nazmKuch Alfaaz

“इक तरफ़ा मोहब्बत” जान-ए-जिगर ऐ जान-ए-वफ़ा तू मेरे लिए मत ख़्वाब सजा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा दिल देने की बात न कर यूँँ मेरे लिए फ़रियाद न कर मेरे पीछे-पीछे मत आ वक़्त अपना बर्बाद न कर तू महलों में रहती मैं सड़कों पे गुज़ारा करता हूँ तू अरबों की मालिक है मैं सब्जी बेचा करता हूँ पछताएगी प्रीत बढ़ा मत कहता हूँ फिर दोबारा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा मारा मारा फिरता हूँ मैं फिर भी मुझ पे मरती है रात को मेरे दर्द में ख़ूब उठ उठ के रोया करती है मैं मोहताज़ निवाले का तू चाँद से खेला करती है मुझ सेे मोहब्बत करने की तू फिर भी सोचा करती है इश्क़ मोहब्बत क्या जानूँ मैं तो हूँ पागल बेचारा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा तू गद्दे पर सोती है और मैं सोता हूँ सड़कों पर तू रहती है महलों में और मैं रहता फ़ुटपाथों पर रात को चैन से सोते हैं सब मैं मज़दूरी करता हूँ रोज़ निवाले की ख़ातिर मैं जान पे खेला करता हूँ तुझ को कहाँ पे रक्खूँगा ना घर मेरा ना चौबारा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है

Prashant Kumar

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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी

Prashant Kumar

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"सदा-ए-मुफ़लिस" मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब सेे मैं तन्हा रहा हूँ मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कोई ये न कहना कभी उन सेे जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ अगर हाल मेरा कोई तुम सेे पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ अब इस सेे ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

Prashant Kumar

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"चाँद तकता है रातों को छत से तुझे" क्यूँँ है इतनी जवाँ क्यूँँ है इतनी हसीं नाम किस ने रखा तेरा ज़ोहरा-जबीं तंग सी टॉप पहने अब आना नहीं चाँद तकता है रातों को छत से तुझे राह में देखता है पलट के तुझे मुझ को डर है कहीं ले न जाए तुझे राह में देखता है पलट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे चाँद में दाग़ है फिर भी मग़रूर है लग रहा अपनी आदत से मजबूर है तू जिधर जा रहा चाँद उधर आ रहा ये तुझे देख कर कितना शर्मा रहा आड़ में देखता है सिमट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे ख़ूब-सूरत बहुत लग रही आज तू आज से बन गई मेरी मुमताज़ जब कैसी कारीगरी है ख़ुदा की क़सम ज़ुल्फ़ से पाँव तक ज़हर है तू सनम मैं तिरी जान हूँ तू मिरी जान है ख़्वाब में देखता हूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे अपनी सूरत दिखा दे ख़ुदा के लिए मुझ को दिल में बसा ले ख़ुदा के लिए अब तो घर से निकल आ ख़ुदा के लिए मुझ को अपना बना ले ख़ुदा के लिए उम्र भर के लिए बाहों में थाम ले ओ मिरी जान-ए-मन दिल से तू काम ले ऐसी बारिश में देखूँ रपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे माल ज़ेवर छिपे तेरी पोशाक में हैं फ़रिश्ते ख़ुदा सब तिरी ताक में जान ऐसे में घर से निकलना नहीं कोई ले जाएगा तुझ को अफ़्लाक में कुछ न कुछ बात तो तुझ में है जान-ए-मन यूँँ ही थोड़ी लुटाते हैं सब जान-ए-तन तेरी बाहों में देखूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे तू अकेले दुकेले न जाना कहीं तुझ को समझा रहा हूँ मिरी हम-नशीं मैं कहीं रह न पाऊँगा तेरे बिना तू मुझे छोड़ कर यार जाना नहीं तेरी आँखों से मौसम बदलने लगा तेरी ज़ुल्फ़ों में जादू सा चलने लगा तेरे काँधे से पल्लू सरकने लगा जिस ने देखा नज़ारा ये जलने लगा नींद में देखता हूँ उचट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे जाँ तिरे नाम की जोश ही जोश में ख़ुद को रक्खूँगा अब तेरी आग़ोश में आते जाते सभी छेड़ते हैं तुझे टकटकी बाँध के देखते हैं तुझे हाँ बहुत देर तक देखते हैं तुझे चाँद तारे तुझे ताड़ते हैं सभी फ़ालतू में ही मुँह फाड़ते हैं सभी सब सेे ले जाऊँगा मैं झपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

Prashant Kumar

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"दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है" अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है होंठों पे मिरे प्यार का पैग़ाम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है ये रोग जवानी में सभी को ही लगा है बिन इश्क़ मोहब्बत के भला किस का हुआ है ऐसा है यहाँ कौन जो बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मतलब की मोहब्बत से परेशान रहा हूँ मैं क्यूँँकि यहाँ बनके इक इंसान रहा हूँ कैसा भी कहीं दिल को अब आराम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है लोगों ने मोहब्बत का यहाँ ढोंग रचाया वादे सभी झूटे किए इल्ज़ाम लगाया मुझ सा कोई आशिक़ कहीं बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मैं जाऊँ जिधर लोग हँसी मेरी उड़ाते पागल भी बताते हैं मुझे फिर भी सताते मालिक तिरी दुनिया में मिरा काम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है

Prashant Kumar

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