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फिंदक फिंदक फिंदक फ़क धुनक धुनक धुन धुनक धुनक ताँत बजी और निकला राग रुई बनी साबुन का झाग कैसी छनती जाती है बादल बनती जाती है कितना ढेर हुआ आहा मैं इस ढेर पे कूदुँगा कोई चोट न आएगी रूई मगर दब जाएगी इत्ती रूई इतना ढेर हो गई बारह तेरह सेर ले अब रूई हो गई साफ़ भर ले तकिए और लिहाफ़ इन से सब सुख पाते हैं ओढ़ते और बिछाते हैं मिलता है सब को आराम वाह रे धुनिए तेरा काम वाह री धुनकी धुनक धुनक फिंदक फिंदक फ़क फ़क फ़क

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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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जी तो करता है मगर जी तो करता है तुझे दिल के हक़ीक़त कह दूँ दिल तो कहता है मुझे तुझ सेे है उल्फ़त कह दूँ तेरे चेहरे पे तबस्सुम का वो आना अक्सर मेरे सीने में चुभन और सुकूँ देता है तेरे आरिज़ पे वो लाली का चमकना इक दम मेरे भड़के हुए जज़्बों को तुलू देता है चाहता हूँ कि तेरा हाथ पकड़ कर कह दूँ मुझ को ये हाथ हमेशा के लिए पकड़ा दे सोचता हूँ कि तेरी आँखों में आँखें डालूँ और कह दूँ मेरे जज़्बात को तू अपना ले मेरे दिल के ये जो जज़्बे हैं अयाँ तो कर दूँ फिर ये जज़्बात बिखर जाने का डर लगता है तुझ को बतला दूँ मुझे तुझ सेे बहुत उल्फ़त है फिर मगर तेरे मुकर जाने का डर लगता है सोचता हूँ कि मैं जल्दी में करूँँ क्यूँँ कुछ भी तेरे दिल में भी हैं जज़्बात तसल्ली कर लूँ मेरे एहसास को पानी में बहाएगी न तू सब सेे पहले तो मेरे दिल की तशफ्फ़ी कर लूँ कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही समझता हूँ फ़क़त तेरे दिल में तो कहीं कोई मुहब्बत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो अदाएँ तेरी आदत ही न हो कहीं ऐसा न हो पाँव मेरे बहकें लेकिन तेरी इन मरमरीं बाहों का सहारा न मिले मेरी कश्ती कहीं दरियाओं में डोले डूबे और तेरे प्यार के सागर का किनारा न मिले ख़ैर सब सोच के सोचा तुझे बतला दूँगा मेरी धड़कन को तेरी धड़कनों से रक़बत है तेरे दिल का तू मुझे हाल बता क्या है ज़रा मेरे दिल का तो वही हाल इसे उल्फ़त है मैं ने बतला के तुझे देख ज़रा क्या पाया अपने ख़्वाबों का मज़ा खोए हुए बैठा हूँ तेरे आने से भी पहले मैं अकेला था मगर तेरे जाने पे मैं सहरा की तरह तन्हा हूँ

Praveen Sharma SHAJAR

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नज़्म - वो क्या है उस की आँखें कैसी हैं उस की आँखें रब सी हैं उस की बातें कैसी हैं उस की बातें रौनक़ हैं उस की यादें कैसी हैं मेरी रातों जैसी हैं उस की यादें हिज्र है क्या ये फ़क़त बेकार किस ने बोली है उस का चेहरा कैसा है उस का चेहरा चाँद सा है उस की ज़ुल्फ़ें कैसी है उस की ज़ुल्फ़ें क़ाएनात है उस का साथ चलना क्या है मेरा आगे और आगे बढ़ना है उस की बिंदिया कैसी है माथे पर चाँद जैसी है उस का बोलना कैसा है सारे फ़ज़ा में फ़क़त प्यार ही घोलना है बाग़ में उस का होना कैसा है सारे फूलों को बस खिलना है उस सेे मुहब्बत किस को है उस सेे मुहब्बत सब को है जिस को उस ने चाहा है उस का मुक़द्दर रब ने लिक्खा है मेरी ग़ज़लें मेरी नज़्में क्या है उन के सारे हर्फ़ और सारे मिसरे उस पर है मेरी ग़ज़ल का मतला क्या है उस का चेहरा है शे'र के मिसरे क्या हैं उस की दो आँखें हैं ग़ज़ल का क़ाफ़िया क्या है क़ाफ़िया उस के लब हैं तो रदीफ़ क्या है वो उस की सुंदरता है बताओ फिर मक़्ता क्या है वो उस का दिल है उसपर क्या क्या जँचता है उस पर साड़ी सूट सब जँचता है उस के गाल में पड़ता वो गड्ढा देखो मुझ को दीवाना करता है उस का हुस्न तो है बहुत सुंदर रूह में उस के रब बसता है

