"वो आईना" अब वो कॉलेज की यादें और उस लड़की से मुलाक़ातें सब ख़त्म होने को हैं ख़त्म होने को है वो सर्द मौसम जिस में धूप सेंकने आती थी वो हर रोज़ हर रोज़ मैं भी चला जाता वहीं और देखता रहता उसे धूप में बैठे हुए देखता रहता यूँँ ही कभी उस को तो कभी उस की साड़ी को धूप सेंकते हुए वो धूप जो कभी मेरा जिस्म जलाया करती थी वही धूप अब मुझे देने लगी थी ठंडी छाँव इस ठंडी छाँव को और ठंडा कर देते उस के गीले बाल इस छाँव को और घनी कर देती उस की आँखें उस की आँखों पर लगे काले चश्में में साफ़ दिख रहा था कोई अक्स कोई अक्स जिस सेे रोज़ मेरा राब्ता होता है मेरे ही घर के आईने में वो आईना जो रोज़ मुझ सेे पूछता है कि आँखों के नीचे ये काले निशान कैसे हैं और मैं सिर्फ़ इतना कह पाता हूँ - बस ऐसे ही और चला आता हूँ मैं चला आता हूँ मैं बिना उस सेे बातें किए चला आता हूँ मैं बिना उसे समझाए चला आता हूँ हर रोज़ उसे यूँँ ही तन्हा छोड़कर और अब ये सब जब ख़त्म होने को है तो मेरे पास वो एक आईना ही तो है वो आईना ही तो है जो मेरी तन्हाई दूर करेगा वो आईना ही तो है जो मेरे ज़ख़्म अब भरेगा वो आईना ही तो है जिस सेे रोज़ मुलाक़ातें होंगी वो आईना ही तो है जिस सेे ख़ूब सारी बातें होंगी वो आईना ही तो है जो मुझे सहारा देगा वो आईना ही तो है जो डूबते को किनारा देगा अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी बितानी है अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी सजानी है अब इसी के साथ कहीं खो जाऊँगा मैं अब इसी के साथ कहीं सो जाऊँगा मैं
Related Nazm
"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
16 likes
मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
52 likes
"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
20 likes
"इक लड़की" ये पूरी दुनिया बहुत अच्छी लगती है जब वो लड़की रस्ता मेरा तकती है फिर ये दुनिया सारी अपनी लगती है जब प्यार से बाहों में वो लड़की भरती है और ये सारी दुनिया एक तरफ़ है या'नी बाक़ी एक तरफ़ वो लड़की है चेहरे की उस की मासूम वो हँसी जैसे मुझ को जीवन नया अता करती है फिर मुझ अधूरे से लड़के को साथ आ कर मेरे वो पूरा करती है सारे ख़्वाब भी पूरे होने लगते हैं जब मेरे साथ वो लड़की रहती है सच पूछो तो वो लड़की इस नादान लड़के को आ कर नादान से वो समझदार करती है उस प्यारी सी लड़की को मैं क्या कहूँ मेरी हर ग़ज़ल को वो मुकम्मल करती है वो लड़की मेरी ग़ज़ल के मतले से शुरू होकर शे'र क़ाफ़िया रदीफ़ से होकर मक़्ते पर रुकती है वो लड़की कभी बहर में तो कभी बिना बहर के भी ख़ूब-सूरत लगती है साथ में उस के चार क़दम बस चल पाऊँ मेरी ख़ुदा से बस यही दुआ रहती है
Lalit Mohan Joshi
4 likes
उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली
Iqbal Ashhar
19 likes
More from Yuvraj Singh Faujdar
मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत तुम ने क्यूँ की ये मोहब्बत क्यूँ किए हम ने वो वादे क्यूँ वो क़स में हम ने खाईं क्यूँ गए हम उस जगह पर क्यूँ बनाईं हम ने यादें नाम क्यूँ लिख आए अपना पेड़ पर हम क्यूँ निशानी पेड़ पर हम छोड़ आए क्यूँ उसे तकलीफ़ों का हिस्सा बनाया हम ने क्यूँ ख़्वाबों का गुलदस्ता सजाया बेंच पर क्यूँ हम ने वो लम्हे गुज़ारे मैं ने आख़िर क्यूँ तेरे गेसू सँवारे क्यूँ रखा सिर मैं ने तेरी गोद में क्यूँ बोझ क्यूँ तुम ने उतारा मेरे सिर का मैं ने क्यूँ पकड़ी तुम्हारी वो कलाई क्यूँ तुम्हारे हाथ चू में क्यूँ गले तुम को लगाया क्यूँ जताया प्यार हम ने क्यूँ क़रीब आए हम ऐसे क्यूँ बसा आए वो दुनिया हम वहाँ पर जब पता ही था उजड़ना होगा इस को जब पता ही था बिछड़ना होगा हम को क्यूँ न सोची हम ने ये बात क्या फ़क़त दिल मिलने से रिश्ते हुए हैं जी नहीं ये तो हमारी भूल है बस कौन सुनता है दिलों की बात साहब बस किए जाते हैं सौदे सिर्फ़ सौदे बस ख़रीदे बेचे जाते हैं ये रिश्ते ज़ात रुतबा हैसियत को देख कर के मैं इन्हें रिश्ते नहीं कहता ये तो बस ये तो बस समझौता है इक दूसरे से जिस में हम को ज़िंदगी भर घुटना है बस ख़ैर इस में कुछ नया भी तो नहीं है इश्क़ में ऐसा ही तो होता रहा है और होता ही रहेगा ये मोहब्बत यूँँ ही बस मरती रहेगी और हम यूँँ ही मनाएँगे ये मातम सिर्फ़ मातम ज़िंदगी भर सिर्फ़ मातम
