nazmKuch Alfaaz

चुभन मुझे जमाने में धोख़ेबाज कहा जाता है किसी से वा'दा कर के मुकर जाने का इल्ज़ाम दिया जाता है दुनिया को ख़ुश नज़र आता हूँ मैं और उस को भी असल में मैं फिर कभी इस दर्द से उभर नहीं पाया उस को चाहा उस को प्यार किया ये हसीन यादें हैं बस मेरी मरना भी चाहा मगर मैं मर नहीं पाया हाँ ग़लत हूँ शायद मैं मोहब्बत की किताब के हिसाब से ये असल दुनिया है किताबों के हिसाब से नहीं चलती फ़र्क़ बस इतना सा है उस को थी मुझ सेे बेपनाह मोहब्बत और मुझे आज भी है

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"एक टूटता तारा" वो जिसे तुम चाहते हो तुम को मिल जाए मेरा गुलाब मुरझा गया यही सही तुम्हारा गुलाब खिल जाए आसमाँ में टूटता तारा देख तुम ने एक बार मुझे माँगा था बताया था मुझे कि तारों के टूटने से दुआ क़ुबूल होती है दिल में सच्ची चाह हो तो दुनिया मिलाने को मजबूर होती है में मेरी माँ का तारा हूँ तेरी ख़ातिर टूट जाऊँ मैं क्या मेरा क्या तू खिल जाए मैं तेरी ख़ुशी के ख़ातिर हज़ार बार सूख जाऊँ

Chandrapal singh nishad

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आख़िर क्यूँ है अभी तो वक़्त ये कड़क धूप का है फिर ये सूरज इतना लाल क्यूँ है ये तो शहर का सब सेे रईस आदमी है नए इस तरह कंगाल क्यूँ है ये हाथ में तुम क्या छुपा रही हो उँगली पर ये अँगूठी का निशान क्यूँ है ये चिड़ियां उड़ क्यूँ नहीं पा रहीं इन के पैरों में लगी ये लगाम क्यूँ है क्या कहा तुम ने मैं मर रहा हूँ फिर मुझे बचाने का इतना तामझाम क्यूँ है

Chandrapal singh nishad

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आख़िरी यार इक पेड़ था मेरे घर के पीछे उस पर इक पंछी का डेरा था घंटों बातें होती थी मेरी उस से इकलौता यार वो मेरा था फिर इक आंधी आई और पेड़ टूट गया हुनरबाज था पंछी उस ने बसा लिया नया आशियाँ ग़र मुझ सेे मेरा यार छूट गया हे ईश्वर क्या ख़ता हुई मुझ सेे रहम कर आख़िर क्यूँ तू मुझ सेे इतना रूठ गया

Chandrapal singh nishad

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"तेरी चाहत एक करिश्मा" मैं ठहरा आवारा सा मुझे तो जहाँ देखता है तेरा दीदार हो जाना किसी करिश्में से कम नहीं मुझे तुझ सेे प्यार होना आम सा लगता है तुझे मुझ सेे प्यार हो जाना किसी करिश्में से कम नहीं मेरे ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो तेरे लबों पे मेरा नाम आना किसी करिश्में से कम नहीं तेरे ख़ातिर लड़ पड़े अपाहिज भी जमाने से तेरा मेरे ख़ातिर लड़ जाना किसी करिश्में से कम नहीं मुझे ख़्वाब डरावने ही आते हैं में सो ही नहीं पाता तेरी गोद में मेरा सुकून से सो जाना किसी करिश्में से कम नहीं यूँँ तो बे-वफ़ाई फ़ितरत में है मेरी मगर तुझे इश्क़ होकर सिर्फ़ तेरा होकर रह जाना किसी करिश्में से कम नहीं बना फिरता है हर इंसान फरिश्ता इस जहाँ में इंसान का इंसान हो जाना किसी करिश्में से कम नहीं

Chandrapal singh nishad

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वो कल की रात कितना परेशां था मैं कल की रात ख़ुद से कर रहा था सवाल मैं कल की रात अरे किसी ने उस की दी हुई घड़ी तोड़ दी ख़ुद से लड़ पड़ा हूँ मैं कल की रात मेरे मकाँ में सिर्फ़ मैं ही तो हूँ अरसों से आख़िर मैं करता भी क्या कल की रात

Chandrapal singh nishad

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