एक साल ओ मेरे दिल के टुकड़े मेरी बहना मेरी बेटी मेरे बच्चे आज एक साल हो गया तुम्हें बाशिंदा ए अदम-आबाद हुए मेरी छोटी-सी दुनिया को बर्बाद हुए जैसे ये ख़ुशबू धूप अब्र-ओ-बाद हुए तुम्हें आज़ाद हुए मुझे शब-ज़ाद हुए तुम सेे कोई विवाद हुए मुझे ना-मुराद हुए इस दिल को ना शाद हुए तुम्हें महज़ एक याद हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुक़द्दर को बिगड़े हुए मुझे तुम सेे बिछड़े हुए इस घर को उजड़े हुए इस दिल के टुकड़े हुए बैठा रहता हूँ मैं तेरी तस्वीर को पकड़े हुए बैठी है तेरी याद दिल में दिल को जकड़े हुए तेरे मेरे झगड़े हुए और मुझे तुझ पे अकड़े हुए अभागे बाप के मुखड़े से एक आँख को लिकड़े हुए अभागे भाई के कांधे से एक बाज़ू को उखड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया ख़ुशियों को घर छोड़े हुए ख़ुदा को मुक़द्दर फोड़े हुए घर की तरफ़ सैलाब को मोड़े हुए मेरी नींद को छीने ख़्वाब को तोड़े हुए डाॅक्टर के पैरो में लौटे हुए हाथों को जोड़े हुए तुझ को ये दुनिया छोड़े हुए मुझे दुनिया से सब नाते तोड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया घर में उदासी को छाए हुए इन होंटों पर हॅंसी को आए हुए पिताजी को क़िस्से सुनाए हुए बगिया में फूलों को आए हुए ऑंगन में सन्नाटा छाए हुए पीठ पर तेरा चाटा खाए हुए मुझ को गाना गाए हुए जी से कोई खाना खाए हुए दिल को पत्थर करे हुए याद में तेरी आँसू बहाए हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुझे कुछ लिखे हुए तुझे कहीं दिखे हुए मुझे चैन से सोए हुए तेरी याद में खोए हुए तेरी आवाज़ सुने हुए तेरे साथ तारों को गिने हुए तुझे मुझ सेे छीने हुए आज बारह महीने हुए ख़ुश रंग ख़्वाबों को किसी नज़र की आग में जले हुए हमारे आशियाँ के सूरज को ढले हुए जिन में मिस्मार हो गई झोपड़ी अपनी उन ऑंधियों को चले हुए इन आँखों और रुख़सारों को गिले हुए मुझे तुझ से मिले हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया भरने थे जो ज़ख़्म जिगर के वक़्त के साथ सिर्फ़ गहरे हुए हैं हम समुंदर में डूबी उस कश्ती की राह में आज भी किनारे पर ठहरे हुए हैं हर किसी ने शुरू में कहा था “ह में भी दर्द बस शुरू में रहा था” अभी यक़ीन नहीं होगा दिल भी ग़मगीन नहीं होगा एक वक़्त पर जा चुका है दिल मान जाता है एक वक़्त के बा'द हर दर्द दवा बन जाता है मगर न जाने क्यूँ ये दर्द तो बढ़ता जाता है मुझे सुकून नहीं मिल पाता है कैसी ज़ुल्मत बढ़ती जाती है मेरी हिम्मत टूटती जाती है जब लौट के तुम नहीं आती हो ये दीवाली क्यूँ आ जाती है मुझ को ये मालूम भी है लौट के नहीं कभी आते हैं अब तुम जिस जहाँ में रहती हो पर तुम कब जहाँ में रहती हो तुम तो आब ओ हवा में बहती हो ये तेरा भैया तेरे पापा तेरी मैया ये चंदा तारे जुगनू दीपक फूल ओ कलियाँ ये सूनी गलियाँ और हम सब तुझ को खोजते रहते हैं हम सब तुझ को सोचते रहते