nazmKuch Alfaaz

“ख़्वाहिशें” सुनो एक बात कहनी है तुम सेे बहुत दिन से सोच रहा था आज हिम्मत हुई है सो कह रहा हूँ तुम मेरे साथ ही रहोगी ना तुम मेरे पास ही रहोगी ना हमेशा हमेशा के लिए मैं नहीं चाहता कि हम जुदा हों कभी यूँँ ही साथ चलते रहे यूँँ ही हँसते रहे खिलते रहे मैं तुम को देखता रहूँ तुम मुझे मैं तुम को सोचता रहूँ तुम मुझे कभी तुम आओ मिलने कभी मैं कभी तुम रूठो तो कभी मैं मैं तुम को मेरी ग़ज़लें सुनाऊँ और तुम मान जाओ मैं तुम को गले से लगाऊँ और तुम मान जाओ मैं जाने का कहूँ तो तुम लिपट पड़ो कुछ कहने का कहूँ तो तुम सिसक पड़ो मैं चाहता हूँ कि हम साथ साथ चलें जैसे रेल की पटरियाँ हैं ना ठीक वैसे भले कभी एक न हो पाएँ लेकिन आख़िरी मंज़िल तक हम बने रहें साथ में देखते रहें एक दूसरे के सफ़र को जीते रहें एक दूसरे के सफ़र को खोते रहें एक दूसरे को सफ़र में मिलते रहें एक दूसरे को सफ़र में बस जुदा न हों कभी ख़फ़ा न हों कभी यूँँ ही चलते रहना है हम को यूँँ ही खिलते रहना है हम को मरना नहीं है हमें एक दूजे के लिए जीना है बहुत जीना है एक दूजे के लिए

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत तुम ने क्यूँ की ये मोहब्बत क्यूँ किए हम ने वो वादे क्यूँ वो क़स में हम ने खाईं क्यूँ गए हम उस जगह पर क्यूँ बनाईं हम ने यादें नाम क्यूँ लिख आए अपना पेड़ पर हम क्यूँ निशानी पेड़ पर हम छोड़ आए क्यूँ उसे तकलीफ़ों का हिस्सा बनाया हम ने क्यूँ ख़्वाबों का गुलदस्ता सजाया बेंच पर क्यूँ हम ने वो लम्हे गुज़ारे मैं ने आख़िर क्यूँ तेरे गेसू सँवारे क्यूँ रखा सिर मैं ने तेरी गोद में क्यूँ बोझ क्यूँ तुम ने उतारा मेरे सिर का मैं ने क्यूँ पकड़ी तुम्हारी वो कलाई क्यूँ तुम्हारे हाथ चू में क्यूँ गले तुम को लगाया क्यूँ जताया प्यार हम ने क्यूँ क़रीब आए हम ऐसे क्यूँ बसा आए वो दुनिया हम वहाँ पर जब पता ही था उजड़ना होगा इस को जब पता ही था बिछड़ना होगा हम को क्यूँ न सोची हम ने ये बात क्या फ़क़त दिल मिलने से रिश्ते हुए हैं जी नहीं ये तो हमारी भूल है बस कौन सुनता है दिलों की बात साहब बस किए जाते हैं सौदे सिर्फ़ सौदे बस ख़रीदे बेचे जाते हैं ये रिश्ते ज़ात रुतबा हैसियत को देख कर के मैं इन्हें रिश्ते नहीं कहता ये तो बस ये तो बस समझौता है इक दूसरे से जिस में हम को ज़िंदगी भर घुटना है बस ख़ैर इस में कुछ नया भी तो नहीं है इश्क़ में ऐसा ही तो होता रहा है और होता ही रहेगा ये मोहब्बत यूँँ ही बस मरती रहेगी और हम यूँँ ही मनाएँगे ये मातम सिर्फ़ मातम ज़िंदगी भर सिर्फ़ मातम

