nazmKuch Alfaaz

“ख़त “ मेरी जो भी हालत है ख़त में वो इबारत है आज का जो ये ख़त है ख़त नहीं वसिय्यत है ऐ हबीब इस ख़त को आख़िरी वसिय्यत को इल्तिजा है पढ़ लेना और जवाब लिख देना ख़त पे नाम लिखता हूँ फिर सलाम लिखता हूँ ख़त की इब्तिदा यूँँ हैं लफ़्ज़ ग़म-ज़दा यूँँ हैं कर्ब है अँधेरा है रंज-ओ-ग़म ने घेरा है चार सू क़यामत है ज़िंदगी अज़िय्यत है दिल पे दाग़-ए-फ़ुर्क़त है मेरी ख़स्ता हालत है दर्द-ए-दिल इज़ाफ़ी है जाँ निकलनी बाक़ी है आ कभी अयादत को देख मेरी हालत को जब से तुम से बिछड़ा हूँ ख़ुद से रूठा रहता हूँ करवटे बदलता हूँ मुँह से ख़ूँ उगलता हूँ तुझ को याद करता हूँ रोज़ जीता मरता हूँ साँस लेना मुश्किल है ज़ख़्म की ग़िज़ा दिल है हाल पर तरस खाकर तू गले लगा आ कर दर्द की दवा दे दे अब मुझे शिफ़ा दे दे

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन" बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र जलते हुए ख़याम ये उठता हुआ धुआँ टूटे हुए मकान ये वीरान बस्तियाँ कुछ कह रही हैं अहल-ए-जहाँ ग़ौर से सुनो मज़लूम कर रहे हैं बयाँ ग़ौर से सुनो बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र हर रोज़ सुब्ह-ओ-शाम याँ बे-जुर्म-ओ-बे-ख़ता होती है बे-गुनाहों पे बे-इंतिहा जफ़ा मेरा मुतालबा है हर इक हक़-शनास से मरते हैं रोज़ लोग यहाँ भूख प्यास से मंज़र ये देख देख के दम घुटता है मिरा माँएँ पिसर की लाश पे पढ़ती हैं मर्सिया आती है शौर-ओ-शैन की हर सिम्त से सदा तिफ़्ल-ओ-जवान बूढ़ों के लाशे हैं जा-ब-जा कोई नहीं है बेकस-ओ-मुज़्तर का हम-नवाँ ज़ुल्म-ओ-सितम ये देख के ख़ामोश है जहाँ कहते हैं ख़ुद को उम्मत-ए-मुस्लिम का रहनुमा हामी नहीं है कोई मुसीबत में पर मिरा अहल-ए-अरब से आज ये मेरा ख़िताब है शिकवे का मेरे क्या कोई तुम पर जवाब है

Shajar Abbas

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"वो भी क्या ज़माना था" वो भी क्या ज़माना था तुझ को याद करने से ज़ेहन चैन पाता था दिल के ज़ख़्म भरते थे तेरा नाम लेने से इन उदास होंठो पर झट से मुस्कुराहट के ढेरो फूल खिलते थे तेरा दीद करने से कोर चश्म आँखों को रौशनाई मिलती थी तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी ख़ुश गवार होती थी एक ये ज़माना है तुझ को याद करने से ज़ेहन तंग होता है दिल के ज़ख़्म खुलते हैं इन लतीफ़ होंठो पर ग़म की बिजली गिरती है होंठ अब मिरे ग़म की आग में झुलसते हैं तेरा दीद करने से सिर्फ़ दर्द मिलता हैं तेरा चेहरा आँखों में तीर बन के चुभता है तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी दिल मलूल होती है ये अजब ज़माना है सिर्फ़ इस ज़माने में दर्द हाथ आया है अब मैं बस ये सोचूँ हूँ वो भी क्या ज़माना था

Shajar Abbas

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"हैरत" हुस्न महव-ए-हैरत है आज माजरा क्या है इश्क़ के मुसल्ले पर आज हज़रत-ए-दिल ने अपने पाँव रक्खे हैं आज हज़रत-ए-दिल को क्या हुआ है रब जाने जो हमेशा दामन को हुस्न से बचाते थे आज बा-वुज़ू होकर इश्क़ के मुसल्ले पर कैसे आ गए हैं वो हुस्न महव-ए-हैरत है