हैं सब सेे कहते रहते हैं यहीं है वो कहीं नहीं गई है वो मेरे दिल में रहती है वो मुझ सेे मिलती रहती है ख़्वाबों में वीरान दिल के उजड़े गुलशन में मेरे तन में मेरे मन में इस चमन में होली के रंगों में पिचकारी में गुब्बारों में दिवाली की फुलझड़ियो में चकरी में अनारों में रंगोली के रंगों में दिए में लड़ियों में खिड़की पर बैठी गिलहरी में चिड़ियों में नौ रातों की नौ देवियों में जिमती है पहले आरती करती थी अब कराती है मुझ को बेहद रुलाती है मुझे भैया कह के बुलाती है छत की कड़ी में दीवार की घड़ी में हर पल टक-टक करती है मेरे भीतर मेरे दिल के ऑंगन में खेल खेलती वो हर पल बक-बक करती है ठंडी रात के घोर सन्नाटे में वो मेरी ग़ज़लें गाती है आज खुल्द में क्या-क्या हुआ रात को आके बताती है मैं गले लगाने को उठता हूँ आँख खुलती है गुम हो जाती है ऐसा होते हुए मुझ को रोते हुए एक साल हो गया
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"बंजारा" मैं हूँ बस एक बंजारा कभी इस दिल कभी उस दिल कभी ख़ामिल कभी शामिल कभी पुर-दिल कभी बुजदिल कभी कजदिल कभी ख़ुशदिल कभी दिलबर कभी क़ातिल कभी ग़ाफ़िल कभी यकतिल कभी सागर कभी साहिल ग़ुबार-ए-दिल फ़राग़-ए-दिल ये राज़-ए-दिल वो ख़ून-ए-दिल मेरा वो इश्क़ दाग़-ए-दिल है दूद-ए-दिल मज़ाक़-ए-दिल वो इक सूरत मुराद ए दिल नहीं है इश्क़ बे-हासिल मैं गिल-दर-गिल मैं नाक़ाबिल सर-ए-महफ़िल बजाए दिल कहीं भी जा रहा हूँ बस नहीं मालूम मुझ को क्यूँ मैं बंजारा ही तो हूँ इक कभी आँखों में हाथों में ठिठुरती ठंडी रातों में किसी दिन के उजाले में कलेजे के किसी छाले स बहते उस लहू में तो किसी आरिज़ पे आई उन गुलाबी सी लकीरों में गुदाज़ ओ नर्म बाँहों में फ़िराक़-ए-ग़म की आहों में कसक जो है उसे गाता फिर किसी बैतुल-ग़ज़ल से मैं ख़ुशी के ग़म को लिखता और कहानी को सुनाता मैं किसी दिल दर पड़ा फिर इक दफ़ा उस लड़की को आवाज़ लगा कर इंतिज़ार-ए-मौत में पागल राह देखता या तो मर जाऊँगा या फिर मुझे वो दिख ही जाएगी तेरे मरने पे वो 'त्यागी' अगर तब भी नहीं आई तो क्या कुछ भी नहीं मैं तो मैं तो वैसे भी बंजारा मैं मिल जाऊँगा गाता हुआ रोता हुआ पागल कभी इस दर कभी उस दर कभी इस घर कभी उस घर कभी तारों नजारों में बहारों या अदाकारों फ़लक के हतमी तह पर या हथेली की लकीरों में नहीं तो ख़ामोश तस्वीरों में ग़ज़ल में नज़्म में आँसू में महफ़िल और ख़ामोशी में कहीं तो कभी तो मैं मिल जाऊँगा लेकिन रहे ये याद बंजारे हमेशा से न थे ऐसे कभी ये भी किसी के दिल में बसते थे हँसते थे मगर इक बे-वफ़ाई ने कलेजा ख़ैर छोड़ो भी अधूरी नज़्म लिखना तो मेरी आदत है अधूरा छूटा इक उम्मीद सी देता है मुझे कभी आ कर अधूरे को मुकम्मल करने की सो इस लिए छोड़ देता हूँ अधूरा इस को भी वही बंजारा तुम्हारा
Chhayank Tyagi