Yuvraj Singh Faujdar
2 likes
"तुम्हारे बा'द" पिछली कई रातों से एक अजीब सी उदासी है मेरे भीतर मैं दिन तो फिर भी काट लेता हूँ मगर ये जो रात है ये रात कट नहीं रही आजकल न जाने क्यूँ मैं बार बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हारे बा'द किस तरह रहूँगा मैं यहाँ पर अभी तुम साथ हो मेरे मगर ये भी पता है मुझे कि एक रोज़ चली जाओगी तुम मुझे छोड़कर किसी और ही दुनिया में वो दुनिया जहाँ चाह के भी हम मिल न पाएँगे कभी वो दुनिया जहाँ सिर्फ़ तन्हाई होगी हमारे साथ तुम्हारे बा'द मेरी दुनिया न जाने कैसी होगी तुम्हारे बा'द किस को सुनाऊँगा मेरी ग़ज़लें किस के क़िस्सों पर ठहाके मार के हँसूँगा मैं तुम्हारे बा'द कौन रूठेगा मुझ सेे किस को मनाऊँगा मैं तुम नहीं होगी तो किस सेे कहूँगा मैं सारी बातें किस के शाने पर रखूँगा अपना सिर कौन पोंछेगा आँसू मेरे कौन फिर से हँसाएगा मुझे किस पर ग़ुस्सा किया करूँँगा मैं कौन मेरे बे-सुरे गाने सुनेगा कौन मेरी बकवास बातें सुनेगा किस को रोकूँगा मैं पागलों की तरह हँसने से कौन कहेगा मुझ सेे कि तुम सेे न हो पाएगा किस सेे कहा करूँँगा कि मत पढ़ा कर ओशो को कौन मुझे हर बात पर ज्ञान देगा मैं हर दिन बस यही सोच कर डर जाता हूँ कि वो दिन कैसे देख पाऊँगा मैं वो सब कुछ कैसे झेल पाऊँगा मैं किस तरह यक़ीन दिलाऊँगा ख़ुद को कि तू जा चुकी है तुम्हारे बा'द किस में ढूँढूँगा मैं तुम को किस में तलाशूँगा वो पागलों सी हँसी कौन भरेगा इस ख़ाली जगह को कौन सर्दियाँ गुज़ारेगा उस चारपाई पर पड़े-पड़े वो चारपाई यूँँ ही उदास पड़ी रहेगी न जाने कब तक न जाने कब तक मेरी आँखें उसी चारपाई को तकती रहेंगी तुम्हारे बा'द सब कुछ बदल जाएगा न वो सुब्ह की चाय मिलेगी मुझे बिस्तर में न वो गर्मागरम सैंडविच मिलेंगे कभी न ही वो पराठे कभी खा पाऊँगा फिर से एक ख़ालीपन सा रह जाएगा यहाँ जो कभी न भर पाएगा और एक मैं रह जाऊँगा यहाँ बिल्कुल तन्हा बिल्कुल अकेला बिल्कुल उदास हमेशा के लिए तुम्हारे बा'द कुछ नहीं बचेगा मुझ में बिल्कुल ख़ाली हो जाऊँगा भीतर से मैं तुम्हारे बा'द कोई नहीं भर पाएगा इस ख़ाली जगह को तुम्हारे बा'द कुछ नहीं लिख पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं कह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं सह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द पागल हो जाऊँगा मैं
Yuvraj Singh Faujdar
1 likes
“ख़्वाहिशें” सुनो एक बात कहनी है तुम सेे बहुत दिन से सोच रहा था आज हिम्मत हुई है सो कह रहा हूँ तुम मेरे साथ ही रहोगी ना तुम मेरे पास ही रहोगी ना हमेशा हमेशा के लिए मैं नहीं चाहता कि हम जुदा हों कभी यूँँ ही साथ चलते रहे यूँँ ही हँसते रहे खिलते रहे मैं तुम को देखता रहूँ तुम मुझे मैं तुम को सोचता रहूँ तुम मुझे कभी तुम आओ मिलने कभी मैं कभी तुम रूठो तो कभी मैं मैं तुम को मेरी ग़ज़लें सुनाऊँ और तुम मान जाओ मैं तुम को गले से लगाऊँ और तुम मान जाओ मैं जाने का कहूँ तो तुम लिपट पड़ो कुछ कहने का कहूँ तो तुम सिसक पड़ो मैं चाहता हूँ कि हम साथ साथ चलें जैसे रेल की पटरियाँ हैं ना ठीक वैसे भले कभी एक न हो पाएँ लेकिन आख़िरी मंज़िल तक हम बने रहें साथ में देखते रहें एक दूसरे के सफ़र को जीते रहें एक दूसरे के सफ़र को खोते रहें एक दूसरे को सफ़र में मिलते रहें एक दूसरे को सफ़र में बस जुदा न हों कभी ख़फ़ा न हों कभी यूँँ ही चलते रहना है हम को यूँँ ही खिलते रहना है हम को मरना नहीं है हमें एक दूजे के लिए जीना है बहुत जीना है एक दूजे के लिए
Yuvraj Singh Faujdar
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Yuvraj Singh Faujdar.
Similar Moods
More moods that pair well with Yuvraj Singh Faujdar's nazm.







