"तुम्हारे बा'द" पिछली कई रातों से एक अजीब सी उदासी है मेरे भीतर मैं दिन तो फिर भी काट लेता हूँ मगर ये जो रात है ये रात कट नहीं रही आजकल न जाने क्यूँ मैं बार बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हारे बा'द किस तरह रहूँगा मैं यहाँ पर अभी तुम साथ हो मेरे मगर ये भी पता है मुझे कि एक रोज़ चली जाओगी तुम मुझे छोड़कर किसी और ही दुनिया में वो दुनिया जहाँ चाह के भी हम मिल न पाएँगे कभी वो दुनिया जहाँ सिर्फ़ तन्हाई होगी हमारे साथ तुम्हारे बा'द मेरी दुनिया न जाने कैसी होगी तुम्हारे बा'द किस को सुनाऊँगा मेरी ग़ज़लें किस के क़िस्सों पर ठहाके मार के हँसूँगा मैं तुम्हारे बा'द कौन रूठेगा मुझ सेे किस को मनाऊँगा मैं तुम नहीं होगी तो किस सेे कहूँगा मैं सारी बातें किस के शाने पर रखूँगा अपना सिर कौन पोंछेगा आँसू मेरे कौन फिर से हँसाएगा मुझे किस पर ग़ुस्सा किया करूँँगा मैं कौन मेरे बे-सुरे गाने सुनेगा कौन मेरी बकवास बातें सुनेगा किस को रोकूँगा मैं पागलों की तरह हँसने से कौन कहेगा मुझ सेे कि तुम सेे न हो पाएगा किस सेे कहा करूँँगा कि मत पढ़ा कर ओशो को कौन मुझे हर बात पर ज्ञान देगा मैं हर दिन बस यही सोच कर डर जाता हूँ कि वो दिन कैसे देख पाऊँगा मैं वो सब कुछ कैसे झेल पाऊँगा मैं किस तरह यक़ीन दिलाऊँगा ख़ुद को कि तू जा चुकी है तुम्हारे बा'द किस में ढूँढूँगा मैं तुम को किस में तलाशूँगा वो पागलों सी हँसी कौन भरेगा इस ख़ाली जगह को कौन सर्दियाँ गुज़ारेगा उस चारपाई पर पड़े-पड़े वो चारपाई यूँँ ही उदास पड़ी रहेगी न जाने कब तक न जाने कब तक मेरी आँखें उसी चारपाई को तकती रहेंगी तुम्हारे बा'द सब कुछ बदल जाएगा न वो सुब्ह की चाय मिलेगी मुझे बिस्तर में न वो गर्मागरम सैंडविच मिलेंगे कभी न ही वो पराठे कभी खा पाऊँगा फिर से एक ख़ालीपन सा रह जाएगा यहाँ जो कभी न भर पाएगा और एक मैं रह जाऊँगा यहाँ बिल्कुल तन्हा बिल्कुल अकेला बिल्कुल उदास हमेशा के लिए तुम्हारे बा'द कुछ नहीं बचेगा मुझ में बिल्कुल ख़ाली हो जाऊँगा भीतर से मैं तुम्हारे बा'द कोई नहीं भर पाएगा इस ख़ाली जगह को तुम्हारे बा'द कुछ नहीं लिख पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं कह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं सह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द पागल हो जाऊँगा मैं
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा
Danish Balliavi
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मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत तुम ने क्यूँ की ये मोहब्बत क्यूँ किए हम ने वो वादे क्यूँ वो क़स में हम ने खाईं क्यूँ गए हम उस जगह पर क्यूँ बनाईं हम ने यादें नाम क्यूँ लिख आए अपना पेड़ पर हम क्यूँ निशानी पेड़ पर हम छोड़ आए क्यूँ उसे तकलीफ़ों का हिस्सा बनाया हम ने क्यूँ ख़्वाबों का गुलदस्ता सजाया बेंच पर क्यूँ हम ने वो लम्हे गुज़ारे मैं ने आख़िर क्यूँ तेरे गेसू सँवारे क्यूँ रखा सिर मैं ने तेरी गोद में क्यूँ बोझ क्यूँ तुम ने उतारा मेरे सिर का मैं ने क्यूँ पकड़ी तुम्हारी वो कलाई क्यूँ तुम्हारे हाथ चू में क्यूँ गले तुम को लगाया क्यूँ जताया प्यार हम ने क्यूँ क़रीब आए हम ऐसे क्यूँ बसा आए वो दुनिया हम वहाँ पर जब पता ही था उजड़ना होगा इस को जब पता ही था बिछड़ना होगा हम को क्यूँ न सोची हम ने ये बात क्या फ़क़त दिल मिलने से रिश्ते हुए हैं जी नहीं ये तो हमारी भूल है बस कौन सुनता है दिलों की बात साहब बस किए जाते हैं सौदे सिर्फ़ सौदे बस ख़रीदे बेचे जाते हैं ये रिश्ते ज़ात रुतबा हैसियत को देख कर के मैं इन्हें रिश्ते नहीं कहता ये तो बस ये तो बस समझौता है इक दूसरे से जिस में हम को ज़िंदगी भर घुटना है बस ख़ैर इस में कुछ नया भी तो नहीं है इश्क़ में ऐसा ही तो होता रहा है और होता ही रहेगा ये मोहब्बत यूँँ ही बस मरती रहेगी और हम यूँँ ही मनाएँगे ये मातम सिर्फ़ मातम ज़िंदगी भर सिर्फ़ मातम