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"गुज़िश्ता" पिछले कुछ बरस की यादें पिछली कुछ रातों से मेरे ज़ेहन में सर पटक रही हैं ये मेरी साँसें जो मेरी इक़तिज़ा-ए-वजूद हैं फिर भी मेरी आँखों को खटक रही हैं तेरी उन तंग गलियों और उन छतों पर धूल चढ़ी किताबों और उन खतों पर उस गुलज़ार-ए-रिज़वा के फूलों की उदास ख़ुशबू में पेड़ों की चुभती छाँव में शहर के कैफ़े में और मेरे उस छोटे से गाँव में तितलियों की ढलती रा'नाई में कोयलों की बुझती गिनाई में उन मजलूमों की रंजीदा एहतिमाम-ए-रा'नाई में तेरी हथेलियों पर लगी किसी और के नाम की हीनाई में तेरी चौखट पर तेरी खिड़की पे मेरी आँखों में तुम्हारी सिड़की ने मेरी तवक़्क़ो' को तोड़ दिया है तू ने मुझ को छोड़ दिया है मेरे आज़ुर्दा ख़्वाब बिखर चुके हैं भीतर ही भीतर मर चुके हैं बेहतर की तलाश में ख़ुशतर दिन गुज़र चुके हैं तेरे वस्ल में दुनिया को दर-गुज़र चुके हैं तेरी ग़ैर-मौजूदगी और ये मेरी बे-तकान अफ़ज़ाइश-ए-मोहब्बत तेरे लिए दम तोड़ती हुई उम्मीद-ए-दीदार तेरा सरकता हुआ इश्क़ और ये रक़ीब से क़रार-दाद-ए-इज़दिवाज सब मिल कर मुझे ख़ुद–कुशी के लिए तस्ख़ीर कर चुके हैं क्लास की उस बेंच पर डाइरी के पन्नों में ग़ज़ल-ओ-नज़्म के मानी में ख़ुश्क होंठों पर आँखों के पानी में जो याद-ए-गुज़िश्ता क़ैद थी अब मेरे भीतर भटक रही है वो एक बात जो कहनी है मेरे गले में अटक रही है क्या ये सच है तू भी उसे चाहने लगी है–झूठ कल तक तो तेरे पास मेरी माँ की कटक रही है और क्यूँ मेरी दी हुई लाकेट तेरे गले में लटक रही है मैं कैसे क्या ही कर लूँगा अगर तू ही हटक रही है पिछले कुछ बरस की यादें पिछली कुछ रातों से मेरे ज़ेहन में सर पटक रही हैं ये मेरी साँसें जो मेरी इक़तिज़ा-ए-वजूद हैं फिर भी मेरी आँखों को खटक रही हैं ये आख़िरी ख़त था जो मैं ने उसे भेजा था वो आख़िरी रात थी जब मैं ने उसे देखा था उस ने हर बार की तरह क़ाबिल-ए-तर्जीह नहीं समझा उस ने हर बार की तरह मेरे क़रीह को क़रीह नहीं समझा मैं तो पागल हूँ इश्क़ मेरा मौला तड़प मेरी तक़दीर हिज्र मेरा मुक़द्दर उदास शा में तन्हा रातें भीगी सुब्ह कसक ख़लिश टीस दिल की ज़रूरत समझी सो फ़रेब बे-वफ़ाई हरजाई-पन बद-'अहदी बक्शी शा'इरी भी की मैं ने तो उस ने उसे मदीह नहीं समझा मोहब्बत को ख़ुदा कहा मा'शूक़ को फ़क़ीह नहीं समझा काज़िबा को मसीह समझा उस की बाहों को बाम-ए-मसीह समझा उस ने हज्व-ए-मलीह की मेरे मलीह रंग पर नक़ीह थे तो नक़ीह समझा मुझे क़ाबिल-ए-तम्दीह नहीं समझा मैं ने हमेशा दस्त-गिरी की उस की जिस ने मुझे कभी नहीं समझा उस ने जितनी हो सकी बदनामी की इश्क़ में अना कुचली मैं ने कभी ख़ुद को फ़ज़ीह नहीं समझा पढ़ते पढ़ते ही लिखने का फ़न आ गया मैं ने कोई तरशीह नहीं समझा उस ने तेरे साथ क्या किया है–समझता है मोहब्बत शायद बे-वफ़ाई नहीं और सोच पता नहीं और तो या'नी तू नहीं समझा– जी कुछ नहीं समझा तू ने उसे क्या समझा– जी बहुत कुछ समझा उस ने तुझे क्या