नज़्म:- मौज-ए-बेहिसी इक बार चलो हम वहाँ चलें कि वक़्त जहाँ ले चलता है अलसा कर सुब्हें उठती है सूरज मर्ज़ी से ढलता है दिन के उजाले को मेरे ख़्वाबों से कोई ऐतराज़ न हो पानी में पत्थर फेकूँ तो नदी जहाँ नाराज़ न हो इल्ज़ाम के फ़िक्रे न फेंके सब लोग मेरी ख़ामोशी पर मसअला-ए-तिजारत न सोचे सब लोग मेरी पा-बोसी पर इक बार चलो हम यूँँ भी करें नदियों को ख़ुद ही बहने दें चेहरे को ज़रा राहत दे दें और जंग-ए-दहर को चलने दें इक बार चलो हम यूँँ भी करें बादल को पानी देने दें रातों को ठण्डी होने दें नींदों के थके दरख़्तों पर अलसाए परिंदे सोने दें जो होता है वो होने दें जो होता है वो होने दें
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"सुनो शादी मुबारक हो" सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब बता भी दो कि सुनने को वो ख़ुश-ख़बरी मैं आऊँ अब किसी दिन छोड़ जाएगी तेरे बेटे को कोई जब किसी आशिक़ की माँ का दुख समझ पाए तू शायद तब इसे इंसाफ़ कहते हैं इसी से भागते हैं सब इसी को पूजता हूँ मैं इसी से काँपते हैं रब मगर तब तक मुनासिब है तड़प को बोलना करतब सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब
Anant Gupta
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पत्थरों में भी दिल होता है पत्थर भी पिघल जाते हैं पत्थरों में भी दिल होता है धूप की गर्मी से चोटिल परिंदे दरख़्तों पर आ ही जाते हैं मुद्दतों के प्यासे भटककर दरिया के पास पहुँच ही जाते हैं मोहब्बत ने जिन को बे-ज़बान बना दिया था वो भी शिकायत करने लगते हैं अक्सर ऐसा होता है पत्थर भी पिघल जाते हैं पत्थरों में भी दिल होता है
Sarul
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बारिशों बा'द बारिशों बा'द तुम्हारी धुली धुली ख़ुशबू किसी ने आज सजाया है तुम को रंगों में आसमानों में परिंदों की आवा-जाही बहुत मसरूफ़ बादलों के बा'द आसमानी रंगों में तुम एक वा'दा हो मैं ने निभाया है तुम्हें बारिशों बा'द तुम्हारी
Sarul
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नज़्म:- एक दिन देखना! देखना एक दिन ये हैरान करती दुनिया मुझे हैरानी से देखेगी, जो लिखकर छोड़ आया हूँ मैं उस की ज़िंदगी में आधा मिसरा न जाने कौन है जो अब उसे पूरा करेगा? मोहब्बत ज़िंदगी की ही रविश थी और कब सोचा गया था मोहब्बत अपनी जानिब इस परेशानी से देखेगी, देखना तुम एक दिन ये हैरान करती दुनिया मुझे हैरानी से देखेगी
Sarul
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रक़्स-ए-ग़मगीं सोचते सोचते ही रात हुई जाती है। अँधेरा बढ़ता ही जाता है और मैं ख़ाली हाथ ख़ाली रस्तों पे नई तान लिए आता हूँ । शुक्र है शाम को तंगहाली में भी ख़ुद को इंसान लिए आता हूँ। उफ़क़ के पार सवेरा है या नया दिन है, तुम्हारा साथ रहे गर तो ये भी मुमकिन है। किसी ने मोड़ का दीपक बुझा दिया है क्या? मैं ने घर जाने का रस्ता भुला दिया है क्या? जाम था में जुनूँ में चलता हूँ फिर वही बात हुई जाती है सोचते सोचते ही रात हुई जाती है।
Sarul
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हाल-ए-गुलशन सायों से पूछते चलें गुलशन का हालचाल कैसा रहा चमन, कैसी रही बहार? कैसा रहा निशात के ख़्वाबों का कारोबार? कैसी रही ज़मीन, कैसा था आसमान? जो था नहीं क्या याद वो आया था बार बार? दिल टूटते रहे क्या, या सब भला सा था? वो मिल सके क्या जिन में कोई मसअला सा था टूटी दिलों की बर्फ़ या ख़ामोशियाँ रहीं? सर्दियों के बीच क्या कुछ गरमियाँ रहीं? कितने गुलों के जिस्म अब के चाक हो गए हालात ठीक हैं या खौफ़नाक हो गए? कैसे रहे ये दिन? कैसा रहा ये साल? सायों से पूछते चलें गुलशन का हालचाल
Sarul
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