'इक बात' इक बात कि तुम सेे कुछ बात करनी है इक बात कि फिर इक मुलाक़ात करनी है इक बात कि तुम्हें इक नज़्म सुनानी है पुरानी तुम सेे कुछ रंजिशें बतानी हैं इक बात कि वापस सब याद दिलाना है तुम सेे मिला वो हर इक ज़ख़्म गिनाना है इक बात कि तुम सेे कुछ सवाल करने हैं तुम्हारी आँखों से कुछ जवाब पढ़ने हैं इक बात कि तुम ने क्यूँँ साथ छोड़ दिया बीच सफ़र में मेरा हाथ छोड़ दिया इक बात कि इस-क़दर क्यूँँ किया अन-देखा तुम ने इक बार भी न पलट कर देखा इक बात कि तुम ने क्यूँँ दिल ये तोड़ा क्यूँँ मुझ सेे अचानक यूँँ मुँह मोड़ा इक बात कि तुम सेे अब बात नहीं होती दिन गुज़रतें नहीं अब रात नहीं होती इक बात कि तुम बिन ये दिल बेहाल है तुम नहीं तो अब कुछ ऐसा हाल है जैसे बिन चाँद-तारों की रात जैसे दूल्हे बिना बारात जैसे बिन गद्दी के राजा जैसे कफ़न बिना जनाज़ा जैसे बिन हिन्दी के हिन्द जैसे धूप बिना आलिन्द जैसे बिन साहिल के नदी जैसे इतिहास बिना कोई सदी जैसे बिन धड़कन के दिल जैसे संगीत बिना महफ़िल जैसे बिन प्यास के सजल जैसे बहर बिना कोई ग़ज़ल जैसे बिन मिलन के प्रीत जैसे धुन बिना कोई गीत जैसे बिन सिया के राम जैसे राधा बिना घनश्याम जैसे बिन मदन के रति जैसे शिव बिना पार्वती जैसे बिन पानी के मीन जैसे फ़सल बिना ज़मीन जैसे बिन बारिश के मोर जैसे सूई बिना कोई डोर जैसे बिन औषधि के चोट जैसे लफ़्ज़ बिना ये होंठ इक बात कि लबों पे कुछ बोल सजाने हैं इक बात कि कुछ पल फिर संग बिताने हैं इक बात कि तुम्हीं को फिर ख़्वाबों में तकना है दिन-रात बस तुम्हें ही ख़यालों में रखना है इक बात कि फिर तुम्हें सोच मुस्कुराना है हर एक चेहरे में फिर तुम्हीं को पाना है इक बात कि तुम सेे इक इनायत लेनी है सात फेरों की तुम सेे इजाज़त लेनी है इक बात कि तुम सेे फिर दिल लगाना है तुम्हें फिर से अपना ख़ुदा बनाना है इक बात कि तुम सेे सब शिकवे मिटाने हैं फिर से तुम पर दो जहाँ लुटाने हैं इक बात कि तुम्हारा फिर दिल धड़काना है मुझे फिर तुम्हारे सपनों में आना है इक बात कि तुम्हें दिल के जज़्बात बताने हैं तुम्हारे साथ ही सातों जनम बिताने हैं इक बात कि मिलने आओ गर तुम तो साथ इक जनम भी निभाओ गर तुम तो शीशे का इक आशियाँ बना दूँ चादर फ़र्श पे मख़मली बिछा दूँ आलम से बहारें चोरी कर लूँ दोस्ती तितलियों से पूरी कर लूँ मद्धम-सी कोई धुन चला दूँ कलियाँ चारों ओर खिला दूँ नदियों की चाल आहिस्ता कर दूँ मुकम्मल साहिलों का रिश्ता कर दूँ फ़िज़ाओं में ढेरों इत्र मिला दूँ ख़ुशबूएँ हर तरफ़ फैला दूँ शाम को देर तक ढलने न दूँ मन पंछियों का मचलने न दूँ बेवक़्त शबनम की बूँदें बरसा दूँ पत्तियों के दिल की प्यास बुझा दूँ हो अँधेरा तो शमा' रौशन कर दूँ तेज़ परिंदों की धड़कन कर दूँ चाँद को ज़मीं पे बुला दूँ महफ़िल फूलों से सजा दूँ आसमाँ से सितारें हज़ार ले लूँ बारिश घटाओं से उधार ले लूँ मौसम में नमी भर दूँ चंचल-शीतल हवाएँ कर दूँ फ़लक में सातों रंग घोल दूँ चौखटें जन्नत की सारी खोल दूँ इक बात कि तुम्हारे नाम जन्नतें सजानी हैं इक बात कि तुम्हें अनगिनत ता'रीफ़ें सुनानी हैं इक बात कि तुम्हारी बातों में नशा है ज़ुल्फ़ें कि जैसे कोई काली घटा है इक बात कि कितना मासूम है चेहरा आँखों में छुपा हो राज़ कोई गहरा इक बात कि कोई भी होश खो जाए चाँद भी देखे तो दीवाना हो जाए इक बात कि तुम्हें झुमकें पहनाने हैं नाज़ुक-से हाथों पर कंगन चढ़ाने हैं इक बात कि पैरों में पायलें बाँधनी हैं अब इश्क़ की सारी दहलीज़ें लाँघनी हैं इक बात कि तुम्हारी पलकों को चूमना है संग तुम्हारे फिर से बारिशों में झूमना है इक बात कि तुम्हें भरना है बाहों में घंटों फिर यूँँ ही रखना है निगाहों में इक बात कि तुम सेे फिर बात करनी है आओ कि फिर इक मुलाक़ात करनी है
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ
Rehaan
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"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है" बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं कम हो रही हर एक मील की दूरी पे अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई जाने फिर क्यूँँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ सेे ही रह गई होगी तुझ सेे नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं
Rehaan
