nazmKuch Alfaaz

किसी की ढल गई कैसी जवानी देखते जाओ जो थीं बेगम वो हैं बच्चों की नानी देखते जाओ टँगी है जो मिरे हैंगर-नुमा कंधों पे मैली सी मिरी शादी की है ये शेरवानी देखते जाओ दिखा के दसवें नौ-मौलूद को मुझ से वो ये बोलीं मोहब्बत की है ये ताज़ा निशानी देखते जाओ किया बेगम ने नाफ़िज़ घर में दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी मिरे घर आओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ मैं पचपन का हूँ वो पंद्रह बरस से तीस के ही हैं जवानी उन की मेरी ना-तवानी देखते जाओ खड़े हैं सामने आईने के और मुस्कुराते हैं जवानी हो गई कैसी दिवानी देखते जाओ बुझा सकता न था जो तिश्नगी सहरा की वो बादल हया से हो गया है पानी पानी देखते जाओ बहुत मजबूर होता है तो इंसाँ ख़ून पीता है गराँ है किस क़दर पीने का पानी देखते जाओ हमारा ख़ून इक-न-इक दिन ला कर रहेगा रंग तुम्हें महँगी पड़ेगी ज़िंदगानी देखते जाओ लहू पर बे-गुनाहों के रखी हों जिस की बुनियादें नहीं चलने की ऐसी हुक्मरानी देखते जाओ हया और शर्म उठती जा रही है इस ज़माने से न जाने कब मिरे आँखों का पानी देखते जाओ जवानी 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' के दिल की कुछ तो गुल खिलाएगी हसीनों से चली है छेड़-ख़ानी देखते जाओ

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ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

Faiz Ahmad Faiz

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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए

Dharmesh bashar

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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मिज़ाह ओ तंज़ के जब तीर बैठेंगे निशाने पर जो दीवाने हैं उन की अक़्ल आएगी ठिकाने पर हँसी का सिलसिला तो 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' चलता ही रहता है ज़माना मुझ पे हँसता है मैं हँसता हूँ ज़माने पर कठिन राहों में जैसे हम-सफ़र भी छूट जाते हैं इसी तरह सफ़र में आबले भी फूट जाते हैं मिज़ाह-गो हूँ मगर ख़ुद इस लिए हँसने से डरता हूँ हँसी से 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ज़ख़्मों के टाँके टूट जाते हैं कोई क़िस्सा है न कहानी है बात जो आप को सुनानी है रंज और ग़म ख़ुशी के परतव हैं और हँसी ग़म की तर्जुमानी है तुम अपने दिल में न शिकवा न कुछ गिला रखना लबों पे सिर्फ़ तबस्सुम का सिलसिला रखना है ज़ब्त-ए-ग़म जो ज़रूरी तो ये भी लाज़िम है जो रो न पाओ तो हँसने का हौसला रखना ये जो मुँह में दबी दबी है क्या गर हँसी है तो ये हँसी है क्या ये बताओ गले में क्या कोई बे-सुरी मेंठकी फँसी है क्या सब ख़त्म हो चुके हैं वो दौर शराफ़त के खुलते नहीं किसी पर असरार हिमाक़त के अपनी हँसी उड़ा कर कितने ही ग़म उठा कर सीखे हैं 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ने अंदाज़ ज़राफ़त के

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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वा'दा क्या किसी बात के पाबंद नहीं हैं बूढ़े हैं ना जज़्बात के पाबंद नहीं हैं ख़्वाबों में निकल जाते हैं अरमान हमारे हम दिन में मुलाक़ात के पाबंद नहीं हैं बे-वज्ह भी आँखों में उमड आते हैं अक्सर सैलाब जो बरसात के पाबंद नहीं हैं हालात की गर्दिश रही पाबंद हमारी हम गर्दिश-ए-हालात के पाबंद नहीं हैं जब वक़्त के पाबंद नहीं आप तो हम भी पाबंदी-ए-औक़ात के पाबंद नहीं हैं हम रिंद-ए-ख़राबात हैं जो चाहे पिएँगे साक़ी की हिदायात के पाबंद नहीं हैं ज़ंजीर लिए पाँव में फिरते हैं सर-ए-राह दीवाने हवालात के पाबंद नहीं हैं हाकिम ने कहा है कि वही हुक्म को टालें जो मर्ग-ए-मुफ़ाजात के पाबंद नहीं हैं मफ़्हूम शब-ए-वस्ल का समझाया तो बोले हम ऐसी किसी रात के पाबंद नहीं हैं ये दौर तरक़्क़ी का है हम शर्म-ओ-हया की फ़र्सूदा रिवायात के पाबंद नहीं हैं हम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पाबंद हैं आते हुए पल के गुज़रे हुए लम्हात के पाबंद नहीं हैं

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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न बना सका नशेमन किसी अजनबी चमन में मिरा घर जला है जब से मिरे अपने ही वतन में मिरे ज़ौक़-ए-ख़ुश-लिबासी को फ़रिश्ते भी तो देखें मैं मरूँ तो दफ़्न करना टेरी-लेन के कफ़न में ये है बे-सबात दुनिया इसी दम के मुर्ग़ की सी जो सुब्ह पका किचन में मगर आया न टिफ़िन में मज़ा गुल के तोड़ने का तो मिला बहुत ऐ गुलचीं मिली लज़्ज़त-ए-ख़लिश भी किसी ख़ार की चुभन में यही आरज़ू है मेरी नज़्म-ओ-नस्र में यकसाँ कि नहीं तज़ाद कोई मेरे शे'र और सुख़न में कभी साबिक़ा पड़े न मिरा सास और ख़ुसर से मिले बीवी गाय जैसी जो बंधी रहे सहन में मैं कभी न ब्याह करता जो मुझे ये इल्म होता कि हज्म बढ़ेगा उन का तो घटूँगा मैं वज़न में चढ़ा उन पे गोश्त कैसे मिरी निकली हड्डियाँ क्यूँ ये तो राज़ की हैं बातें कहूँ कैसे अंजुमन में यही फ़र्क़ रह गया है ऐ रक़ीब तुझ में मुझ में मैं बसा हूँ जा के बम्बई तू रहा नहीं दकन में वहाँ ब्याह मैं रचाया तू रहा यहाँ अकेला मैं क़फ़स में भी हूँ आज़ाद तू असीर है चमन में ये हमारा ही वतन है मगर आज हम हैं मेहमाँ है अजब सितम-ज़रीफ़ी कि हैं बे-वतन वतन में कोई 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पूछे तिरे क़ुर्ब की लताफ़त कि तिरा ख़याल आया हुई गुदगुदी बदन में

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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