समझा– जी कुछ नहीं समझा अब तो समझे– जी कुछ नहीं समझा ये सब कहा था मेरे यारों ने उस रात लगा था ये रात नहीं गुज़रेगी फिर वो रात गुज़र गई सारी ख़्वाब-ओ-ख़्वाहिश एक साथ बिखर गई वो बियाह कर के एक अफ़सर के साथ रोई तो मगर गई बे-वफ़ाई थी या वो मजबूर थी जो भी था मुझ सेे बिछड़ के उस के अंदर एक लड़की मर गई मुझ सेे कहती थी डरते क्यूँ हो मैं तेरे साथ हूँ फिर वक़्त आने पर वो लड़की ही डर गई उस सेे बिछड़ के मैं टूट गया वो बिखर गई लगा था अब साँसें जैसे रुक जाएँगी नहीं रुकी लगा था ये सरगम टूट जाएगी सो टूट गई दिल की धड़कन मगर नहीं रुकी लगा था ये दिन ये रात ये सुब्ह ये शाम ये बादल ये घटा ये सूरज ये चाँद ये तारे ये धूप ये छाँव ये हवा ये बारिश ये हँसी ख़ुशी चेहरे की ये चहल पहल लोगों की ये फूल महकते हुए ये चिड़िया चहकती हुई मेरा दिल है के ग़ज़ा ये मचलती हुई फ़ज़ा सब रुक जाएगा कुछ नहीं रुका लगा था एक आँधी एक तूफ़ान आएगा जो सब बहा ले जाएगा बादल फटेंगे बाँध टूटेगा पहाड़ तोड़ के पानी सारे शहर तबाह कर देगा जैसे उस ने मेरे दिल को किया है कुछ नहीं हुआ आँख से बस एक बूँद टपकी और दोस्त ने कहा वो तो जा चुकी कब की मुझे भी पता था जबकि ये बात थी तबकी जिस रात उस ने ये तअल्लुक़ तोड़ा था जिस रात उस ने ये शहर छोड़ा था उस बात को कई बरस बीत चुके हैं अब तो उस के बिना रहना भी सीख चुका हूँ उस की याद में उस के इंतिज़ार में काफ़ी कुछ लिख चुका हूँ उस सेे कहना मगर फिर भी आज भी मैं रातों में जगता हूँ चुपके चुपके सारी ख़बर रखता हूँ खाने से पहले उस का निवाला रखता हूँ तन्हा बैठ के ही सही रात को चाँद तकता हूँ वो तो आज भी मेरी या अमर है पूछना था अब मैं उस का क्या लगता हूँ मैं तो उस की यादों में जीता हूँ उस पे मरता हूँ और सच कहने से भी नहीं डरता हूँ उस सेे इश्क़ करता था और अब भी उसी से करता हूँ पता नहीं अब उस के दिल में क्या है मेरे लिए मैं तो मगर मर मिटा हूँ उस के लिए उस सेे कहना था उस सेे पूछना था पूछना था तुझे याद भी है तू मुझे याद करती थी हम दोनों कभी 'उश्शाक़ थे तू ख़ामोश बैठी रह बेशक मगर दुनिया तो आज भी तेरा नाम मेरे साथ लेती है तू ने क्यूँ नहीं दिया लड़कियाँ तो साथ देती हैं ख़ैर रोज़ ऐसे नए सवाल ज़ेहन में आते रहते हैं मेरे यार और मैं रोज़ ख़ुद तेरे हिमायती बनके मेरे दिल को समझाते रहते हैं बताते रहते हैं बिछड़ने वाले में सब कुछ था बे-वफ़ाई न थी मगर थी ये तो बस हम दोनों जानते हैं बस यही सब सोचता रहता हूँ ख़ुद के नाख़ूनों से इन ज़ख़्मों को नोचता रहता हूँ तेरे साथ बिताए हर एक लम्हे में गुम हूँ मैं अब मैं नहीं हूँ अब मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम हूँ अपने माज़ी की दीवार के मलबे में दबा पड़ा हूँ तू कभी आएगी तो पाएगी मैं कब का मरा पड़ा हूँ सोचता रहता हूँ हम लोग हर पल तन्हा क्यूँ होते हैं हर पल शोरीदा क़िस्मत पर क्यूँ रोते हैं बस