"एक ज्योति" ज़िंदगी मुश्किलों का सफ़र है जहाँ नीम तारीक रातें हैं और ख़ार हैं चहार जानिब दजल की वबा आम है इश्क़ उल्फ़त तअ'ल्लुक़ भी व्यापार है लोग अपने होकर भी अपने नहीं अपने चेहरों पे झूठी हँसी ले के दुनिया को गुमराह करने से हरगिज़ नहीं थक रहे मेरे ज़ख़्मों के पकने के है मुल्तमिस यार ज़ख़्मों पे मरहम नहीं रख रहे महव-ए-हैरत हूँ दुनिया के चलने पे मैं रोज़ सूरज के उगने और ढलने पे मैं तीरगी आम है रात बदनाम है हाँ उफ़क़ पर मगर एक दिया जल रहा है जिस की किरणों से राहों में भटके हुए राहगीरों को राह का पता चल रहा है उस की ज्योति से रौशन नहीं आसमाँ उस की किरणों से उठता नहीं ये जहाँ पर अँधेरे की आँखों को एक ज्योति से फूटती रौशनी गड़े जा रही है वो अकेली है लेकिन दर्द तकलीफ़ मअज़ूर मजबूर मुश्किल नामुम्किन से हर दिन लड़े जा रही है उस की हिम्मत को हैरत भरी दाद सारा उफ़क़ दे रहा है उस का लड़ना मुझे आप को ज़िंदगी का सबक़ दे रहा है
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"ख़ूब-सूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उस का मुखड़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत बहुत क़ातिलाना है उस की निगाहें बहुत जानलेवा है उस की अदाएँ लगाई है जो उस ने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैं ने ज़रा गुफ़्तुगू कर के देखा है मैं ने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उस में हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उस का मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत
Danish Balliavi
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"सुर्ख़ गुलाब और बदर-ए-मुनीर" ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैं और उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैं जो ज़ख़्म कि सुर्ख़ गुलाब हुए, जो दाग़ कि बदर-ए-मुनीर हुए इस तरहा से कब तक जीना है, मैं हार गया इस जीने से कोई अब्र उड़े किसी क़ुल्ज़ुम से रस बरसे मिरे वीराने पर कोई जागता हो कोई कुढ़ता हो मिरे देर से वापस आने पर कोई साँस भरे मिरे पहलू में कोई हाथ धरे मिरे शाने पर और दबे दबे लहजे में कहे तुम ने अब तक बड़े दर्द सहे तुम तन्हा तन्हा जलते रहे तुम तन्हा तन्हा चलते रहे सुनो तन्हा चलना खेल नहीं, चलो आओ मिरे हम-राह चलो चलो नए सफ़र पर चलते हैं, चलो मुझे बना के गवाह चलो
Saqi Faruqi
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"इतनी सी इजाज़त" तेरे दर्द को अपना बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरे ज़ख़्मो पर मरहम लगा दूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरे ख़्वाबों को आँखों में सज़ा लूँ तेरे यादों को दिल में बसा लूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरी रातों को अपनी रात बना लूँ तुझे आख़री मुलाक़ात बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे आँखों का काज़ल बना लूँ तुझे घुँघरू वाली पायल बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे धड़कन की तार बना लूँ तुझे ज़िन्दगी का सार बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे सफ़र का मंज़िल बना लूँ तुझे कंधे का तिल बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे होंठो का मुस्कान बना लूँ तुझे अपनी पहचान बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बना लूँ तुझे अपनी किताब का क़िस्सा बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो
Muskan Singh
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हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!