Lalit Mohan Joshi

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मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत तुम ने क्यूँ की ये मोहब्बत क्यूँ किए हम ने वो वादे क्यूँ वो क़स में हम ने खाईं क्यूँ गए हम उस जगह पर क्यूँ बनाईं हम ने यादें नाम क्यूँ लिख आए अपना पेड़ पर हम क्यूँ निशानी पेड़ पर हम छोड़ आए क्यूँ उसे तकलीफ़ों का हिस्सा बनाया हम ने क्यूँ ख़्वाबों का गुलदस्ता सजाया बेंच पर क्यूँ हम ने वो लम्हे गुज़ारे मैं ने आख़िर क्यूँ तेरे गेसू सँवारे क्यूँ रखा सिर मैं ने तेरी गोद में क्यूँ बोझ क्यूँ तुम ने उतारा मेरे सिर का मैं ने क्यूँ पकड़ी तुम्हारी वो कलाई क्यूँ तुम्हारे हाथ चू में क्यूँ गले तुम को लगाया क्यूँ जताया प्यार हम ने क्यूँ क़रीब आए हम ऐसे क्यूँ बसा आए वो दुनिया हम वहाँ पर जब पता ही था उजड़ना होगा इस को जब पता ही था बिछड़ना होगा हम को क्यूँ न सोची हम ने ये बात क्या फ़क़त दिल मिलने से रिश्ते हुए हैं जी नहीं ये तो हमारी भूल है बस कौन सुनता है दिलों की बात साहब बस किए जाते हैं सौदे सिर्फ़ सौदे बस ख़रीदे बेचे जाते हैं ये रिश्ते ज़ात रुतबा हैसियत को देख कर के मैं इन्हें रिश्ते नहीं कहता ये तो बस ये तो बस समझौता है इक दूसरे से जिस में हम को ज़िंदगी भर घुटना है बस ख़ैर इस में कुछ नया भी तो नहीं है इश्क़ में ऐसा ही तो होता रहा है और होता ही रहेगा ये मोहब्बत यूँँ ही बस मरती रहेगी और हम यूँँ ही मनाएँगे ये मातम सिर्फ़ मातम ज़िंदगी भर सिर्फ़ मातम

