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हाल-ए-गुलशन सायों से पूछते चलें गुलशन का हालचाल कैसा रहा चमन, कैसी रही बहार? कैसा रहा निशात के ख़्वाबों का कारोबार? कैसी रही ज़मीन, कैसा था आसमान? जो था नहीं क्या याद वो आया था बार बार? दिल टूटते रहे क्या, या सब भला सा था? वो मिल सके क्या जिन में कोई मसअला सा था टूटी दिलों की बर्फ़ या ख़ामोशियाँ रहीं? सर्दियों के बीच क्या कुछ गरमियाँ रहीं? कितने गुलों के जिस्म अब के चाक हो गए हालात ठीक हैं या खौफ़नाक हो गए? कैसे रहे ये दिन? कैसा रहा ये साल? सायों से पूछते चलें गुलशन का हालचाल

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"अगर तुम न होती" अगर तुम न होती वबा के दिनों में तो मुझे कौन कहता है कि काढ़ा बना लो सुनो कुछ दिनों को मेरी बात मानो और ठंडी चीज़ों से ख़ुद को बचा लो बर्फ़ का ठंडा पानी जो मुँह से लगाता बताओ मुझे कौन नख़रे दिखाता भला कौन कहता है मुझे तुम सेे कोई बात करनी नहीं है जो मर्ज़ी में आए करो तुम मरो तुम मुझे मार डालो करो ख़ूब मन की अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता सुनो तुम सुनो ना मेरी जान सुन लो न रूठो तुम मुझ सेे चलो मान जाओ हमारे लिए ही तो बाग़-ए-बहिश्त से आदम और हव्वा निकाले गए हैं कभी हम मिलेंगे कभी हम बनेंगे हम इक दूजे के हाथों में हाथों को देकर इक मंज़िल चुनेंगे, उसी पर चलेंगे अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता हूँ तुम्हारी ये गहरी अंटलाटिक सी आँखों में कई टाइटैनिक दफ़न हो रहे हैं सँभालो इन्हें तुम बचा लो इन्हें तुम मुझे डूबने दो, मैं एंटिक बनूँगा अगर तुम न होती तो नज़्में ये ग़ज़लें किसे मैं सुनाता भला कौन कहता सताओ ना मुझ को रुलाओ ना मुझ को मेरी वहशतों से बचा लो ना मुझ को सुनो ना गले से लगा लो मुझ को

Anand Raj Singh

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" गुलज़ार साहब के नाम" आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन बचपन में ही जुदा हुए थे वो अपने घर वालों से दिल में उन्होंने क्या बतलाऊँ दर्द हज़ारों पाले थे फिर भी उन के जीने के सब अंदाज़ निराले थे हाल सुनाया है बस मैं ने लफ़्ज़ों में गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन घर से निकले जीते रहे ऐसे ही तन्हाई में भूखे प्यासे चलते रहे धूप कड़ी पुरवाई में ख़ून-पसीना एक किया जीवन की गहराई में ऐसे हासिल थोड़ी हुआ नाम उन्हें गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन माँ का लाड़ मिला उन को न ही पिता का प्यार मिला समझा पराया अपनों ने ऐसा उन्हें घर द्वार मिला तुम क्या जानो जीवन में उन को क्या किरदार मिला हँस के निभाया हर रिश्ता जीवन के किरदार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन गीतों का गुलशन चमका क़लमों की हरियाली से झूम उठी थी शहनाई उन के सुरों की लाली से उन की क़लम के चर्चे तुम सुन लो हर दिलवाले से राज़ रहेगा दुनिया की क़लमों पे गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन सुख में दुख में साथ दिया अपनाया था राखी को जग में फिर मशहूर किया कितनों की आवाज़ों को ढूँढ़ रहा हूँ महफ़िल में आज उन के अफ़साने को हर फ़नकार पे कर्म हुआ राखी के गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन

