"दस्तान-ए-इश्क़" है ज़िन्दगी का अहम ये क़िस्सा जो यारों तुम को बता रहे हैं गए थे कालेज जो हम पे गुज़री वो दास्ताँ हम सुना रहे हैं कभी वो नज़रें मिला रहे हैं कभी वो नज़रें झुका रहे हैं है हम सेे उन को बहुत मोहब्बत मगर वो दिल में छुपा रहे हैं कभी गले से वो लग रहे हैं कभी गले से लगा रहे हैं अजीब शय है मियाँ मोहब्बत झगड़ रहे हैं मना रहे हैं गए जो कालेज को पहले दिन हम दिखी वहाँ हम को एक लड़की पड़ी निगाहें हमारी उस पर उसे ही बस देखे जा रहे हैं जब हम ने कालेज में उस को देखा लगा के जैसे कोई परी हो ये ही सबब है हम उस परी को भुला जो इक पल न पा रहे हैं हम उन सेे कहते हैं इश्क़ कर लो वो ज़ाया' कहती हैं और फिर हम ये है इबादत ये है इबादत मुसलसल उन को बता रहे हैं सुकून आता नहीं हैं दिल को बग़ैर दीदार उस का कर के सो उस की तस्वीर हम बना कर सहन में दिल लगा रहे हैं वो लड़की धड़कन हैं मेरे दिल की हँसी है मुर्शिद मेरे लबों की बसा के सीने में उस को अपने लबों के ऊपर सजा रहे हैं हाँ सब सेे ज़्यादा हसीं है नाज़ुक है अपनी सारी सहेलियों में वो लड़की जिस की ये बातें तुम को ग़ज़ल के ज़रिए बता रहे हैं वो देखो उस की अदाएँ सारी जुदा हैं अपनी सहेलियों से हम अपने यारों को उस की जानिब इशारा कर के दिखा रहे हैं सभी के लब पर है नाम उस का सभी के दिल में है उस का चेहरा सब अपनी आँखों में देखो यारों उसी के सपने सजा रहे हैं मेरे इलाही ऐ मेरे मालिक जवान लड़कों की ख़ैर रखना फ़ज़ा में अपनी वो आज ज़ुल्फ़ों को खोलकर के हिला रहे हैं किताब ख़ाने से और किताबों से सब सेे ज़्यादा है उस को उल्फ़त क्यूँँ नौजवाँ ये बिना वजह में गुलाब गुलशन से ला रहे हैं अजीब मंज़र है जिस जगह पे भी अपने क़दमों को रख रही है वो चूमने को जगह फ़रिश्ते फ़लक से तशरीफ़ ला रहे हैं है चेहरा जैसे गुलाब कोई हैं लब के जैसे दो तितलियाँ हो वो दे के जुंबिश लबों को अपने चमन की ज़ीनत बढ़ा रहे हैं हैं ज़ुल्फ़े काली घटा के जैसी हैं आँखें उस में चमकते जुगनू अँधेरे ज़ुल्फ़ों से छाएँ गर तो अंधेरे जुगनू मिटा रहे है वो ज़ुल्फें नागिन सी अपनी ला कर हमारी गोदी में रख रही है फिर अपने दस्त-ए-अदब से मुर्शिद हम उस की ज़ुल्फ़ें बना रहे हैं ऐ शाहज़ादी हमारी मानो रिदास चेहरे को अपने ढांपो हसीं लगेगा तुम्हारा चेहरा सबक़ ये उस को पढ़ा रहे हैं चिड़ा रही हैं तमाम सखियाँ उसे उधर मेरी जान कह कर और इस तरफ़ यार-ए-जानी मुझ को सब उस का कह कर चिड़ा रहे हैं ये हुस्न वाले जो ख़ुद पे नाज़ाँ हैं कोई जा कर इन्हें बताओ ये हुस्न सारा बरा-ए-सदक़ा उसी हसीना से पा रहे हैं सुख़न-वरों के मुसव्विरों के ज़ेहन को जाने ये क्या हुआ है सब उस के बारे में लिख रहे हैं सब उस का चेहरा बना रहे हैं मलाल बिल्कुल नहीं हैं मुझ को वो चाहती है किसी को बशर को मलाल ये है मेरे सिवाए सब उस को कालेज में भा रहे हैं अगर मौहब्बत नहीं हैं उन को तो फिर हमें ये बताओ यारों वो इतनी शिद्दत के साथ हम को पलट के क्यूँँ देखे जा रहे हैं उदास रहने लगी है तब से ये बात उस ने सुनी है जब से कि छोड़कर इस बरस ये कालेज पलट के हम घर को जा रहे