Yuvraj Singh Faujdar

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मिरी सदा है गुल-ए-शम्-ए-शाम-ए-आज़ादी सुना रहा हूँ दिलों को पयाम आज़ादी लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी मुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँ मिरी फ़ना से है पैदा दवाम-ए-आज़ादी जो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे में उन्हें भी है सर-ओ-सौदा-ए-ख़ाम-ए-आज़ादी बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी फ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता है अरे ये सुब्ह-ए-ग़ुलामी ये शाम-ए-आज़ादी ये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाक बहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादी फ़ज़ा-ए-शाम-ओ-सहर में शफ़क़ झलकती है कि जाम में है मय-ए-लाला-फ़ाम-ए-आज़ादी स्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंग निहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादी सुकूँ का नाम न ले है वो क़ैद-ए-बे-मीआद है पय-ब-पय हरकत में क़याम-ए-आज़ादी ये कारवान हैं पसमाँदगान-ए-मंज़िल के कि रहरवों में यही हैं इमाम-ए-आज़ादी दिलों में अहल-ए-ज़मीं के है नीव उस की मगर क़ुसूर-ए-ख़ुल्द से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी वहाँ भी ख़ाक-नशीनों ने झंडे गाड़ दिए मिला न अहल-ए-दुवल को मक़ाम-ए-आज़ादी हमारे ज़ोर से ज़ंजीर-ए-तीरगी टूटी हमारा सोज़ है माह-ए-तमाम-ए-आज़ादी तरन्नुम-ए-सहरी दे रहा है जो छुप कर हरीफ़-ए-सुब्ह-ए-वतन है ये शाम-ए-आज़ादी हमारे सीने में शो'ले भड़क रहे हैं 'फ़िराक़' हमारी साँस से रौशन है नाम-ए-आज़ादी

Firaq Gorakhpuri

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इमारत और शौकत और सरमाए की तस्वीरें ये ऐवानात सब हैं हाल ही की ताज़ा तामीरें इधर कुछ फ़ासले पर चंद घर थे काश्त-कारों के जहाँ अब कार-ख़ाने बन गए सरमाया-दारों के मवेशी हो गए नीलाम क्यूँँ ये कोई क्या जाने कचेहरी जाने साहूकार जाने या ख़ुदा जाने ज़मीं-दारों को जा कर देख ले जो भी कोई चाहे नए भट्टों में ईंटें थापते फिरते हैं हलवाहे यहाँ अपने पुराने गाँव का अब क्या रहा बाक़ी यही तकिया यही इक मैं यही इक झोंपड़ा बाक़ी अज़ीमुश्शान बस्ती है ये नौ-आबाद वीराना यहाँ हम अजनबी दोनों हैं मैं और मेरा काशाना

Hafeez Jalandhari

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लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना ग़ज़ल-ख़्वाँ उस को जाना हम ने शाइ'र उस को गर्दाना फ़क़त सूरत ही देखी उस के मअ'नी हम नहीं समझे न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर मुक़य्यद अब नहीं 'इक़बाल' अपने जिस्म-ए-फ़ानी में नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी ज़िंदगी उस की त आला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की जिसे हम मुर्दा समझे ज़िंदा तर पाइंदा तर निकला मह ओ ख़ुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के