Prashant Kumar

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जाने किस की तलाश उन की आँखों में थी आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे जितना भी वो चले इतने ही बिछ गए राह में फ़ासले ख़्वाब मंज़िल थे और मंज़िलें ख़्वाब थीं रास्तों से निकलते रहे रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे जिन पे सब चलते हैं ऐसे सब रास्ते छोड़ के एक अंजान पगडंडी की उँगली था में हुए इक सितारे से उम्मीद बाँधे हुए सम्त की हर गुमाँ को यक़ीं मान के अपने दिल से कोई धोका खाते हुए जान के सहरा सहरा समुंदर को वो ढूँडते कुछ सराबों की जानिब रहे गामज़न यूँँ नहीं था कि उन को ख़बर ही न थी ये समुंदर नहीं लेकिन उन को कहीं शायद एहसास था ये फ़रेब उन को महव-ए-सफ़र रक्खेगा ये सबब था कि था और कोई सबब जो लिए उन को फिरता रहा मंज़िलों मंज़िलों रास्ते रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे अक्सर ऐसा हुआ शहर-दर-शहर और बस्ती बस्ती किसी भी दरीचे में कोई चराग़-ए-मोहब्बत न था बे-रुख़ी से भरी सारी गलियों में सारे मकानों के दरवाज़े यूँँ बंद थे जैसे इक सर्द ख़ामोश लहजे में वो कह रहे हों मुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कन कहीं और होगा यहाँ तो नहीं है यही एक मंज़र समेटे थे शहरों के पथरीले सब रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे और कभी यूँँ हुआ आरज़ू के मुसाफ़िर थे जलती सुलगती हुई धूप में कुछ दरख़्तों ने साए बिछाए मगर उन को ऐसा लगा साए में जो सुकून और आराम है मंज़िलों तक पहुँचने न देगा उन्हें और यूँँ भी हुआ महकी कलियों ने ख़ुशबू के पैग़ाम भेजे उन्हें उन को ऐसा लगा चंद कलियों पे कैसे क़नाअ'त करें उन को तो ढूँढ़ना है वो गुलशन कि जिस को किसी ने अभी तक है देखा नहीं जाने क्यूँँ था उन्हें इस का पूरा यक़ीं देर हो या सवेर उन को लेकिन कहीं ऐसे गुलशन के मिल जाएँगे रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे धूप ढलने लगी बस ज़रा देर में रात हो जाएगी आरज़ू के मुसाफ़िर जो हैं उन के क़दमों तले जो भी इक राह है वो भी शायद अँधेरे में खो जाएगी आरज़ू के मुसाफ़िर भी अपने थके-हारे बे-जान पैरों पे कुछ देर तक लड़खड़ाएँगे और गिर के सो जाएँगे सिर्फ़ सन्नाटा सोचेगा ये रात भर मंज़िलें तो उन्हें जाने कितनी मिलीं ये मगर मंज़िलों को समझते रहे जाने क्यूँँ रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे और फिर इक सवेरे की उजली किरन तीरगी चीर के जगमगा देगी जब अन-गिनत रहगुज़ारों पे बिखरे हुए उन के नक़्श-ए-क़दम आफ़ियत-गाहों में रहने वाले ये हैरत से मजबूर हो के कहेंगे ये नक़्श-ए-क़दम सिर्फ़ नक़्श-ए-क़दम ही नहीं ये तो दरयाफ़्त हैं ये तो ईजाद हैं ये तो अफ़्कार हैं ये तो अश'आर हैं ये कोई रक़्स हैं ये कोई राग हैं इन से ही तो हैं आरास्ता सारी तहज़ीब ओ तारीख़ के वक़्त के ज़िंदगी के सभी रास्ते वो मुसाफ़िर मगर जानते-बूझते भी रहे बे-ख़बर जिस को छू लें क़दम वो तो बस राह थी उन की मंज़िल दिगर थी अलग चाह थी जो नहीं मिल सके उस की थी आरज़ू जो नहीं है कहीं उस की थी जुस्तुजू शायद इस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे

Javed Akhtar

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एक साल ओ मेरे दिल के टुकड़े मेरी बहना मेरी बेटी मेरे बच्चे आज एक साल हो गया तुम्हें बाशिंदा ए अदम-आबाद हुए मेरी छोटी-सी दुनिया को बर्बाद हुए जैसे ये ख़ुशबू धूप अब्र-ओ-बाद हुए तुम्हें आज़ाद हुए मुझे शब-ज़ाद हुए तुम सेे कोई विवाद हुए मुझे ना-मुराद हुए इस दिल को ना शाद हुए तुम्हें महज़ एक याद हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुक़द्दर को बिगड़े हुए मुझे तुम सेे बिछड़े हुए इस घर को उजड़े हुए इस दिल के टुकड़े हुए बैठा रहता हूँ मैं तेरी तस्वीर को पकड़े हुए बैठी है तेरी याद दिल में दिल को जकड़े हुए तेरे मेरे झगड़े हुए और मुझे तुझ पे अकड़े हुए अभागे बाप के मुखड़े से एक आँख को लिकड़े हुए अभागे भाई के कांधे से एक बाज़ू को उखड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया ख़ुशियों को घर छोड़े हुए ख़ुदा को मुक़द्दर फोड़े हुए घर की तरफ़ सैलाब को मोड़े हुए मेरी नींद को छीने ख़्वाब को तोड़े हुए डाॅक्टर के पैरो में लौटे हुए हाथों को जोड़े हुए तुझ को ये दुनिया छोड़े हुए मुझे दुनिया से सब नाते तोड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया घर में उदासी को छाए हुए इन होंटों पर हॅंसी को आए हुए पिताजी को क़िस्से सुनाए हुए बगिया में फूलों को आए हुए ऑंगन में सन्नाटा छाए हुए पीठ पर तेरा चाटा खाए हुए मुझ को गाना गाए हुए जी से कोई खाना खाए हुए दिल को पत्थर करे हुए याद में तेरी आँसू बहाए हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुझे कुछ लिखे हुए तुझे कहीं दिखे हुए मुझे चैन से सोए हुए तेरी याद में खोए हुए तेरी आवाज़ सुने हुए तेरे साथ तारों को गिने हुए तुझे मुझ सेे छीने हुए आज बारह महीने हुए ख़ुश रंग ख़्वाबों को किसी नज़र की आग में जले हुए हमारे आशियाँ के सूरज को ढले हुए जिन में मिस्मार हो गई झोपड़ी अपनी उन ऑंधियों को चले हुए इन आँखों और रुख़सारों को गिले हुए मुझे तुझ से मिले हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया भरने थे जो ज़ख़्म जिगर के वक़्त के साथ सिर्फ़ गहरे हुए हैं हम समुंदर में डूबी उस कश्ती की राह में आज भी किनारे पर ठहरे हुए हैं हर किसी ने शुरू में कहा था “ह में भी दर्द बस शुरू में रहा था” अभी यक़ीन नहीं होगा दिल भी ग़मगीन नहीं होगा एक वक़्त पर जा चुका है दिल मान जाता है एक वक़्त के बा'द हर दर्द दवा बन जाता है मगर न जाने क्यूँ ये दर्द तो बढ़ता जाता है मुझे सुकून नहीं मिल पाता है कैसी ज़ुल्मत बढ़ती जाती है मेरी हिम्मत टूटती जाती है जब लौट के तुम नहीं आती हो ये दीवाली क्यूँ आ जाती है मुझ को ये मालूम भी है लौट के नहीं कभी आते हैं अब तुम जिस जहाँ में रहती हो पर तुम कब जहाँ में रहती हो तुम तो आब ओ हवा में बहती हो ये तेरा भैया तेरे पापा तेरी मैया ये चंदा तारे जुगनू दीपक फूल ओ कलियाँ ये सूनी गलियाँ और हम सब तुझ को खोजते रहते हैं हम सब तुझ को सोचते रहते हैं सब सेे कहते रहते हैं यहीं है वो कहीं नहीं गई है वो मेरे दिल में रहती है वो मुझ सेे मिलती रहती है ख़्वाबों में वीरान दिल के उजड़े गुलशन में मेरे तन में मेरे मन में इस चमन में होली के रंगों में पिचकारी में गुब्बारों में दिवाली की फुलझड़ियो में चकरी में अनारों में रंगोली के रंगों में दिए में लड़ियों में खिड़की पर बैठी गिलहरी में चिड़ियों में नौ रातों की नौ देवियों में जिमती है पहले आरती करती थी अब कराती है मुझ को बेहद रुलाती है मुझे भैया कह के बुलाती है छत की कड़ी में दीवार की घड़ी में हर पल टक-टक करती है मेरे भीतर मेरे दिल के ऑंगन में खेल खेलती वो हर पल बक-बक करती है ठंडी रात के घोर सन्नाटे में वो मेरी ग़ज़लें गाती है आज खुल्द में क्या-क्या हुआ रात को आके बताती है मैं गले लगाने को उठता हूँ आँख खुलती है गुम हो जाती है ऐसा होते हुए मुझ को रोते हुए एक साल हो गया