एक दहलीज़ पर ही क्यूँ सोते हैं अपना आपा क्यूँ खोते हैं हम शाइ'र ऐसे क्यूँ होते हैं एक बात बताओ तू मुझे मिली भी और तू मिली भी नहीं फूल खिले भी और खिले भी नहीं तू आई तो मेरे ज़ख़्म सिले मगर सिले भी नहीं पहली मोहब्बत कोई और थी मगर तुझे चाहा उस सेे ज़ियादा था सो तेरे बिछड़ने का ग़म जानाँ पहली वालियों से भी ज़ियादा था मेरा तुझ सेे इश्क़ नहीं शादी का इरादा था मैं ने तो पीपल पर धागा भी बाँधा था तू ने मगर बीच राह में ही हाथ छोड़ दिया– क्यूँ तू ने मेरा दिल तोड़ दिया– क्यूँ हबाब तेरी याद का फूटता नहीं सुना था घर का लाल टूटता नहीं लुटने वाले लुटते हैं कोई लूटता नहीं मरासिम टूट भी जाए उन्स छूटता नहीं हाथ छूट जाता है साथ छूट जाता है ख़्वाब टूट जाता है ख़्वाहिश छूट जाती है आदत छूट जाती है इबादत छूट जाती है दिल टूट जाता है तर्ज़ टूट जाती है 'इल्लत छूट ती नहीं तवक़्क़ो' टूट ती नहीं रब्त टूट जाता है रिश्ता टूटता नहीं गुज़िश्ता छूटता नहीं
Chhayank Tyagi
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"उस सेे कहना" उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है उस के लौट आने की उम्मीद अब भी नज़र आती है आधी रात को चाँद जब खिड़कियों से झाँकता है मैं कुछ भी लिखने बैठता हूँ मगर मेरा हाथ काँपता है पता नहीं क्यूँ एक कमी-सी रहती है ये निगाहें उस एक तस्वीर पर थमी-सी रहती है पुराने मैसेज में लबालब भरी मोहब्बत देख कर पिघल जाता है पत्थर वरना तो इस दिल पे बर्फ जमी-सी रहती है गुलज़ार से कहना जैसी उस की एक रात थी वैसी यहाँ हर रोज़ आँख में नमी-सी रहती है मेरी तन्हाई और उस की बे-ए'तिनाई मेरी अधूरी छूटी पड़ी ग़ज़लें और नज़्में वैसे कुछ हिज्र के मुकम्मल शे'र हैं बुझे पड़े दिए हैं जली हुई अँधेर है उस के नाम लिखे गए ख़त मेरे घर की वीरान पड़ी छत तस्वीर से उस की ठोड़ी का तिल और मेरा बिखरा हुआ दिल और वो याद है एक मुरझाया हुआ गुलाब था ना मेरा एक टूटा हुआ ख़्वाब है ना ये सभी रोज़ मेरे बगल में आ कर खड़े हो जाते हैं और मुझ सेे कहते हैं उस सेे कहना दिल टूट गया तो क्या अब भी धड़कता है एक शख़्स तेरे शहर की गलियों में भटकता है ये आँखें उस की मुंतज़िर हैं आज भी जैसे कल थे मुहाजिर हैं आज भी 'इश्क़-ए-सादिक़ तो लापरवाह है ना इश्क़-ए-ना-मुराद ही सही मगर ख़ुदा गवाह है ना इश्क़-ए-मजाज़ी ब-निस्बत इश्क़-ए-इलाही 'अज़ीम है क्या तुम सेे मोहब्बत करना जुर्म-ए-'अज़ीम है उस सेे पूछना था उस सेे पूछना था बहुत कुछ उस सेे कहना था बहुत कुछ कह नहीं पाया उस सेे कहना उस सेे बिछड़ के मैं रह नहीं पाया ऐसा नहीं है भुलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा नहीं उस के सिवा किसी से मिलना मिलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा भी नहीं दिखावा करने का शौक़ है मोहब्बत में आशिक़ बनने का शौक़ है मैं तो चाहता हूँ हर फूल को मसल