Hafeez Jalandhari

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ऐ देखने वालो इस हुस्न को देखो इस राज़ को समझो ये नक़्श-ए-ख़याली ये फ़िक्रत-ए-आली ये पैकर-ए-तनवीर ये कृष्ण की तस्वीर मअ'नी है कि सूरत सनअ'त है कि फ़ितरत ज़ाहिर है कि मस्तूर नज़दीक है या दूर ये नार है या नूर दुनिया से निराला ये बाँसुरी वाला गोकुल का ग्वाला है सेहर कि ए'जाज़ खुलता ही नहीं राज़ क्या शान है वल्लाह क्या आन है वल्लाह हैरान हूँ क्या है इक शान-ए-ख़ुदा है बुत-ख़ाने के अंदर ख़ुद हुस्न का बुत-गर बुत बन गया आ कर वो तुर्फ़ा नज़्ज़ारे याद आ गए सारे जमुना के किनारे सब्ज़े का लहकना फूलों का महकना घनघोर घटाएँ सरमस्त हवाएँ मासूम उमंगें उल्फ़त की तरंगें वो गोपियों के साथ हाथों में दिए हाथ रक़्साँ हुआ ब्रिजनाथ बंसी में जो लय है नश्शा है न मय है कुछ और ही शय है इक रूह है रक़्साँ इक कैफ़ है लर्ज़ां एक अक़्ल है मय-नोश इक होश है मदहोश इक ख़ंदा है सय्याल इक गिर्या है ख़ुश-हाल इक इश्क़ है मग़रूर इक हुस्न है मजबूर इक सेहर है मसहूर दरबार में तन्हा लाचार है कृष्णा आ श्याम इधर आ सब अहल-ए-ख़ुसूमत हैं दर पए इज़्ज़त ये राज दुलारे बुज़दिल हुए सारे पर्दा न हो ताराज बेकस की रहे लाज आ जा मेरे काले भारत के उजाले दामन में छुपा ले वो हो गई अन-बन वो गर्म हुआ रन ग़ालिब है दुर्योधन वो आ गए जगदीश वो मिट गई तशवीश अर्जुन को बुलाया उपदेश सुनाया ग़म-ज़ाद का ग़म क्या उस्ताद का ग़म क्या लो हो गई तदबीर लो बन गई तक़दीर लो चल गई शमशीर सीरत है अदू-सोज़ सूरत नज़र-अफ़रोज़ दिल कैफ़ियत-अंदोज़ ग़ुस्से में जो आ जाए बिजली ही गिरा जाए और लुत्फ़ पर आए तो घर भी लुटा जाए परियों में है गुलफ़ाम राधा के लिए श्याम बलराम का भय्या मथुरा का बसय्या बिंद्रा में कन्हैय्या बन हो गए वीराँ बर्बाद गुलिस्ताँ सखियाँ हैं परेशाँ जमुना का किनारा सुनसान है सारा तूफ़ान हैं ख़ामोश मौजों में नहीं जोश लौ तुझ से लगी है हसरत ही यही है ऐ हिन्द के राजा इक बार फिर आ जा दुख दर्द मिटा जा अब्र और हवा से बुलबुल की सदास फूलों की ज़िया से जादू-असरी गुम शोरीदा-सरी गुम हाँ तेरी जुदाई मथुरा को न भाई तू आए तो शान आए तू आए तो जान आए आना न अकेले हों साथ वो मेले सखियों के झमेले

Hafeez Jalandhari

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देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी आ हा जी गुल-नारी चुनरी रंग रंगीली प्यारी चुनरी मलमल की इक तारी चुनरी नाज़ुक नाज़ुक सारी चुनरी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी अम्मी के कुछ जी में आया गोटे का इक थान मंगाया चुनरी पर सारा चिपकाया हर कोने पर फूल बनाया देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी लचका है हाथों में लचकता गोटा है कुंदन सा दमकता रौशनी में कैसा है चमकता हाथ लगाने से है मसकता देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी इस को ख़राब होने न दूँगी बैठूँगी तो सँभाल रखूँगी घर में जा कर रख छोड़ूँगी और तेहवार के दिन ओढ़ूँगी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी

Hafeez Jalandhari

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फ़ित्ना-ए-ख़ुफ़ता जगाए उस घड़ी किस की मजाल क़ैद हैं शहज़ादियाँ कोई नहीं पुर्सान-ए-हाल इन ग़रीबों की मदद पर कोई आमादा नहीं एक शाएर है यहाँ लेकिन वो शहज़ादा नहीं आहूओं की सुर्मगीं पलकें फ़ज़ा पर हुक्मराँ छाई हैं अर्ज़ ओ समा पर आहनीं सी जालियाँ दूर से कोहसार ओ वादी पर ये होता है गुमाँ ऊँट हैं बैठे हुए उतरा हुआ है कारवाँ या असर हैं आसमान-ए-पीर पर बरसात के ख़ेमा-ए-बोसीदा में पैवंद हैं बानात के और इस ख़े में के अंदर ज़िंदगी सोई हुई तीरगी सोई हुई ताबिंदगी सोई हुई ऐ 'हफ़ीज़' इन नींद के मातों की मंज़िल से निकल काम है दरपेश दाम-ए-दीदा-ओ-दिल से निकल दीदा-ओ-दिल को भी ग़फ़लत के शबिस्ताँ से निकाल ये जो ख़ामोशी की ज़ंजीरें हैं इन को तोड़ डाल सुब्ह करने के लिए फिर हाव-हू दरकार है शुक्र कर सोती हुई दुनिया में तू बेदार है

Hafeez Jalandhari

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