Shadab Javed
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"सख़्त लम्हें" वक़्त थोड़ा मुश्किल है रात थोड़ी भारी है आँख के कटोरे से अश्कबारी जारी है वस्ल की उम्मीदों पर बेबसी के साए हैं गुलशनों की राहों पर नाचती ख़िज़ाएँ है ये जो सख़्त लम्हें हैं ये जो स्याह मंज़र है इस के ख़त्म होने का वक़्त एक मुक़र्रर है वक़्त के थपेड़ों का सामना किया जाए अब हुसूल-ए-मक़सद का हौसला किया जाए क़ब्ल अपने मरने से थोड़ा जी लिया जाए
Salman Yusuf
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"एक लम्हा" सारी दुनिया जिसे दिन समझ कर कारख़ानों की जानिब चली जा रही है इस को क्या ही ख़बर है कि चेहरे पे इस के वक़्त के हाथों कालिख़ मली जा रही है किस को मअ'लूम है हम जिसे दिन समझते हैं वो रात हो मैं तो सूरज के उगने को, दुनिया के उठने को गाड़ियों के हार्न से होने वाले शोर और शराबे को इस जहाँ के ख़राबे को रात गरदान्ता हूँ और वो लम्हा कि जब चाँद की परत पर एक चेहरा नमूदार हो जाता है होश खो जाता है मैं उसी एक लम्हे को दिन मानता हूँ
Salman Yusuf
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"इक आस" उम्मीदें सिसकियाँ लेती हैं दिल के गहरे कोने में तसल्ली धड़कनें देती हैं नाज़ुक हाथ की मानिंद पलक पर अश्क के मेले यहाँ हर रोज़ लगते हैं लबों पर प्यास की शम्में यहाँ हर शाम जलती हैं मुसलसल दर्द बहता है तो पलकें भीग जाती हैं हुजूम-ए-आदमीयत में फ़क़त मैं ही हूँ तन्हा सा कटे से पैरहन पर कुछ पुराने छींट के धब्बे यही पैग़ाम देते हैं मुझे दुनिया से नफ़रत है मैं एक बोसीदा सी टूटी हुई दीवार के भीतर ख़ुद अपने आप के साए से यूँँ ही लिपटा रहता हूँ हक़ीक़त में मैं ख़ुद इक लाश की मानिंद हूँ लेकिन अभी कुछ साँस बाक़ी हैं अभी इक आस बाक़ी है कि तुम फिर लौट आओगे कि तुम फिर लौट आओगे
Salman Yusuf
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"अपनी कहानी" मैं अपनी कहानी क़लमबंद करने की कोशिश तो करता रहा हूँ मगर मेरा माज़ी तो नाकामियों के अँधेरों से उजड़ा हुआ है नहीं याद मुझ को कि उम्र-ए-गुज़िश्ता के इक मरहले में हयात-ए-रवां से रक़ीब-ए-अमाँ से भी वहम-ओ-गुमाँ में कभी जीत पाया मैं लिखने को लिख दूँ कि मैं ने ज़माने से जो कुछ भी चाहा नहीं मिल सका कँवल मेरे ख़्वाबों का हक़ीक़त की बंजर ज़मीनो पे हरगिज़ नहीं खिल सका मैं लड़ता रहा पर हमेशा कि मैं ने कभी भी सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म ना किया मैं टूटा मैं बिखरा मैं हारा मगर हौसला फिर भी कम ना किया मैं फिर से चला हूँ सवा लाख कोशिश को एक रंग देने मैं लिखने को लिख दूँ मगर ये कहानी भी पढ़नी है किस ने सभी को तो दुनिया में सक्सेस का नुस्ख़ा ही लाहक रहा है जो हारा नालायक़ जो जीता हमेशा वही तो ज़माने की असली कसौटी पे लायक़ रहा है मेरे फ़ेलियर के तजरबात मुझ को बताने लगे हैं कि मेरी कहानी अधूरी है अबतक इसे दरकिनार है सक्सेस की दस्तक वो सक्सेस जो बहरो के कानों में चीख़े चिल्लाए उन्हे ये बताए कि चलने से पहले कई मर्तबा तुम को गिरना पड़ेगा
Salman Yusuf
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लिखना ज़रूरी है लिखो लिखना ज़रूरी है मगर लिखने से पहले ये अख़ज़ कर लो कि क्या लिखना ज़रूरी है वही जो कुछ तुम्हारे दरमियाँ में घट रहा है मुहब्बत का गला क्यूँँ कट रहा है समाज बँट रहा है अख़ुव्वत आजिज़ी और इंकिसारी स भरा बादल फ़ज़ा में नफ़रतों की घुल रहा है छँट रहा है मुहाफ़िज़ इस्मतों के इस्मतों का क़त्ल करते हैं अमीर-ए-शहर ग़रीबों के लहू से पेट भरते हैं लिखो लिखना ज़रूरी है लिखो अब बे-हयाई ने फ़्रीडम नाम रखा है जो ज़िल्लत ख़त्म होनी थी उसी को थाम रखा है हमारे मुंसिफ़ों ने ही हमारे सर हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम रखा है सभी तो सर-ब-सज्दा हैं फुहश तहज़ीब के आगे सभी तो ज़ुल्म की ताईद में परचम उठाए हैं मगर कुछ हैं अभी जो कुव्वत-ए-इज़हार रखते हैं वो लहजा तीर रखते हैं ज़बाँ तलवार रखते हैं हमेशा ज़ुल्म की गर्दन पे आहनी वार करते हैं यज़ीद-ए-वक़्त की ताईद से इनकार करते हैं अभी कुछ लोग ज़िंदा हैं लिखो लिखना ज़रूरी है!
Salman Yusuf
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