Shajar Abbas

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"दस्तान-ए-इश्क़" है ज़िन्दगी का अहम ये क़िस्सा जो यारों तुम को बता रहे हैं गए थे कालेज जो हम पे गुज़री वो दास्ताँ हम सुना रहे हैं कभी वो नज़रें मिला रहे हैं कभी वो नज़रें झुका रहे हैं है हम सेे उन को बहुत मोहब्बत मगर वो दिल में छुपा रहे हैं कभी गले से वो लग रहे हैं कभी गले से लगा रहे हैं अजीब शय है मियाँ मोहब्बत झगड़ रहे हैं मना रहे हैं गए जो कालेज को पहले दिन हम दिखी वहाँ हम को एक लड़की पड़ी निगाहें हमारी उस पर उसे ही बस देखे जा रहे हैं जब हम ने कालेज में उस को देखा लगा के जैसे कोई परी हो ये ही सबब है हम उस परी को भुला जो इक पल न पा रहे हैं हम उन सेे कहते हैं इश्क़ कर लो वो ज़ाया' कहती हैं और फिर हम ये है इबादत ये है इबादत मुसलसल उन को बता रहे हैं सुकून आता नहीं हैं दिल को बग़ैर दीदार उस का कर के सो उस की तस्वीर हम बना कर सहन में दिल लगा रहे हैं वो लड़की धड़कन हैं मेरे दिल की हँसी है मुर्शिद मेरे लबों की बसा के सीने में उस को अपने लबों के ऊपर सजा रहे हैं हाँ सब सेे ज़्यादा हसीं है नाज़ुक है अपनी सारी सहेलियों में वो लड़की जिस की ये बातें तुम को ग़ज़ल के ज़रिए बता रहे हैं वो देखो उस की अदाएँ सारी जुदा हैं अपनी सहेलियों से हम अपने यारों को उस की जानिब इशारा कर के दिखा रहे हैं सभी के लब पर है नाम उस का सभी के दिल में है उस का चेहरा सब अपनी आँखों में देखो यारों उसी के सपने सजा रहे हैं मेरे इलाही ऐ मेरे मालिक जवान लड़कों की ख़ैर रखना फ़ज़ा में अपनी वो आज ज़ुल्फ़ों को खोलकर के हिला रहे हैं किताब ख़ाने से और किताबों से सब सेे ज़्यादा है उस को उल्फ़त क्यूँँ नौजवाँ ये बिना वजह में गुलाब गुलशन से ला रहे हैं अजीब मंज़र है जिस जगह पे भी अपने क़दमों को रख रही है वो चूमने को जगह फ़रिश्ते फ़लक से तशरीफ़ ला रहे हैं है चेहरा जैसे गुलाब कोई हैं लब के जैसे दो तितलियाँ हो वो दे के जुंबिश लबों को अपने चमन की ज़ीनत बढ़ा रहे हैं हैं ज़ुल्फ़े काली घटा के जैसी हैं आँखें उस में चमकते जुगनू अँधेरे ज़ुल्फ़ों से छाएँ गर तो अंधेरे जुगनू मिटा रहे है वो ज़ुल्फें नागिन सी अपनी ला कर हमारी गोदी में रख रही है फिर अपने दस्त-ए-अदब से मुर्शिद हम उस की ज़ुल्फ़ें बना रहे हैं ऐ शाहज़ादी हमारी मानो रिदास चेहरे को अपने ढांपो हसीं लगेगा तुम्हारा चेहरा सबक़ ये उस को पढ़ा रहे हैं चिड़ा रही हैं तमाम सखियाँ उसे उधर मेरी जान कह कर और इस तरफ़ यार-ए-जानी मुझ को सब उस का कह कर चिड़ा रहे हैं ये हुस्न वाले जो ख़ुद पे नाज़ाँ हैं कोई जा कर इन्हें बताओ ये हुस्न सारा बरा-ए-सदक़ा उसी हसीना से पा रहे हैं सुख़न-वरों के मुसव्विरों के ज़ेहन को जाने ये क्या हुआ है सब उस के बारे में लिख रहे हैं सब उस का चेहरा बना रहे हैं मलाल बिल्कुल नहीं हैं मुझ को वो चाहती है किसी को बशर को मलाल ये है मेरे सिवाए सब उस को कालेज में भा रहे हैं अगर मौहब्बत नहीं हैं उन को तो फिर हमें ये बताओ यारों वो इतनी शिद्दत के साथ हम को पलट के क्यूँँ देखे जा रहे हैं उदास रहने लगी है तब से ये बात उस ने सुनी है जब से कि छोड़कर इस बरस ये कालेज पलट के हम घर को जा रहे हैं वो रो रही है बिलख बिलखकर ये कह रही है ना जाओ वापस पलट के आएँगे तुम से मिलने ये कह के उस को चुपा रहे हैं मुसल्ला घर में बिछा के अपने दुआएँ कुछ कर रही है रब से लबों पे उस के है नाम मेरा और अश्क आँखों में आ रहे हैं ये मिलना मिल कर के फिर बिछड़ना है ये ही दस्तूर आशिक़ी का बता बता के ये बात उस को हम उस के दिल को बढ़ा रहे हैं क़रार आ जाए उस के दिल को ज़रा सा शायद ये क़िस्सा सुन कर फ़रहाद-ओ-शीरीं के हिज्र का हम उसे यूँँ क़िस्सा सुना रहे हैं जो हम सेे कहते थे मुस्कुरा कर तुम्हें भुला देगें हम क़सम से वो रोज़ रातों को चुपके चुपके मलाल आँसू बहा रहे हैं ग़ुरूर थी वो मेरा मैं उस का था यूँँ हमारा अनोख़ा रिश्ता हाँ लैला मजनू के जैसे हम भी ज़माना था के पिया रहे हैं वो एक हिस्सा है मेरे दिल का ख़ुदा तू उस का ख़याल रखना दुआ ये करने हम उस के हक़ में ख़ुदा के घर रोज़ जा रहे हैं जहाँ पे आती थी शाम को तू बिताने झूले पे वक़्त अपना तेरे तसव्वुर में आज भी हम वो ख़ाली झूला झुला रहे हैं मैं मुंतज़िर हूँ कब आएगी वो कब उस का वादा-ए-दीद होगा बिछा के राहों में उस की नज़रें समय को अपने बिता रहे हैं वो शाहज़ादी है महलक़ा है शजर की माँगी हुई दुआ है ख़ुदा उसे उस के हक़ में लिख दे दुआ ये लब पर सजा रहे हैं वो उस का कॉलेज को रोज़ आना वो उस का ज़ुल्फों को लहलहाना शजर वो कॉलेज के सारे मंज़र हमारी आँखों में आ रहे हैं ग़ज़ल लिखी है जो मैं ने तुम पर मता-ए-जाँ मेरी उस ग़ज़ल को परिंद दरिया शजर समुंदर सब अपने लहजे में गा रहे हैं