Yuvraj Singh Faujdar

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"वो आईना" अब वो कॉलेज की यादें और उस लड़की से मुलाक़ातें सब ख़त्म होने को हैं ख़त्म होने को है वो सर्द मौसम जिस में धूप सेंकने आती थी वो हर रोज़ हर रोज़ मैं भी चला जाता वहीं और देखता रहता उसे धूप में बैठे हुए देखता रहता यूँँ ही कभी उस को तो कभी उस की साड़ी को धूप सेंकते हुए वो धूप जो कभी मेरा जिस्म जलाया करती थी वही धूप अब मुझे देने लगी थी ठंडी छाँव इस ठंडी छाँव को और ठंडा कर देते उस के गीले बाल इस छाँव को और घनी कर देती उस की आँखें उस की आँखों पर लगे काले चश्में में साफ़ दिख रहा था कोई अक्स कोई अक्स जिस सेे रोज़ मेरा राब्ता होता है मेरे ही घर के आईने में वो आईना जो रोज़ मुझ सेे पूछता है कि आँखों के नीचे ये काले निशान कैसे हैं और मैं सिर्फ़ इतना कह पाता हूँ - बस ऐसे ही और चला आता हूँ मैं चला आता हूँ मैं बिना उस सेे बातें किए चला आता हूँ मैं बिना उसे समझाए चला आता हूँ हर रोज़ उसे यूँँ ही तन्हा छोड़कर और अब ये सब जब ख़त्म होने को है तो मेरे पास वो एक आईना ही तो है वो आईना ही तो है जो मेरी तन्हाई दूर करेगा वो आईना ही तो है जो मेरे ज़ख़्म अब भरेगा वो आईना ही तो है जिस सेे रोज़ मुलाक़ातें होंगी वो आईना ही तो है जिस सेे ख़ूब सारी बातें होंगी वो आईना ही तो है जो मुझे सहारा देगा वो आईना ही तो है जो डूबते को किनारा देगा अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी बितानी है अब इसी आईने के साथ ज़िंदगी सजानी है अब इसी के साथ कहीं खो जाऊँगा मैं अब इसी के साथ कहीं सो जाऊँगा मैं

Yuvraj Singh Faujdar

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"तुम्हारे बा'द" पिछली कई रातों से एक अजीब सी उदासी है मेरे भीतर मैं दिन तो फिर भी काट लेता हूँ मगर ये जो रात है ये रात कट नहीं रही आजकल न जाने क्यूँ मैं बार बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हारे बा'द किस तरह रहूँगा मैं यहाँ पर अभी तुम साथ हो मेरे मगर ये भी पता है मुझे कि एक रोज़ चली जाओगी तुम मुझे छोड़कर किसी और ही दुनिया में वो दुनिया जहाँ चाह के भी हम मिल न पाएँगे कभी वो दुनिया जहाँ सिर्फ़ तन्हाई होगी हमारे साथ तुम्हारे बा'द मेरी दुनिया न जाने कैसी होगी तुम्हारे बा'द किस को सुनाऊँगा मेरी ग़ज़लें किस के क़िस्सों पर ठहाके मार के हँसूँगा मैं तुम्हारे बा'द कौन रूठेगा मुझ सेे किस को मनाऊँगा मैं तुम नहीं होगी तो किस सेे कहूँगा मैं सारी बातें किस के शाने पर रखूँगा अपना सिर कौन पोंछेगा आँसू मेरे कौन फिर से हँसाएगा मुझे किस पर ग़ुस्सा किया करूँँगा मैं कौन मेरे बे-सुरे गाने सुनेगा कौन मेरी बकवास बातें सुनेगा किस को रोकूँगा मैं पागलों की तरह हँसने से कौन कहेगा मुझ सेे कि तुम सेे न हो पाएगा किस सेे कहा करूँँगा कि मत पढ़ा कर ओशो को कौन मुझे हर बात पर ज्ञान देगा मैं हर दिन बस यही सोच कर डर जाता हूँ कि वो दिन कैसे देख पाऊँगा मैं वो सब कुछ कैसे झेल पाऊँगा मैं किस तरह यक़ीन दिलाऊँगा ख़ुद को कि तू जा चुकी है तुम्हारे बा'द किस में ढूँढूँगा मैं तुम को किस में तलाशूँगा वो पागलों सी हँसी कौन भरेगा इस ख़ाली जगह को कौन सर्दियाँ गुज़ारेगा उस चारपाई पर पड़े-पड़े वो चारपाई यूँँ ही उदास पड़ी रहेगी न जाने कब तक न जाने कब तक मेरी आँखें उसी चारपाई को तकती रहेंगी तुम्हारे बा'द सब कुछ बदल जाएगा न वो सुब्ह की चाय मिलेगी मुझे बिस्तर में न वो गर्मागरम सैंडविच मिलेंगे कभी न ही वो पराठे कभी खा पाऊँगा फिर से एक ख़ालीपन सा रह जाएगा यहाँ जो कभी न भर पाएगा और एक मैं रह जाऊँगा यहाँ बिल्कुल तन्हा बिल्कुल अकेला बिल्कुल उदास हमेशा के लिए तुम्हारे बा'द कुछ नहीं बचेगा मुझ में बिल्कुल ख़ाली हो जाऊँगा भीतर से मैं तुम्हारे बा'द कोई नहीं भर पाएगा इस ख़ाली जगह को तुम्हारे बा'द कुछ नहीं लिख पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं कह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द कुछ नहीं सह पाऊँगा मैं तुम्हारे बा'द पागल हो जाऊँगा मैं

Yuvraj Singh Faujdar

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