मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत तुम ने क्यूँ की ये मोहब्बत क्यूँ किए हम ने वो वादे क्यूँ वो क़स में हम ने खाईं क्यूँ गए हम उस जगह पर क्यूँ बनाईं हम ने यादें नाम क्यूँ लिख आए अपना पेड़ पर हम क्यूँ निशानी पेड़ पर हम छोड़ आए क्यूँ उसे तकलीफ़ों का हिस्सा बनाया हम ने क्यूँ ख़्वाबों का गुलदस्ता सजाया बेंच पर क्यूँ हम ने वो लम्हे गुज़ारे मैं ने आख़िर क्यूँ तेरे गेसू सँवारे क्यूँ रखा सिर मैं ने तेरी गोद में क्यूँ बोझ क्यूँ तुम ने उतारा मेरे सिर का मैं ने क्यूँ पकड़ी तुम्हारी वो कलाई क्यूँ तुम्हारे हाथ चू में क्यूँ गले तुम को लगाया क्यूँ जताया प्यार हम ने क्यूँ क़रीब आए हम ऐसे क्यूँ बसा आए वो दुनिया हम वहाँ पर जब पता ही था उजड़ना होगा इस को जब पता ही था बिछड़ना होगा हम को क्यूँ न सोची हम ने ये बात क्या फ़क़त दिल मिलने से रिश्ते हुए हैं जी नहीं ये तो हमारी भूल है बस कौन सुनता है दिलों की बात साहब बस किए जाते हैं सौदे सिर्फ़ सौदे बस ख़रीदे बेचे जाते हैं ये रिश्ते ज़ात रुतबा हैसियत को देख कर के मैं इन्हें रिश्ते नहीं कहता ये तो बस ये तो बस समझौता है इक दूसरे से जिस में हम को ज़िंदगी भर घुटना है बस ख़ैर इस में कुछ नया भी तो नहीं है इश्क़ में ऐसा ही तो होता रहा है और होता ही रहेगा ये मोहब्बत यूँँ ही बस मरती रहेगी और हम यूँँ ही मनाएँगे ये मातम सिर्फ़ मातम ज़िंदगी भर सिर्फ़ मातम
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"वो आईना" अब वो कॉलेज की यादें और उस लड़की से मुलाक़ातें सब ख़त्म होने को हैं ख़त्म होने को है वो सर्द मौसम जिस में धूप सेंकने आती थी वो हर रोज़ हर रोज़ मैं भी चला जाता वहीं और देखता रहता उसे धूप में बैठे हुए देखता रहता यूँँ ही कभी उस को तो कभी उस की साड़ी को धूप सेंकते हुए वो धूप जो कभी मेरा जिस्म जलाया करती थी वही धूप अब मुझे देने लगी थी ठंडी छाँव इस ठंडी छाँव को और ठंडा कर देते उस के गीले बाल इस छाँव को और घनी कर देती उस की आँखें उस की आँखों पर लगे काले चश्में में साफ़ दिख रहा था कोई अक्स कोई अक्स जिस सेे रोज़ मेरा राब्ता होता है मेरे ही घर के आईने में वो आईना जो रोज़ मुझ सेे पूछता है कि आँखों के नीचे ये काले निशान कैसे हैं और मैं सिर्फ़ इतना कह पाता हूँ - बस ऐसे ही और चला आता हूँ मैं चला आता हूँ मैं बिना उस सेे बातें किए चला आता हूँ मैं बिना उसे समझाए चला आता हूँ हर रोज़ उसे यूँँ ही तन्हा छोड़कर और अब ये सब जब ख़त्म होने को है तो मेरे पास वो एक आईना ही तो है वो आईना ही तो है जो मेरी तन्हाई दूर करेगा वो आईना ही तो है जो मेरे ज़ख़्म अब भरेगा वो आईना ही तो है जिस सेे रोज़ मुलाक़ातें होंगी वो आईना ही तो है जिस सेे ख़ूब सारी बातें होंगी वो आईना ही तो है जो मुझे सहारा देगा वो आईना ही तो है जो डूबते को किनारा देगा अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी बितानी है अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी सजानी है अब इसी के साथ कहीं खो जाऊँगा मैं अब इसी के साथ कहीं सो जाऊँगा मैं
Yuvraj Singh Faujdar