Chhayank Tyagi

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"दस्तान-ए-इश्क़" है ज़िन्दगी का अहम ये क़िस्सा जो यारों तुम को बता रहे हैं गए थे कालेज जो हम पे गुज़री वो दास्ताँ हम सुना रहे हैं कभी वो नज़रें मिला रहे हैं कभी वो नज़रें झुका रहे हैं है हम सेे उन को बहुत मोहब्बत मगर वो दिल में छुपा रहे हैं कभी गले से वो लग रहे हैं कभी गले से लगा रहे हैं अजीब शय है मियाँ मोहब्बत झगड़ रहे हैं मना रहे हैं गए जो कालेज को पहले दिन हम दिखी वहाँ हम को एक लड़की पड़ी निगाहें हमारी उस पर उसे ही बस देखे जा रहे हैं जब हम ने कालेज में उस को देखा लगा के जैसे कोई परी हो ये ही सबब है हम उस परी को भुला जो इक पल न पा रहे हैं हम उन सेे कहते हैं इश्क़ कर लो वो ज़ाया' कहती हैं और फिर हम ये है इबादत ये है इबादत मुसलसल उन को बता रहे हैं सुकून आता नहीं हैं दिल को बग़ैर दीदार उस का कर के सो उस की तस्वीर हम बना कर सहन में दिल लगा रहे हैं वो लड़की धड़कन हैं मेरे दिल की हँसी है मुर्शिद मेरे लबों की बसा के सीने में उस को अपने लबों के ऊपर सजा रहे हैं हाँ सब सेे ज़्यादा हसीं है नाज़ुक है अपनी सारी सहेलियों में वो लड़की जिस की ये बातें तुम को ग़ज़ल के ज़रिए बता रहे हैं वो देखो उस की अदाएँ सारी जुदा हैं अपनी सहेलियों से हम अपने यारों को उस की जानिब इशारा कर के दिखा रहे हैं सभी के लब पर है नाम उस का सभी के दिल में है उस का चेहरा सब अपनी आँखों में देखो यारों उसी के सपने सजा रहे हैं मेरे इलाही ऐ मेरे मालिक जवान लड़कों की ख़ैर रखना फ़ज़ा में अपनी वो आज ज़ुल्फ़ों को खोलकर के हिला रहे हैं किताब ख़ाने से और किताबों से सब सेे ज़्यादा है उस को उल्फ़त क्यूँँ नौजवाँ ये बिना वजह में गुलाब गुलशन से ला रहे हैं अजीब मंज़र है जिस जगह पे भी अपने क़दमों को रख रही है वो चूमने को जगह फ़रिश्ते फ़लक से तशरीफ़ ला रहे हैं है चेहरा जैसे गुलाब कोई हैं लब के जैसे दो तितलियाँ हो वो दे के जुंबिश लबों को अपने चमन की ज़ीनत बढ़ा रहे हैं हैं ज़ुल्फ़े काली घटा के जैसी हैं आँखें उस में चमकते जुगनू अँधेरे ज़ुल्फ़ों से छाएँ गर तो अंधेरे जुगनू मिटा रहे है वो ज़ुल्फें नागिन सी अपनी ला कर हमारी गोदी में रख रही है फिर अपने दस्त-ए-अदब से मुर्शिद हम उस की ज़ुल्फ़ें बना रहे हैं ऐ शाहज़ादी हमारी मानो रिदास चेहरे को अपने ढांपो हसीं लगेगा