nazmKuch Alfaaz

एक बजते हैं रात के एक बजते हैं ख़ुदा का नाम रटते हैं बीमार के साँस नहीं आ रही कोई भी आस नहीं आ रही फोन पर आवाज़ नहीं आ रही मौत पर आज नहीं आ रही इस अफरातफरी के आलम में इस ख़ामोशी से लिपटे ग़म में नींद नहीं है, रोते हैं रात के एक बजते हैं साय साय हवा की धुन सन्नाटा और अधेड़बुन न जाने क्या होता होगा शायद वो चैन से सोता होगा बस यही सच हो और सब हो झूठ ऐ मेरे रब! तू मत रूठ इस रात की सुब्ह भी आएगी सोने की वजह भी आएगी अभी बस बेचैन हैं, जगते हैं रात के एक बजते हैं

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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कई बार एक बात बार बार भी बोलूँ , तो सुन लेना कि कहना तो ऐसा ही कुछ था, पर ज़ेहन कुछ गढ़ता नगीने सुनहरे, उस सेे पहले ही तुम सेे बात करने की ज़रूरत ने शब्दों के बाज़ार में सबके आगे हमारी ज़बान खींच ली! जैसे सरस्वती को ख़बर हो गई, कि विभात फिर से अपनी जाने जहाँ को, तुझ हमनवा को, अपनी मल्लिका को, कुछ कहने चला है, दिल पर पूरा ज़ोर देकर, और वो, आ कर मेरी ज़बान पर बैठ कर मुझ सेे बोलीं, "नहीं नहीं! यहाँ तो न दूंगी तूझे शब्दों का जादू, न करूँँगी फराहम एहसासों की ख़ुशबू, सारे ज्ञान को ढक लूंगी, जा! अब बोल के दिखा... बोल पाएगा कुछ?" और मेरे मुँह से जानाँ! यूँ नो ना आई लव यूँ ही निकला! हमेशा की मानिंद! कोई बात नहीं जो तुम्हें इस सेे अब के कुछ फी़ल न हुआ, और तुम ने जवाब में कुछ न कहा, क्लिशे ही है ये! पर इस क्लिशे की कहानी सुना दी है तुम को, और रिवाज़ के मुताबिक सौरी कहा है! तुम्हारा विभात

Vibhat kumar

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क्या ये अंतिम वक़्त नहीं सुब्ह सुब्ह सी होती नहीं शामों में बेचैनी रहती है सिम्पटम सिम्पटम रटते हैं क्या होता है क्या नहीं होता क्या करना और क्या नहीं करना जीना कैसे और जीते रहना ये जीवन है ज़ब्त नहीं क्या ये अंतिम वक़्त नहीं पत्ते पत्ते पर है ख़तरा फूल फूल पर मौत की गंध वो क़ुदरत पर लिखने वाले आज हैं ख़ुद कमरे में बंद जो माली थे भाग गए सपने देकर जाग गए मुझ सेे क्या पूछे हो तुम मैं तेरे जैसा फ़र्द नहीं क्या ये अंतिम वक़्त नहीं किसी को हवा नहीं पहुँची किसी को दवा नहीं पहुँची किसी को दुआ नहीं पहुँची तुम कैसे हो अच्छे हो मैं अच्छा हूँ! पर कब तक शायद ये अंतिम वक़्त ही है और बड़ा सख्त भी है मैं तुम सेे इक बात कहूँ "स्मृति, मैं ने तुम सेे इश्क़ किया और कभी नहीं छोड़ा इश्क़ मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी ख़ुदा पर य़कीन कभी नहीं तुम पर य़कीन सदा ही किया शायद कभी नहीं कह पाऊँ तुम सेे तुम रहो पर मैं न रहूँ मैं रहूँ पर तुम न रहो जान! मैं ने बस एक काम सही से किया ईमानदारी ये इश्क़ किया बस इस दिन के लिए कि लौट आओ तुम नहीं आओगी मालूम है तुम मुझ अंधे की लाठी थी मेरे साथ रहने का शुक्रिया मुझे राह दिखाने का शुक्रिया

Vibhat kumar

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उस लड़की के माथे पे थे कुछ दाग़ बचपन के, उसे मालूम था के नहीं मालूम नहीं मुझ को, पर वो दाग़ मुझ को आए दिन हैरान करते थे, गालों के आसपास तो बचपन का मौसम था, और गालों से नीचे हवस जान देती थी, सो मुझ को याद नहीं कि तब नीचे कौन सा मौसम गुज़रता था, पर लड़की के माथे पर जो दाग़ थे , उसे बहुत आम लगते थे, प' मुझ को मालूम है इतना कि वो ही दाग़ थे जो थे, मानो सभी बुरी याद की कीलें ठोकी गई हो माथे पर, मैं उसे समझा नहीं पाया, के इनको सम्भाल कर रखना! भले मुझ को इन निशानों को छूने की अब इजाज़त नहीं, मगर जिन को भी इजाज़त दो, उसे मालूम हो जाए, के तेरा माथा ईसा के लिए, क्राॅस बनता था, के तेरे माथे को चूमने वाला आदमी ईश्वर को पूजेगा ! कि तेरे दाग़ में ही हैरत साँस लेती है, कि तेरे जिस्म में कुछ और है ही नहीं छूने को, जिस पर ग़ौर करते हम, मगर वो दाग़ बचपन के, मेरी जाँ! वही दाग़ बचपन के, तुम को सुंदर बनाते थे!!! औरों से बेहतर बनाते थे!!!

Vibhat kumar

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दुआ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ आस हम सब साथ उठाएँ हर मज़हब के दुतकारे लोग सब तरह से नाकारे लोग हम वो काफ़िर हैं जिन को मंदिर ने घुसने नहीं दिया हम वो काफ़िर हैं जिन को मस्जिद में पनाह नहीं मिली हम वो काफ़िर हैं जिनने ख़ुदा की नफ़ी में शे'र पढ़े कभी मज़ाक़ बनाया हम ने बंदों पर तंज़ अनेक कहे अब भी हम वो काफ़िर हैं ख़ुदा जिन का है ही नहीं पर अब जब कुछ तय ही नहीं कि कब तक लोग मरेंगे अब और वो जो रोज़ी के मारे हैं बच गए तो क्या करेंगे अब आओ, मेरे काफ़िर कि तुम्हें आज हरम ने याद किया है नमाज़ों का असर नहीं दिखता दीएं जल कर राख हुए आओ हाथ उठाते हैं दुआ करते हैं माना के ख़ुदा नहीं होता दुआ करें ,आवाज़ बनें बीमारों की साँस बनें वो साइंसदाँ जो हवा बना रहे वो ड्राइवर जो बीमार उठा रहे आओ घर बैठ कर दुआ करें दुआ कि दुनिया ठीक हो जाए कोई भी शख़्स मरे नहीं अब माना कि ये भी ज़्यादा है दुनिया की साँस अब आधा है जिस के घर ये डाइन गई हर शख़्स वहाँ बिलखता है घर के घर बीमार हुए आओ काफ़िरों फिर इक बार तुम इक इक आँसू ही दे दो इन इक इक आँसू से शायद दुआ कुबूल ही हो जाए रोने की रस्म निभाई जाए ये मरती धरती बचाई जाए हर तक हवा पहुँच पाए हर तक दुआ पहुँच पाए आओ ना इक साथ उठाएँ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ

Vibhat kumar

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