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“ख़्वाहिशें” सुनो एक बात कहनी है तुम सेे बहुत दिन से सोच रहा था आज हिम्मत हुई है सो कह रहा हूँ तुम मेरे साथ ही रहोगी ना तुम मेरे पास ही रहोगी ना हमेशा हमेशा के लिए मैं नहीं चाहता कि हम जुदा हों कभी यूँँ ही साथ चलते रहे यूँँ ही हँसते रहे खिलते रहे मैं तुम को देखता रहूँ तुम मुझे मैं तुम को सोचता रहूँ तुम मुझे कभी तुम आओ मिलने कभी मैं कभी तुम रूठो तो कभी मैं मैं तुम को मेरी ग़ज़लें सुनाऊँ और तुम मान जाओ मैं तुम को गले से लगाऊँ और तुम मान जाओ मैं जाने का कहूँ तो तुम लिपट पड़ो कुछ कहने का कहूँ तो तुम सिसक पड़ो मैं चाहता हूँ कि हम साथ साथ चलें जैसे रेल की पटरियाँ हैं ना ठीक वैसे भले कभी एक न हो पाएँ लेकिन आख़िरी मंज़िल तक हम बने रहें साथ में देखते रहें एक दूसरे के सफ़र को जीते रहें एक दूसरे के सफ़र को खोते रहें एक दूसरे को सफ़र में मिलते रहें एक दूसरे को सफ़र में बस जुदा न हों कभी ख़फ़ा न हों कभी यूँँ ही चलते रहना है हम को यूँँ ही खिलते रहना है हम को मरना नहीं है हमें एक दूजे के लिए जीना है बहुत जीना है एक दूजे के लिए
Yuvraj Singh Faujdar
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"तुम्हारे बा'द" पिछली कई रातों से एक अजीब सी उदासी है मेरे भीतर मैं दिन तो फिर भी काट लेता हूँ मगर ये जो रात है ये रात कट नहीं रही आजकल न जाने क्यूँ मैं बार बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हारे बा'द किस तरह रहूँगा मैं यहाँ पर अभी तुम साथ हो मेरे मगर ये भी पता है मुझे कि एक रोज़ चली जाओगी तुम मुझे छोड़कर किसी और ही दुनिया में वो दुनिया जहाँ चाह के भी हम मिल न पाएँगे कभी वो दुनिया जहाँ सिर्फ़ तन्हाई होगी हमारे साथ तुम्हारे बा'द मेरी दुनिया न जाने कैसी होगी तुम्हारे बा'द किस को सुनाऊँगा मेरी ग़ज़लें किस के क़िस्सों पर ठहाके मार के हँसूँगा मैं तुम्हारे बा'द कौन रूठेगा मुझ सेे किस को मनाऊँगा मैं तुम नहीं होगी तो किस सेे कहूँगा मैं सारी बातें किस के शाने पर रखूँगा अपना सिर कौन पोंछेगा आँसू मेरे कौन फिर से हँसाएगा मुझे किस पर ग़ुस्सा किया करूँँगा मैं कौन मेरे बे-सुरे गाने सुनेगा कौन मेरी बकवास बातें सुनेगा किस को रोकूँगा मैं पागलों की तरह हँसने से कौन कहेगा मुझ सेे कि तुम सेे न हो पाएगा किस सेे कहा करूँँगा कि मत पढ़ा कर ओशो को कौन मुझे हर बात पर ज्ञान देगा मैं हर दिन बस यही सोच कर डर जाता हूँ कि वो दिन कैसे देख पाऊँगा मैं वो सब कुछ कैसे झेल पाऊँगा मैं किस तरह यक़ीन दिलाऊँगा ख़ुद को कि तू जा चुकी है तुम्हारे बा'द किस में ढूँढूँगा मैं तुम को किस में तलाशूँगा वो पागलों सी हँसी कौन भरेगा इस ख़ाली जगह को कौन सर्दियाँ गुज़ारेगा उस चारपाई पर पड़े-पड़े वो चारपाई यूँँ ही उदास पड़ी रहेगी न जाने कब तक न जाने कब तक मेरी आँखें उसी चारपाई को तकती रहेंगी तुम्हारे बा'द सब कुछ बदल जाएगा न वो सुब्ह की चाय मिलेगी मुझे बिस्तर में न वो गर्मागरम सैंडविच मिलेंगे कभी न ही वो पराठे कभी खा पाऊँगा फिर से एक ख़ालीपन सा रह जाएगा यहाँ जो कभी न भर पाएगा और एक मैं रह जाऊँगा यहाँ बिल्कुल तन्हा बिल्कुल अकेला बिल्कुल उदास हमेशा के लिए तुम्हारे बा'द कुछ नहीं बचेगा मुझ में बिल्कुल ख़ाली हो जाऊँगा भीतर से मैं तुम्हारे बा'द कोई नहीं भर पाएगा इस ख़ाली जगह को तुम्हारे बा'द कुछ नहीं लिख पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं कह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं सह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द पागल हो जाऊँगा मैं
Yuvraj Singh Faujdar
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