देना मगर बस दिल नहीं करता उस सेे कहना उस के बिना चाँद तारे जुगनू फूल ख़ुशबू क्या उस मह-रू के सामने कोई ख़ुश-रू क्या सब मुक़द्दस होता है मोहब्बत में इश्क़ में बा-वज़ू क्या एक उसी की ख़्वाहिश थी इस दिल को जो पूरी न हो सकी अब तो जो मिल जाए ठीक अब हस्ब-ए-आरज़ू क्या उस सेे कहना मगर फिर भी दिल के एक छोटे से कोने में एक ख़्वाहिश ज़िंदा है उस को अपना कह के पुकारने की हर शब उस की नज़र उतरने की कहने की उस से कि तुम सेे मोहब्बत है मुझे तुम्हारी ज़रूरत है मुझे उस सेे कहना मैं ही नहीं उस को खिड़की दर-ओ-दीवार सब याद करते हैं उस के बारे में रात-रात भर पागल बात करते हैं मुझ सेे ज़्यादा क़लम टेबल पंखा रस्सी सब रोते हैं वो भी उसी की यादों में अक्सर खोए हुए होते हैं वो शर्ट जो उसे पसंद थी, नहीं शर्ट को वो पसंद थी, उस के जाते ही रंग छोड़ दिया इसने वो इत्र जो उस ने दिया था लगाने को कहती थी अब कहीं लगा के जाता हूँ तो ख़ुशबू नहीं आती वो ख़ुशबू इत्र की नहीं थी वो बहाना था महकती तो वो थी मेरे बदन में वो घड़ी जो उस ने दी थी रुक गई उसी दिन जिस दिन मैं वो बिछड़े थे ये दिल-घर उस का जो उस ने सजाया था और फिर तोड़ कर गई थी उस सेे कहना उसे देखने कई किराए दार आए थे काफ़ी अच्छी रक़म दे रहे थे मगर रहने ही नहीं दिए इस की दीवारें चिल्ला पड़ी मुझ पर हर एक मेरी चीज़ मेरी नहीं है अब उस सेे कहना सब उस का है अब सब उसी को चाहते हैं मुझ सेे ज़्यादा इन्हें उस की आदत लग गई है उस सेे कहना आज भी उस की तलाश रहती है वो नहीं मगर उस की याद पास रहती है किसी नए जोड़े को देख कर वो यहाँ होती मेरे कहने से पहले मेरी तन्हाई काश कहती है उस सेे कहना ये कोई इमोशनल ब्लैकमेलिंग नहीं है बस बताना था आज-कल मेरी तबीयत भी बहुत ख़राब रहती है आँखों में प्यास और होंठों पर शराब रहती है बहन तो गुज़र ही गई याद होगा पिताजी थोड़े टूट गए हैं घुटने जाम हो जाते हैं मम्मी का जी थोड़ा और कच्चा हो गया है और तो बस थोड़ी ख़राश रहती है कुछ अच्छा नहीं बनाया सालों से तब से बस जीने के लिए खाते हैं मुझे बड़े डरावने ख़्वाब आते हैं तुम तो कभी निकलती ही नहीं ज़ेहन से पूछना था मैं, बहन, माँ, भाई कोई भी, कभी भी याद आते हैं? उस सेे कहना किसी रोज़ कहीं भी कभी भी अगर मिलने आए तो लौट के मत जाना अगर जाना हो तो मत आना मेरे ये दिल के ज़ख़्म भर भी सकते हैं मगर एक और चोट से हम मर भी सकते हैं कोई पस-ओ-पेश ही नहीं इस बात पर तेरा दीदार ज़रूरी है तेरे साथ से इस लिए ही तो तेरी तस्वीर है आज भी आँसू-ओ-ख़लिश तक़दीर थे कल भी तक़दीर हैं आज भी कभी याद आए तो हाल पूछ लेना बुरा ही सही मेरे बारे में सोच लेना वैसे तो मैं ख़ुद ही जब याद बन जाऊॅंगा तब देखना बहुत याद आऊॅंगा उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है लो फिर उस की याद आ गई
Chhayank Tyagi
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