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"दुर्लभ" न छल न कपट न जिस्म न हवस न चिंता न दुविधा न मुक्ति न सुविधा दुर्लभ है ऐसे मनुष्य की खोज न इर्ष्या न द्वेष न इक रंग न भेष न करुणा न महिमा न मुक्ति न सुविधा दुर्लभ है ऐसे मनुष्य की खोज

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढांचे में लिए सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूं मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूंढ़ूं और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूं कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ ज़िंदगी क़हर के सांचों में ढलेगी कब तक कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है अवतार पयम्बर जनती है फिर भी शैतान की बेटी है ये वो बद-क़िस्मत मां है जो बेटों की सेज पे लेटी है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

Sahir Ludhianvi

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काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता तू बड़े प्यार से चाव से बड़े मान के साथ अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को और बे-ताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को मैं तिरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती तेरे होंटों की में हिद्दत से दहक सा जाता रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती मरमरीं हाथ का इक तकिया बनाया करती मैं तिरे कान से लग कर कई बातें करता तेरी ज़ुल्फ़ों को तिरे गाल को चूमा करता जब भी तू बंद-ए-क़बा खोलने लगती जानाँ अपनी आँखों को तिरे हुस्न से ख़ीरा करता मुझ को बेताब सा रखता तिरी चाहत का नशा मैं तिरी रूह के गुलशन में महकता रहता मैं तिरे जिस्म के आँगन में खनकता होता कुछ नहीं तो यही बे-नाम सा बंधन होता काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता

Wasi Shah

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