तुम्हारा चेहरा सबक़ ये उस को पढ़ा रहे हैं चिड़ा रही हैं तमाम सखियाँ उसे उधर मेरी जान कह कर और इस तरफ़ यार-ए-जानी मुझ को सब उस का कह कर चिड़ा रहे हैं ये हुस्न वाले जो ख़ुद पे नाज़ाँ हैं कोई जा कर इन्हें बताओ ये हुस्न सारा बरा-ए-सदक़ा उसी हसीना से पा रहे हैं सुख़न-वरों के मुसव्विरों के ज़ेहन को जाने ये क्या हुआ है सब उस के बारे में लिख रहे हैं सब उस का चेहरा बना रहे हैं मलाल बिल्कुल नहीं हैं मुझ को वो चाहती है किसी को बशर को मलाल ये है मेरे सिवाए सब उस को कालेज में भा रहे हैं अगर मौहब्बत नहीं हैं उन को तो फिर हमें ये बताओ यारों वो इतनी शिद्दत के साथ हम को पलट के क्यूँँ देखे जा रहे हैं उदास रहने लगी है तब से ये बात उस ने सुनी है जब से कि छोड़कर इस बरस ये कालेज पलट के हम घर को जा रहे हैं वो रो रही है बिलख बिलखकर ये कह रही है ना जाओ वापस पलट के आएँगे तुम से मिलने ये कह के उस को चुपा रहे हैं मुसल्ला घर में बिछा के अपने दुआएँ कुछ कर रही है रब से लबों पे उस के है नाम मेरा और अश्क आँखों में आ रहे हैं ये मिलना मिल कर के फिर बिछड़ना है ये ही दस्तूर आशिक़ी का बता बता के ये बात उस को हम उस के दिल को बढ़ा रहे हैं क़रार आ जाए उस के दिल को ज़रा सा शायद ये क़िस्सा सुन कर फ़रहाद-ओ-शीरीं के हिज्र का हम उसे यूँँ क़िस्सा सुना रहे हैं जो हम सेे कहते थे मुस्कुरा कर तुम्हें भुला देगें हम क़सम से वो रोज़ रातों को चुपके चुपके मलाल आँसू बहा रहे हैं ग़ुरूर थी वो मेरा मैं उस का था यूँँ हमारा अनोख़ा रिश्ता हाँ लैला मजनू के जैसे हम भी ज़माना था के पिया रहे हैं वो एक हिस्सा है मेरे दिल का ख़ुदा तू उस का ख़याल रखना दुआ ये करने हम उस के हक़ में ख़ुदा के घर रोज़ जा रहे हैं जहाँ पे आती थी शाम को तू बिताने झूले पे वक़्त अपना तेरे तसव्वुर में आज भी हम वो ख़ाली झूला झुला रहे हैं मैं मुंतज़िर हूँ कब आएगी वो कब उस का वादा-ए-दीद होगा बिछा के राहों में उस की नज़रें समय को अपने बिता रहे हैं वो शाहज़ादी है महलक़ा है शजर की माँगी हुई दुआ है ख़ुदा उसे उस के हक़ में लिख दे दुआ ये लब पर सजा रहे हैं वो उस का कॉलेज को रोज़ आना वो उस का ज़ुल्फों को लहलहाना शजर वो कॉलेज के सारे मंज़र हमारी आँखों में आ रहे हैं ग़ज़ल लिखी है जो मैं ने तुम पर मता-ए-जाँ मेरी उस ग़ज़ल को परिंद दरिया शजर समुंदर सब अपने लहजे में गा रहे हैं