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"बिन तेरे" मुझे जीना है बिन तेरे ये सच अपना नहीं सकता बिछड़ कर तुझ सेे वापस ख़ुद को भी अब पा नहीं सकता मोहब्बत एक ऐसा ग़म है जो सब को रुलाता है मैं कितना रोया तड़पा हूँ तुझे समझा नहीं सकता तेरी हर याद काँटों की तरह दिल को दुखाती है मैं कितने दर्द में हूँ ये तुझे बतला नहीं सकता तेरा चेहरा मेरी आँखों में अब हर पल झलकता है तेरे ख़्वाबों में ही जानाँ मेरा हर दिन गुज़रता है भले तुझ सेे न कह पाया मैं अपने दिल की बातें पर मैं कितना चाहता हूँ तुझ को मेरा दिल समझता है ख़ुदा से अब ये ख़्वाहिश है कि तू बस मेरी हो जाए तेरे बिन जीना नामुमकिन ये दिल तुझ पे ही मरता है
Rehaan
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"ज़रूरी था" भूलना भी था ज़रूरी तुझे तो इस लिए फिर इश्क़ में जलते चराग़ों को बुझाया हम ने सोच कर ये कि तेरी याद नहीं लाज़िम अब दिल से अपने तेरी यादों को हटाया हम ने मोहब्बत के मलालों से उबरना भी ज़रूरी था मुरादें भी ज़रूरी थीं समझना भी ज़रूरी था ज़रूरी था कि यादों को सँभाले रखते दिल में हम मगर यादों का फिर दिल से निकलना भी ज़रूरी था हैं हम को याद शा में जो तेरी गलियों में बीती थीं हमारा दिल जहाँ हारा था नज़रें तेरी जीती थीं वो तेरा हम को मुड़कर देखना केवल बहाना था असल में तो तेरा मक़्सद हमारा दिल दुखाना था मगर हम देर से समझे अदाएँ वो नुमाइश थीं तेरी गलियों से बिन देखे गुज़रना भी ज़रूरी था किसी मंज़िल सफ़र की अब नहीं रहती ख़बर हम को कोई उम्मीद की लौ भी नहीं आती नज़र हम को मोहब्बत की ख़ता की थी सज़ाएँ पानी थी पा लीं किए कितने सितम ख़ुद पे कि कितनी ठोकरें खा लीं तेरे ग़म के सताएँ हम कभी रोए कभी तड़पे मगर तड़पे तो याद आया तड़पना भी ज़रूरी था
Rehaan
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'आशिक़ी(ख़्वाब, हक़ीक़त और ख़ुदा)' कोई सूरत नज़र को लुभा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ख़ुशबू साँसों को भा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी सरगम लबों पे छा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ख़्वाब दिल में समा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है मेरा ख़्वाब था कि तुझे भाया करूँँ तेरे सपनों में मैं आया करूँँ बचाकर चाँद-सितारों की नज़र से तुझे फ़लक की सैर पे ले जाया करूँँ इस क़दर तू मुझ सेे प्यार करे मेरे फ़रेब पे भी ऐतिबार करे कभी राधा बनके तो कभी मीरा बनके हर जनम बस मेरा ही इंतिज़ार करे तू मुश्किलों में मेरा साया बने मुझे धूप लगे तो छाया बने जब हार जाऊँ मैं उम्मीदें सभी तू ईश्वर की कोई माया बने कोई माया ईश्वर भी पिरो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई दिल ग़र चैन से सो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी आँखें खुल के रो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ख़्वाब हक़ीक़त हो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है इक हक़ीक़त जिस ने बस सितम किया हर बार आँखों को नम किया तुझे कितना मैं ने चाहा मगर तू ने न मुझ पर कोई करम किया तेरे इंतिज़ार में सदियाँ बीती मेरी हर ख़ुशी ज़िन्दगी से रूठी मेरी उम्मीदें सब सिमट कर रह गई बस तमन्नाऍं कुछ यूँँ टूटी मेरी अधूरा ख़्वाहिश-ए-गुलाब रह गया मेरा ख़्वाब बस इक ख़्वाब रह गया न हो सका वो मुकम्मल कभी बिन चकोर के ही मेहताब रह गया कोई चाँद चकोर बिन रह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई काफ़िर नज़्में कह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी आँख से पानी बह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई बिन बोले सब सह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई कितना सहे ये बता दे ख़ुदा मेरा इश्क़ मुझे अब लौटा दे ख़ुदा छट जाए अँधेरा हर ख़ुशी से मेरी कोई ऐसी रौशनी तू दिखा दे ख़ुदा मेरी मन्नतों का तू लिहाज़ कर मेरे पागलपन का इलाज कर मैं करता फिरूँ शुक्रिया तेरा कुछ ऐसा मेरा मिज़ाज कर मुझे फिर कोई ग़म न सता सके वो मुझ सेे नज़रें न हटा सके जुड़ जाए धड़कनें कुछ इस तरह उस दिल से न कभी कोई मिटा सके कोई धड़कन दिल से बिछड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ग़लतियों पे भी झगड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी ख़ुदा भी ज़िद पे अड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई रिश्ता युगों तक उजड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है
Rehaan
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