हैं वो रो रही है बिलख बिलखकर ये कह रही है ना जाओ वापस पलट के आएँगे तुम से मिलने ये कह के उस को चुपा रहे हैं मुसल्ला घर में बिछा के अपने दुआएँ कुछ कर रही है रब से लबों पे उस के है नाम मेरा और अश्क आँखों में आ रहे हैं ये मिलना मिल कर के फिर बिछड़ना है ये ही दस्तूर आशिक़ी का बता बता के ये बात उस को हम उस के दिल को बढ़ा रहे हैं क़रार आ जाए उस के दिल को ज़रा सा शायद ये क़िस्सा सुन कर फ़रहाद-ओ-शीरीं के हिज्र का हम उसे यूँँ क़िस्सा सुना रहे हैं जो हम सेे कहते थे मुस्कुरा कर तुम्हें भुला देगें हम क़सम से वो रोज़ रातों को चुपके चुपके मलाल आँसू बहा रहे हैं ग़ुरूर थी वो मेरा मैं उस का था यूँँ हमारा अनोख़ा रिश्ता हाँ लैला मजनू के जैसे हम भी ज़माना था के पिया रहे हैं वो एक हिस्सा है मेरे दिल का ख़ुदा तू उस का ख़याल रखना दुआ ये करने हम उस के हक़ में ख़ुदा के घर रोज़ जा रहे हैं जहाँ पे आती थी शाम को तू बिताने झूले पे वक़्त अपना तेरे तसव्वुर में आज भी हम वो ख़ाली झूला झुला रहे हैं मैं मुंतज़िर हूँ कब आएगी वो कब उस का वादा-ए-दीद होगा बिछा के राहों में उस की नज़रें समय को अपने बिता रहे हैं वो शाहज़ादी है महलक़ा है शजर की माँगी हुई दुआ है ख़ुदा उसे उस के हक़ में लिख दे दुआ ये लब पर सजा रहे हैं वो उस का कॉलेज को रोज़ आना वो उस का ज़ुल्फों को लहलहाना शजर वो कॉलेज के सारे मंज़र हमारी आँखों में आ रहे हैं ग़ज़ल लिखी है जो मैं ने तुम पर मता-ए-जाँ मेरी उस ग़ज़ल को परिंद दरिया शजर समुंदर सब अपने लहजे में गा रहे हैं
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन" बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र जलते हुए ख़याम ये उठता हुआ धुआँ टूटे हुए मकान ये वीरान बस्तियाँ कुछ कह रही हैं अहल-ए-जहाँ ग़ौर से सुनो मज़लूम कर रहे हैं बयाँ ग़ौर से सुनो बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र हर रोज़ सुब्ह-ओ-शाम याँ बे-जुर्म-ओ-बे-ख़ता होती है बे-गुनाहों पे बे-इंतिहा जफ़ा मेरा मुतालबा है हर इक हक़-शनास से मरते हैं रोज़ लोग यहाँ भूख प्यास से मंज़र ये देख देख के दम घुटता है मिरा माँएँ पिसर की लाश पे पढ़ती हैं मर्सिया आती है शौर-ओ-शैन की हर सिम्त से सदा तिफ़्ल-ओ-जवान बूढ़ों के लाशे हैं जा-ब-जा कोई नहीं है बेकस-ओ-मुज़्तर का हम-नवाँ ज़ुल्म-ओ-सितम ये देख के ख़ामोश है जहाँ कहते हैं ख़ुद को उम्मत-ए-मुस्लिम का रहनुमा हामी नहीं है कोई मुसीबत में पर मिरा अहल-ए-अरब से आज ये मेरा ख़िताब है शिकवे का मेरे क्या कोई तुम पर जवाब है
Shajar Abbas
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"वो भी क्या ज़माना था" वो भी क्या ज़माना था तुझ को याद करने से ज़ेहन चैन पाता था दिल के ज़ख़्म भरते थे तेरा नाम लेने से इन उदास होंठो पर झट से मुस्कुराहट के ढेरो फूल खिलते थे तेरा दीद करने से कोर चश्म आँखों को रौशनाई मिलती थी तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी ख़ुश गवार होती थी एक ये ज़माना है तुझ को याद करने से ज़ेहन तंग होता है दिल के ज़ख़्म खुलते हैं इन लतीफ़ होंठो पर ग़म की बिजली गिरती है होंठ अब मिरे ग़म की आग में झुलसते हैं तेरा दीद करने से सिर्फ़ दर्द मिलता हैं तेरा चेहरा आँखों में तीर बन के चुभता है तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी दिल मलूल होती है ये अजब ज़माना है सिर्फ़ इस ज़माने में दर्द हाथ आया है अब मैं बस ये सोचूँ हूँ वो भी क्या ज़माना था