Shajar Abbas

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शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन हर लम्हा सदा है ये फ़िलिस्तीन के लब पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ होते हैं सितम शाम-ओ-सहर बारहा मुझ पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ इंसान नज़र कोई मिरे हाल पे डाले बारूद में जलते हैं मिरी गोद के पाले ज़ालिम ने मिरे हँसते हुए खेत उजाड़े अँधकार में डूबे मिरी क़िस्मत के सितारे ख़ुश होते हैं ढा कर ये सितम मुझ पे सितमगर पानी की तरह ख़ूँ यहाँ बहता है ज़मीं पर क्यूँ उम्मत-ए-मुस्लिम नहीं उठती मिरे हक़ में ये इन की ज़बाँ क्यूँ नहीं खुलती मिरे हक़ में क्यूँ अहल-ए-अरब को मिरा अहसास नहीं है मुश्किल में घिरा हूँ मैं कोई पास नहीं है क्यूँ अहल-ए-अरब चुप हैं मिरे हाल-ए-ज़बूँ पर हिम्मत ये बढ़ाते नहीं क्यूँ घर से निकलकर है उम्मत-ए-मुस्लिम से ख़िताब आज ये मेरा क्या मस्जिद-ए-अक़्सा ये नहीं आप का क़िबला क्यूँ इस तरह छोड़ा है मुझे तन्हा बताओ करने मिरी इमदाद कोई तो चले आओ उठती नहीं सुन कर यूँँ मिरी गिर्या-ओ-ज़ारी इस उम्मत-ए-मुस्लिम की हया मर गई सारी हर लम्हा सदा है ये फ़िलिस्तीन के लब पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ होते हैं सितम शाम-ओ-सहर बारहा मुझ पर किस तरह बताओ मैं भला ख़ुद को सँभालूँ

Shajar Abbas

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