Shajar Abbas

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पत्थरों में भी दिल होता है पत्थर भी पिघल जाते हैं पत्थरों में भी दिल होता है धूप की गर्मी से चोटिल परिंदे दरख़्तों पर आ ही जाते हैं मुद्दतों के प्यासे भटककर दरिया के पास पहुँच ही जाते हैं मोहब्बत ने जिन को बे-ज़बान बना दिया था वो भी शिकायत करने लगते हैं अक्सर ऐसा होता है पत्थर भी पिघल जाते हैं पत्थरों में भी दिल होता है

Sarul

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नज़्म:- मौज-ए-बेहिसी इक बार चलो हम वहाँ चलें कि वक़्त जहाँ ले चलता है अलसा कर सुब्हें उठती है सूरज मर्ज़ी से ढलता है दिन के उजाले को मेरे ख़्वाबों से कोई ऐतराज़ न हो पानी में पत्थर फेकूँ तो नदी जहाँ नाराज़ न हो इल्ज़ाम के फ़िक्रे न फेंके सब लोग मेरी ख़ामोशी पर मसअला-ए-तिजारत न सोचे सब लोग मेरी पा-बोसी पर इक बार चलो हम यूँँ भी करें नदियों को ख़ुद ही बहने दें चेहरे को ज़रा राहत दे दें और जंग-ए-दहर को चलने दें इक बार चलो हम यूँँ भी करें बादल को पानी देने दें रातों को ठण्डी होने दें नींदों के थके दरख़्तों पर अलसाए परिंदे सोने दें जो होता है वो होने दें जो होता है वो होने दें

Sarul

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नज़्म:- एक दिन देखना! देखना एक दिन ये हैरान करती दुनिया मुझे हैरानी से देखेगी, जो लिखकर छोड़ आया हूँ मैं उस की ज़िंदगी में आधा मिसरा न जाने कौन है जो अब उसे पूरा करेगा? मोहब्बत ज़िंदगी की ही रविश थी और कब सोचा गया था मोहब्बत अपनी जानिब इस परेशानी से देखेगी, देखना तुम एक दिन ये हैरान करती दुनिया मुझे हैरानी से देखेगी

Sarul

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रक़्स-ए-ग़मगीं सोचते सोचते ही रात हुई जाती है। अँधेरा बढ़ता ही जाता है और मैं ख़ाली हाथ ख़ाली रस्तों पे नई तान लिए आता हूँ । शुक्र है शाम को तंगहाली में भी ख़ुद को इंसान लिए आता हूँ। उफ़क़ के पार सवेरा है या नया दिन है, तुम्हारा साथ रहे गर तो ये भी मुमकिन है। किसी ने मोड़ का दीपक बुझा दिया है क्या? मैं ने घर जाने का रस्ता भुला दिया है क्या? जाम था में जुनूँ में चलता हूँ फिर वही बात हुई जाती है सोचते सोचते ही रात हुई जाती है।

Sarul

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बारिशों बा'द बारिशों बा'द तुम्हारी धुली धुली ख़ुशबू किसी ने आज सजाया है तुम को रंगों में आसमानों में परिंदों की आवा-जाही बहुत मसरूफ़ बादलों के बा'द आसमानी रंगों में तुम एक वा'दा हो मैं ने निभाया है तुम्हें बारिशों बा'द तुम्हारी

Sarul

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