Shajar Abbas
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“ख़त “ मेरी जो भी हालत है ख़त में वो इबारत है आज का जो ये ख़त है ख़त नहीं वसिय्यत है ऐ हबीब इस ख़त को आख़िरी वसिय्यत को इल्तिजा है पढ़ लेना और जवाब लिख देना ख़त पे नाम लिखता हूँ फिर सलाम लिखता हूँ ख़त की इब्तिदा यूँँ हैं लफ़्ज़ ग़म-ज़दा यूँँ हैं कर्ब है अँधेरा है रंज-ओ-ग़म ने घेरा है चार सू क़यामत है ज़िंदगी अज़िय्यत है दिल पे दाग़-ए-फ़ुर्क़त है मेरी ख़स्ता हालत है दर्द-ए-दिल इज़ाफ़ी है जाँ निकलनी बाक़ी है आ कभी अयादत को देख मेरी हालत को जब से तुम से बिछड़ा हूँ ख़ुद से रूठा रहता हूँ करवटे बदलता हूँ मुँह से ख़ूँ उगलता हूँ तुझ को याद करता हूँ रोज़ जीता मरता हूँ साँस लेना मुश्किल है ज़ख़्म की ग़िज़ा दिल है हाल पर तरस खाकर तू गले लगा आ कर दर्द की दवा दे दे अब मुझे शिफ़ा दे दे
Shajar Abbas
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"हैरत" हुस्न महव-ए-हैरत है आज माजरा क्या है इश्क़ के मुसल्ले पर आज हज़रत-ए-दिल ने अपने पाँव रक्खे हैं आज हज़रत-ए-दिल को क्या हुआ है रब जाने जो हमेशा दामन को हुस्न से बचाते थे आज बा-वुज़ू होकर इश्क़ के मुसल्ले पर कैसे आ गए हैं वो हुस्न महव-ए-हैरत है
Shajar Abbas
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शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन हर लम्हा सदा है ये फ़िलिस्तीन के लब पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ होते हैं सितम शाम-ओ-सहर बारहा मुझ पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ इंसान नज़र कोई मिरे हाल पे डाले बारूद में जलते हैं मिरी गोद के पाले ज़ालिम ने मिरे हँसते हुए खेत उजाड़े अँधकार में डूबे मिरी क़िस्मत के सितारे ख़ुश होते हैं ढा कर ये सितम मुझ पे सितमगर पानी की तरह ख़ूँ यहाँ बहता है ज़मीं पर क्यूँ उम्मत-ए-मुस्लिम नहीं उठती मिरे हक़ में ये इन की ज़बाँ क्यूँ नहीं खुलती मिरे हक़ में क्यूँ अहल-ए-अरब को मिरा अहसास नहीं है मुश्किल में घिरा हूँ मैं कोई पास नहीं है क्यूँ अहल-ए-अरब चुप हैं मिरे हाल-ए-ज़बूँ पर हिम्मत ये बढ़ाते नहीं क्यूँ घर से निकलकर है उम्मत-ए-मुस्लिम से ख़िताब आज ये मेरा क्या मस्जिद-ए-अक़्सा ये नहीं आप का क़िबला क्यूँ इस तरह छोड़ा है मुझे तन्हा बताओ करने मिरी इमदाद कोई तो चले आओ उठती नहीं सुन कर यूँँ मिरी गिर्या-ओ-ज़ारी इस उम्मत-ए-मुस्लिम की हया मर गई सारी हर लम्हा सदा है ये फ़िलिस्तीन के लब पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ होते हैं सितम शाम-ओ-सहर बारहा मुझ पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ
Shajar Abbas
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