Yuvraj Singh Faujdar
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"वो आईना" अब वो कॉलेज की यादें और उस लड़की से मुलाक़ातें सब ख़त्म होने को हैं ख़त्म होने को है वो सर्द मौसम जिस में धूप सेंकने आती थी वो हर रोज़ हर रोज़ मैं भी चला जाता वहीं और देखता रहता उसे धूप में बैठे हुए देखता रहता यूँँ ही कभी उस को तो कभी उस की साड़ी को धूप सेंकते हुए वो धूप जो कभी मेरा जिस्म जलाया करती थी वही धूप अब मुझे देने लगी थी ठंडी छाँव इस ठंडी छाँव को और ठंडा कर देते उस के गीले बाल इस छाँव को और घनी कर देती उस की आँखें उस की आँखों पर लगे काले चश्में में साफ़ दिख रहा था कोई अक्स कोई अक्स जिस सेे रोज़ मेरा राब्ता होता है मेरे ही घर के आईने में वो आईना जो रोज़ मुझ सेे पूछता है कि आँखों के नीचे ये काले निशान कैसे हैं और मैं सिर्फ़ इतना कह पाता हूँ - बस ऐसे ही और चला आता हूँ मैं चला आता हूँ मैं बिना उस सेे बातें किए चला आता हूँ मैं बिना उसे समझाए चला आता हूँ हर रोज़ उसे यूँँ ही तन्हा छोड़कर और अब ये सब जब ख़त्म होने को है तो मेरे पास वो एक आईना ही तो है वो आईना ही तो है जो मेरी तन्हाई दूर करेगा वो आईना ही तो है जो मेरे ज़ख़्म अब भरेगा वो आईना ही तो है जिस सेे रोज़ मुलाक़ातें होंगी वो आईना ही तो है जिस सेे ख़ूब सारी बातें होंगी वो आईना ही तो है जो मुझे सहारा देगा वो आईना ही तो है जो डूबते को किनारा देगा अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी बितानी है अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी सजानी है अब इसी के साथ कहीं खो जाऊँगा मैं अब इसी के साथ कहीं सो जाऊँगा मैं
Yuvraj Singh Faujdar
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“ख़्वाहिशें” सुनो एक बात कहनी है तुम सेे बहुत दिन से सोच रहा था आज हिम्मत हुई है सो कह रहा हूँ तुम मेरे साथ ही रहोगी ना तुम मेरे पास ही रहोगी ना हमेशा हमेशा के लिए मैं नहीं चाहता कि हम जुदा हों कभी यूँँ ही साथ चलते रहे यूँँ ही हँसते रहे खिलते रहे मैं तुम को देखता रहूँ तुम मुझे मैं तुम को सोचता रहूँ तुम मुझे कभी तुम आओ मिलने कभी मैं कभी तुम रूठो तो कभी मैं मैं तुम को मेरी ग़ज़लें सुनाऊँ और तुम मान जाओ मैं तुम को गले से लगाऊँ और तुम मान जाओ मैं जाने का कहूँ तो तुम लिपट पड़ो कुछ कहने का कहूँ तो तुम सिसक पड़ो मैं चाहता हूँ कि हम साथ साथ चलें जैसे रेल की पटरियाँ हैं ना ठीक वैसे भले कभी एक न हो पाएँ लेकिन आख़िरी मंज़िल तक हम बने रहें साथ में देखते रहें एक दूसरे के सफ़र को जीते रहें एक दूसरे के सफ़र को खोते रहें एक दूसरे को सफ़र में मिलते रहें एक दूसरे को सफ़र में बस जुदा न हों कभी ख़फ़ा न हों कभी यूँँ ही चलते रहना है हम को यूँँ ही खिलते रहना है हम को मरना नहीं है हमें एक दूजे के लिए जीना है बहुत जीना है एक दूजे के लिए
Yuvraj Singh Faujdar
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