दुआ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ आस हम सब साथ उठाएँ हर मज़हब के दुतकारे लोग सब तरह से नाकारे लोग हम वो काफ़िर हैं जिन को मंदिर ने घुसने नहीं दिया हम वो काफ़िर हैं जिन को मस्जिद में पनाह नहीं मिली हम वो काफ़िर हैं जिनने ख़ुदा की नफ़ी में शे'र पढ़े कभी मज़ाक़ बनाया हम ने बंदों पर तंज़ अनेक कहे अब भी हम वो काफ़िर हैं ख़ुदा जिन का है ही नहीं पर अब जब कुछ तय ही नहीं कि कब तक लोग मरेंगे अब और वो जो रोज़ी के मारे हैं बच गए तो क्या करेंगे अब आओ, मेरे काफ़िर कि तुम्हें आज हरम ने याद किया है नमाज़ों का असर नहीं दिखता दीएं जल कर राख हुए आओ हाथ उठाते हैं दुआ करते हैं माना के ख़ुदा नहीं होता दुआ करें ,आवाज़ बनें बीमारों की साँस बनें वो साइंसदाँ जो हवा बना रहे वो ड्राइवर जो बीमार उठा रहे आओ घर बैठ कर दुआ करें दुआ कि दुनिया ठीक हो जाए कोई भी शख़्स मरे नहीं अब माना कि ये भी ज़्यादा है दुनिया की साँस अब आधा है जिस के घर ये डाइन गई हर शख़्स वहाँ बिलखता है घर के घर बीमार हुए आओ काफ़िरों फिर इक बार तुम इक इक आँसू ही दे दो इन इक इक आँसू से शायद दुआ कुबूल ही हो जाए रोने की रस्म निभाई जाए ये मरती धरती बचाई जाए हर तक हवा पहुँच पाए हर तक दुआ पहुँच पाए आओ ना इक साथ उठाएँ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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क्या ये अंतिम वक़्त नहीं सुब्ह सुब्ह सी होती नहीं शामों में बेचैनी रहती है सिम्पटम सिम्पटम रटते हैं क्या होता है क्या नहीं होता क्या करना और क्या नहीं करना जीना कैसे और जीते रहना ये जीवन है ज़ब्त नहीं क्या ये अंतिम वक़्त नहीं पत्ते पत्ते पर है ख़तरा फूल फूल पर मौत की गंध वो क़ुदरत पर लिखने वाले आज हैं ख़ुद कमरे में बंद जो माली थे भाग गए सपने देकर जाग गए मुझ सेे क्या पूछे हो तुम मैं तेरे जैसा फ़र्द नहीं क्या ये अंतिम वक़्त नहीं किसी को हवा नहीं पहुँची किसी को दवा नहीं पहुँची किसी को दुआ नहीं पहुँची तुम कैसे हो अच्छे हो मैं अच्छा हूँ! पर कब तक शायद ये अंतिम वक़्त ही है और बड़ा सख्त भी है मैं तुम सेे इक बात कहूँ "स्मृति, मैं ने तुम सेे इश्क़ किया और कभी नहीं छोड़ा इश्क़ मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी ख़ुदा पर य़कीन कभी नहीं तुम पर य़कीन सदा ही किया शायद कभी नहीं कह पाऊँ तुम सेे तुम रहो पर मैं न रहूँ मैं रहूँ पर तुम न रहो जान! मैं ने बस एक काम सही से किया ईमानदारी ये इश्क़ किया बस इस दिन के लिए कि लौट आओ तुम नहीं आओगी मालूम है तुम मुझ अंधे की लाठी थी मेरे साथ रहने का शुक्रिया मुझे राह दिखाने का शुक्रिया
Vibhat kumar
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एक बजते हैं रात के एक बजते हैं ख़ुदा का नाम रटते हैं बीमार के साँस नहीं आ रही कोई भी आस नहीं आ रही फोन पर आवाज़ नहीं आ रही मौत पर आज नहीं आ रही इस अफरातफरी के आलम में इस ख़ामोशी से लिपटे ग़म में नींद नहीं है, रोते हैं रात के एक बजते हैं साय साय हवा की धुन सन्नाटा और अधेड़बुन न जाने क्या होता होगा शायद वो चैन से सोता होगा बस यही सच हो और सब हो झूठ ऐ मेरे रब! तू मत रूठ इस रात की सुब्ह भी आएगी सोने की वजह भी आएगी अभी बस बेचैन हैं, जगते हैं रात के एक बजते हैं
Vibhat kumar
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कई बार एक बात बार बार भी बोलूँ , तो सुन लेना कि कहना तो ऐसा ही कुछ था, पर ज़ेहन कुछ गढ़ता नगीने सुनहरे, उस सेे पहले ही तुम सेे बात करने की ज़रूरत ने शब्दों के बाज़ार में सबके आगे हमारी ज़बान खींच ली! जैसे सरस्वती को ख़बर हो गई, कि विभात फिर से अपनी जाने जहाँ को, तुझ हमनवा को, अपनी मल्लिका को, कुछ कहने चला है, दिल पर पूरा ज़ोर देकर, और वो, आ कर मेरी ज़बान पर बैठ कर मुझ सेे बोलीं, "नहीं नहीं! यहाँ तो न दूंगी तूझे शब्दों का जादू, न करूँँगी फराहम एहसासों की ख़ुशबू, सारे ज्ञान को ढक लूंगी, जा! अब बोल के दिखा... बोल पाएगा कुछ?" और मेरे मुँह से जानाँ! यूँ नो ना आई लव यूँ ही निकला! हमेशा की मानिंद! कोई बात नहीं जो तुम्हें इस सेे अब के कुछ फी़ल न हुआ, और तुम ने जवाब में कुछ न कहा, क्लिशे ही है ये! पर इस क्लिशे की कहानी सुना दी है तुम को, और रिवाज़ के मुताबिक सौरी कहा है! तुम्हारा विभात
Vibhat kumar
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उस लड़की के माथे पे थे कुछ दाग़ बचपन के, उसे मालूम था के नहीं मालूम नहीं मुझ को, पर वो दाग़ मुझ को आए दिन हैरान करते थे, गालों के आसपास तो बचपन का मौसम था, और गालों से नीचे हवस जान देती थी, सो मुझ को याद नहीं कि तब नीचे कौन सा मौसम गुज़रता था, पर लड़की के माथे पर जो दाग़ थे , उसे बहुत आम लगते थे, प' मुझ को मालूम है इतना कि वो ही दाग़ थे जो थे, मानो सभी बुरी याद की कीलें ठोकी गई हो माथे पर, मैं उसे समझा नहीं पाया, के इनको सम्भाल कर रखना! भले मुझ को इन निशानों को छूने की अब इजाज़त नहीं, मगर जिन को भी इजाज़त दो, उसे मालूम हो जाए, के तेरा माथा ईसा के लिए, क्राॅस बनता था, के तेरे माथे को चूमने वाला आदमी ईश्वर को पूजेगा ! कि तेरे दाग़ में ही हैरत साँस लेती है, कि तेरे जिस्म में कुछ और है ही नहीं छूने को, जिस पर ग़ौर करते हम, मगर वो दाग़ बचपन के, मेरी जाँ! वही दाग़ बचपन के, तुम को सुंदर बनाते थे!!! औरों से बेहतर बनाते थे!!!
Vibhat kumar
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