुछ इतने पतले की जलने से पहले राख हो गए सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े कुछ पुराने रिश्ते थे मेरे जनम के पहले के सजोया था उन्हें मैं ने उन्हें नहीं था कोई लगाव मुझ से सर्दी बढ़ रही थी ठण्ड से बचने के लिए मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े

Kamal Upadhyay

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वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं कोई बता दो उन को कोई बता दो उन को मेरा चाँद कैसा दिखता है कभी देखना पूनम की रात में एक धुंदली धुंदली सी छवी नज़र आएगी जैसे कोई बच्चा माँ स लिपटा हो वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहाँ से झूटी तस्वीरें लाए हैं कहते हैं चाँद मरुस्थल हैं अरे मैं ने तो कई रातें चाँद के पानी से पी कर गुज़ार दी एक रात बाढ़ आ गई चाँद पर सुब्ह गीला तकिया मैं ने धूप में सुखाया था वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं चाँद की बदलती चाँदनी से कई दिल जुड़े हैं वो चाँद की अठखेलियों को कोई विग्यान बताते हैं कहते हैं एक उपग्रह है अरे हम तो बचपन स मामा कहते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो शरमा के पल भर के लिए छुप जाता है उसे ऐ चंद्र पर ग्रहन कहते हैं उन्हें क्या पता कैसे गुज़ारता हूँ मैं अमावस की रातें बिना उस के वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं मुझे लगता किसी ग़लत पते पर चले गए थे ऐ एस्ट्रोनॅाट और चाँद से है उन की पुरानी दुश्मनी इस लिए सारा दोश चाँद को देते हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं वो जो एस्ट्रोनॅाट चाँद से आए हैं पता नहीं कहा से झूटी तस्वीरें लाए हैं

Kamal Upadhyay

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