उस लड़की के माथे पे थे कुछ दाग़ बचपन के, उसे मालूम था के नहीं मालूम नहीं मुझ को, पर वो दाग़ मुझ को आए दिन हैरान करते थे, गालों के आसपास तो बचपन का मौसम था, और गालों से नीचे हवस जान देती थी, सो मुझ को याद नहीं कि तब नीचे कौन सा मौसम गुज़रता था, पर लड़की के माथे पर जो दाग़ थे , उसे बहुत आम लगते थे, प' मुझ को मालूम है इतना कि वो ही दाग़ थे जो थे, मानो सभी बुरी याद की कीलें ठोकी गई हो माथे पर, मैं उसे समझा नहीं पाया, के इनको सम्भाल कर रखना! भले मुझ को इन निशानों को छूने की अब इजाज़त नहीं, मगर जिन को भी इजाज़त दो, उसे मालूम हो जाए, के तेरा माथा ईसा के लिए, क्राॅस बनता था, के तेरे माथे को चूमने वाला आदमी ईश्वर को पूजेगा ! कि तेरे दाग़ में ही हैरत साँस लेती है, कि तेरे जिस्म में कुछ और है ही नहीं छूने को, जिस पर ग़ौर करते हम, मगर वो दाग़ बचपन के, मेरी जाँ! वही दाग़ बचपन के, तुम को सुंदर बनाते थे!!! औरों से बेहतर बनाते थे!!!
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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एक बजते हैं रात के एक बजते हैं ख़ुदा का नाम रटते हैं बीमार के साँस नहीं आ रही कोई भी आस नहीं आ रही फोन पर आवाज़ नहीं आ रही मौत पर आज नहीं आ रही इस अफरातफरी के आलम में इस ख़ामोशी से लिपटे ग़म में नींद नहीं है, रोते हैं रात के एक बजते हैं साय साय हवा की धुन सन्नाटा और अधेड़बुन न जाने क्या होता होगा शायद वो चैन से सोता होगा बस यही सच हो और सब हो झूठ ऐ मेरे रब! तू मत रूठ इस रात की सुब्ह भी आएगी सोने की वजह भी आएगी अभी बस बेचैन हैं, जगते हैं रात के एक बजते हैं
Vibhat kumar
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क्या ये अंतिम वक़्त नहीं सुब्ह सुब्ह सी होती नहीं शामों में बेचैनी रहती है सिम्पटम सिम्पटम रटते हैं क्या होता है क्या नहीं होता क्या करना और क्या नहीं करना जीना कैसे और जीते रहना ये जीवन है ज़ब्त नहीं क्या ये अंतिम वक़्त नहीं पत्ते पत्ते पर है ख़तरा फूल फूल पर मौत की गंध वो क़ुदरत पर लिखने वाले आज हैं ख़ुद कमरे में बंद जो माली थे भाग गए सपने देकर जाग गए मुझ सेे क्या पूछे हो तुम मैं तेरे जैसा फ़र्द नहीं क्या ये अंतिम वक़्त नहीं किसी को हवा नहीं पहुँची किसी को दवा नहीं पहुँची किसी को दुआ नहीं पहुँची तुम कैसे हो अच्छे हो मैं अच्छा हूँ! पर कब तक शायद ये अंतिम वक़्त ही है और बड़ा सख्त भी है मैं तुम सेे इक बात कहूँ "स्मृति, मैं ने तुम सेे इश्क़ किया और कभी नहीं छोड़ा इश्क़ मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी ख़ुदा पर य़कीन कभी नहीं तुम पर य़कीन सदा ही किया शायद कभी नहीं कह पाऊँ तुम सेे तुम रहो पर मैं न रहूँ मैं रहूँ पर तुम न रहो जान! मैं ने बस एक काम सही से किया ईमानदारी ये इश्क़ किया बस इस दिन के लिए कि लौट आओ तुम नहीं आओगी मालूम है तुम मुझ अंधे की लाठी थी मेरे साथ रहने का शुक्रिया मुझे राह दिखाने का शुक्रिया
Vibhat kumar
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कई बार एक बात बार बार भी बोलूँ , तो सुन लेना कि कहना तो ऐसा ही कुछ था, पर ज़ेहन कुछ गढ़ता नगीने सुनहरे, उस सेे पहले ही तुम सेे बात करने की ज़रूरत ने शब्दों के बाज़ार में सबके आगे हमारी ज़बान खींच ली! जैसे सरस्वती को ख़बर हो गई, कि विभात फिर से अपनी जाने जहाँ को, तुझ हमनवा को, अपनी मल्लिका को, कुछ कहने चला है, दिल पर पूरा ज़ोर देकर, और वो, आ कर मेरी ज़बान पर बैठ कर मुझ सेे बोलीं, "नहीं नहीं! यहाँ तो न दूंगी तूझे शब्दों का जादू, न करूँँगी फराहम एहसासों की ख़ुशबू, सारे ज्ञान को ढक लूंगी, जा! अब बोल के दिखा... बोल पाएगा कुछ?" और मेरे मुँह से जानाँ! यूँ नो ना आई लव यूँ ही निकला! हमेशा की मानिंद! कोई बात नहीं जो तुम्हें इस सेे अब के कुछ फी़ल न हुआ, और तुम ने जवाब में कुछ न कहा, क्लिशे ही है ये! पर इस क्लिशे की कहानी सुना दी है तुम को, और रिवाज़ के मुताबिक सौरी कहा है! तुम्हारा विभात
Vibhat kumar
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दुआ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ आस हम सब साथ उठाएँ हर मज़हब के दुतकारे लोग सब तरह से नाकारे लोग हम वो काफ़िर हैं जिन को मंदिर ने घुसने नहीं दिया हम वो काफ़िर हैं जिन को मस्जिद में पनाह नहीं मिली हम वो काफ़िर हैं जिनने ख़ुदा की नफ़ी में शे'र पढ़े कभी मज़ाक़ बनाया हम ने बंदों पर तंज़ अनेक कहे अब भी हम वो काफ़िर हैं ख़ुदा जिन का है ही नहीं पर अब जब कुछ तय ही नहीं कि कब तक लोग मरेंगे अब और वो जो रोज़ी के मारे हैं बच गए तो क्या करेंगे अब आओ, मेरे काफ़िर कि तुम्हें आज हरम ने याद किया है नमाज़ों का असर नहीं दिखता दीएं जल कर राख हुए आओ हाथ उठाते हैं दुआ करते हैं माना के ख़ुदा नहीं होता दुआ करें ,आवाज़ बनें बीमारों की साँस बनें वो साइंसदाँ जो हवा बना रहे वो ड्राइवर जो बीमार उठा रहे आओ घर बैठ कर दुआ करें दुआ कि दुनिया ठीक हो जाए कोई भी शख़्स मरे नहीं अब माना कि ये भी ज़्यादा है दुनिया की साँस अब आधा है जिस के घर ये डाइन गई हर शख़्स वहाँ बिलखता है घर के घर बीमार हुए आओ काफ़िरों फिर इक बार तुम इक इक आँसू ही दे दो इन इक इक आँसू से शायद दुआ कुबूल ही हो जाए रोने की रस्म निभाई जाए ये मरती धरती बचाई जाए हर तक हवा पहुँच पाए हर तक दुआ पहुँच पाए आओ ना इक साथ उठाएँ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ
Vibhat kumar
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