nazmKuch Alfaaz

"दोस्ती" दोस्ती दिल का सुकूँ ज़ीस्त की आसानी है दोस्त है पास तो फिर दूर परेशानी है दोस्ती साथ में बस वक़्त बिताना ही नहीं घूमना फिरना फ़क़त हँसना हसाना ही नहीं शामिल-ए-हाल है ख़ालिक़ की इनायत बन कर दोस्ती साथ में रहती है हिदायत बन कर दोस्त है साथ में तो साथ है ख़ुशहाली भी दोस्ती करती है अख़लाक़ की रखवाली भी दफ़अ'तन लब पे फ़क़त दोस्त का नाम आता है दोस्त मुश्किल में हो तो दोस्त ही काम आता है दोस्ती रास्ते हमवार बना देती है दोस्ती पैर के छालों की दवा देती है दोस्त हो साथ में तो दिल में तवानाई है दोस्त आ जाए जो महफ़िल में तो रा'नाई है दिल-ए-मायूस की तन्हाई मिटा देती है दोस्ती उम्र की रफ़्तार घटा देती है दोस्त बचपन में अगर कोई बिछड़ जाता है ज़िंदगानी के हर एक मोड़ पर याद आता है ये भी सच है कि ज़माने की ख़ुशी एक तरफ़ दोस्त के लौट के आने की ख़ुशी एक तरफ़ दोस्त एक बार जो सीने से लिपट जाता है डूबती नब्ज़ का सूरज भी पलट आता है जब ग़लत दोस्त की सोहबत से बिगड़ जाती है कितने जंजाल में ये ज़िंदगी पड़ जाती है हर ग़लत बात पे यूँँ दोस्त की हामी न भरो हाँ करो दोस्ती लेकिन ये ग़ुलामी न करो है वुज़ू जैसे अहम रब की इबादत के लिए दोस्ती फ़र्ज़ है वैसे ही मोहब्बत के लिए तेरा बातिन भी अगर है तेरे ज़ाहिर जैसा दोस्त मिल जाएगा एक इब्न-ए-मज़ाहिर जैसा

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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली

Iqbal Ashhar

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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मोहब्बत ख़ुद अपने लिए जिस्म चुनती है और जाल बुनती है उन के लिए जो ये आग अपने सीनों में भरने को तय्यार हों घुट के जीने से बेज़ार हों मोहब्बत कभी एक से या कभी एक सौ एक लोगों से होने का ऐलान एक साथ करती है इस में कई उम्र जिन की कोई क़द्र नहीं मोहब्बत किसी बेंच पर एक मर्द और औरत ने खाई हुई इक अधूरी क़सम है मोहब्बत में मर जाना मरना नहीं मोहब्बत तो ख़ुद देवताओं का पुनर्जनम है मोहब्बत किसी राहेबाँ की कलाई से उतरी हुई चूड़ियों की खनक है मोहब्बत किसी एक मुर्दा सितारे को ख़ैरात में मिलने वाली चमक है मोहब्बत पे शक तो ख़ुद अपने ही हस्ती पे शक है मोहब्बत तो महबूब के क़द्द-ओ-कामत से जन्मी हुई वो अलामत है और तेज़ बारिश में सह में हुए हाथियों पर बड़ी छतरियों की तरह है मोहब्बत सर्द मुल्कों में वापस पलटते हुए अपने ज़ख़्मी परों से ख़लाओं में लहू की लकीरें बनाती हुई गूँज है, मूँज है और दिल की ज़मीनों को सैराब करती हुई नहर है, क़हर है, ज़हर है जो रगों में उतरकर बदन को उदासी के उस शहर में मारकर ख़ैर आबाद कहती है जो कैलोविनो ने बस ज़ेहन में तसव्वुर किया था जो मस्जिद में सिपारों को सीनों में महफ़ूज़ करते हुए बच्चियों को ख़ुदा से डराते हुए मौलवी का मकर है मोहब्बत कलीसाओं में रूसी अखरोट की लकड़ियों से बनी कुर्सियों पर बुज़ुर्गों की आँखों में मरने का डर है मोहब्बत मोहब्बत ज़हीनों पे खुलती है इस को कभी कुंद ज़ेहनों से कोई नाका नहीं मोहब्बत को क्या कोई अपना है या ग़ैर है इस में आदमी सब कुछ लुटाकर भी कहता है कि ख़ैर है

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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हम और वालिदैन जब अपने कार-ए-ख़ैर पर शादाँ हुआ करो उस वक़्त वालिदैन के हक़ में दुआ करो ये बूढ़े वालिदैन तो बुझते चराग़ हैं फ़ानूस बन के इन की हिफ़ाज़त किया करो मसरूफ़ ज़िन्दगी में ज़रा वक़्त ढूँढ़ कर कुछ अपने वालिदैन के दिल की सुना करो बाहर कहीं भी जाओ अगर अक़रबा के साथ तो अपने वालिदैन के पीछे चला करो आवाज़ वालिदैन से ऊँची न हो कभी नज़रें भी उन के सामने नीची रखा करो वाजिब है वालिदैन का हर हाल में अदब उफ़ भी ज़बाँ पे आए तो तौबा किया करो जिस का है जो भी हक़ उसे देते रहो मगर हक़ अपने वालिदैन का पहले अदा करो तुम अपने घर में रख न सको वालिदैन को ऐसा न वक़्त आए कभी ये दुआ करो रातों की नींद छीन ले जब अपना शीरख़ार तो याद वालिदैन की मेहनत किया करो बरकत न हो रही हो अगर रोज़गार में क्या तुम सेे वालिदैन ख़फ़ा हैं पता करो दुनिया से वालिदैन अगर हो चुके विदा हर रोज़ उन के नाम से सदक़ा दिया करो सालिम बुरा कहे जो कोई वालिदैन को लाज़िम है ऐसे शख़्स से आजिज़ रहा करो

Salim Husain

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"नया आसमान" इसी ज़मीं पे नया आसमान देखा है बदलते हम ने भी सारा जहान देखा है निहाँ है लहजे में अंदाज़ ख़ाकसारी का हमारी आँखों ने कच्चा मकान देखा है थीं जिस को क़ुर्ब-ए-इलाही की मंज़िलें दरकार उसी को देते हुए इम्तिहान देखा है जो दायरे में तक़ाबुल के हो गया महदूद बिखरते हम ने वही ख़ानदान देखा है लगाम अपनी ज़बाँ पर भी जो लगा न सके वतन ने ऐसा भी एक हुक्मरान देखा है बदन पे ज़ख़्म दिखाता है जो ज़माने को उसी के हाथ में तीर-ओ-कमान देखा है बदल बदल के तराज़ू पे हक़-ओ-बातिल के जिसे भी देखा है बस दरमियान देखा है समझ गया है जो इस ग़म का फ़लसफ़ा सालेम तमाम उम्र उसे शादमान देखा है

Salim Husain

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