"हद है" क्या! कैसे! मैं यहाँ कैसे मैं तो पार्क में बैठा एक नज़्म लिख रहा था ना, तो ये कैसे, मैं यहाँ कैसे! देखता हूँ कोई 'गर हो आसपास जो समझाए मुझे कि ये जो हुआ, आख़िर हुआ कैसे, मैं यहाँ कैसे हाँ, एक शख़्स नज़र आया तो है, नज़दीक जाऊँ ज़रा पूछूँ अपने इस हाल का सबब उस सेे जी आदाब, मेरे इधर होने की वजह से क्या आप वाक़िफ हैं? 'गर हाँ तो बतलाएँ ज़रा! देखिए जनाब मुआमला दरअसल ये है आप ही के दिल ने अपने काम से जी चुराया और इस सबब से ज़िंदगी आप की तमाम हो गई, ख़ैर, मैं चलता हूँ , ख़ुदा हाफ़िज़ या इलाही ये क्या ग़लती दिल की रुकी धड़कन! मगर मौत मेरी हद है
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"न जाने कब" न जाने कब वो उतरेगी मेरे दिल से न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा न जाने कब उस की आँखों के दरिया से मेरे ख़्वाब पानी भरना छोड़ेंगे न जाने कब मेरी क़लम की कश्ती उस की अदाओं के ज़जीरें से रवाना होगी न जाने कब मुझे कोई और साहिल मिलेगा न जाने कब उस की गली से गुज़रना फि़ज़ूल लगेगा मुझे न जाने कब ये बाँहें मोहब्बत के रास्ते पर किसी और की राह देखेंगी न जाने कब ये काग़ज़ ख़फ़ा होंगे क़िस्सों से उस के न जाने कब ये सियाही, उस पर लिखे कलाम पे गिरेगी न जाने कब वो मेरे दिल से उतरेगी न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"तन्हाई" एक शाम जब दोस्तों से मिल कर घर लौटा मैं, अपने कमरे में गया तो देखा के तन्हाई टेबल पर रखी मेरी डाइरी पे सर रखे रो रही है। मुझे बेहद हैरानी हुई के जो मुकम्मल ज़माने को रुला सकती है, आज ख़ुद उसे ही क्यूँँ उदासी मुयस्सर है। में उस के पास गया ये सोच कर के शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उस के आँसू पोछे, साथ में कुर्सी डाल कर मैं भी बैठा, दिलासा देने की कोशिश की और फिर पूछा के आख़िर तुम क्यूँ रो रहे हो, और फिर उस के वो लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में बैठ गए, उस ने कहा "मेरे साथ कोई रहना नहीं चाहता, किसी को मैं पसंद नहीं, कोई मुझ सेे बात नहीं करता, किसीको दोस्त चाहिए, किसीको मोहब्बत, किसी को परिवार, लेकिन मेरे साथ कोई दो पल भी गुज़ारना नहीं चाहता और अब तो तू ने भी दोस्त बना लिए हैं, तुझे भी कहाँ है अब ज़रूरत मेरी, याद है जब मेरी ख़ामोशी के चलते भी तू मुझ सेे घंटों बातें किया करता था, रात-रात भर मुझ ही पर लिखा करता था, तेरी ये डाइरी आज भी मेरी नाम से भरी पड़ी है, इस के हर काग़ज़ पर लफ्ज़ कोई और हो न हो "तन्हाई" ज़रूर है उस रोज़ मुझ पर तन्हाई के अस्ल मानी खुले और मैं समझा के तन्हा तो ख़ुद तन्हाई भी नहीं रहना चाहती
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"रो तो रहे हैं" नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं ग़म तुझ सेे कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं कहें क्या किसी से दर्द अपना छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी वजह न सही, यूँँ ही सही, रो तो रहे हैं मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँँ तो और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष' काम तो दिल ही कर सारा देता है भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर टपकना आँसुओं का सहारा देता है पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"मैं पत्थर हूँ" कोई हम सफ़र नहीं मेरा मेरा कोई हमनवा नहीं है फ़ुर्क़तों की घुटन है सिर्फ़ क़ुर्बतों की कोई हवा नहीं है मुझे लगता था शख़्स वो जाएगा तो फ़िज़ूल मरने मारने लगूँगा मगर लगता है ख़्याल-ए-यार बिन ही दिन गुज़ारने लगूंगा कहाँ तो उस की चाहत से मन हटता नहीं था कहाँ अब मन भी नहीं करता उसे चाहने का उस की गली से गुज़रने का बहाना बना कर मैं तो शर्मसार हो गया हूँ ख़ुद ही के बहाने का ले जाए मुझे भी कोई गर जा रहा है इस जहाँ से तो भटकते हैं जहाँ साए वो भी जगह बेहतर होगी इस जहाँ से तो मोहब्बत के बग़ैर जीना ऐसे है बिना चमक के कोई नगीना जैसे है लोग जानते भी हैं के शाइ'र हूँ मैं फिर भी है सवाल, "तू इतना कमीना कैसे है?" सीख लिया है अब तो 'आकर्ष' उस के बिना भी रहना क़ैद क़ब्र में हूँ ख़ुद को मगर ज़िंदा ही कहना नज़र से नज़र नहीं मिलेगी वो सामने भी गर आए तो मेरी आँखें भी न छलकेंगी शायद वो आज मार भी गर जाए तो घरवाले कहते तो हैं मैं पत्थर हूँ लगाने मुझे भी लगा है मैं पत्थर हूँ कर दिया था सौदा दिलों का मुक़र्रर मैं ने दिल-ए-बे-रुख़ मगर चिल्ला पड़ा मैं पत्थर हूँ
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा" प्यार से बहुत दिल से बनाया होगा यार बड़ी मुश्किल से बनाया होगा चाँद को इंसान में तब्दील किया कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा इक मुद्दत लगी होगी तेरी आँखें बनाने में कई अरसों में जाके तेरा चेहरा बना होगा ख़ूबसूरती समेटी होगी सारे जहाँ से उस ने तब कहीं जाके तेरा लहजा बना होगा तेरी ज़ुल्फ़ बनाने में कितनी रातें लगी होंगी तेरा जिस्म कितने ही गुलाबों से बनाया होगा सँवारा होगा जन्नत की परियों ने तुझे तेरा नक़्श कितने ही हिसाबों से बनाया होगा कितने मैख़ाने ख़ाली किए होंगे आँखों में तेरी तेरा दिल कितने ही हीरों से बनाया होगा शब-ओ-रोज़ अब यही सोचते गुज़रते हैं मेरे के यार ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा ज़रूर तारों से सलाह ली होगी बादलों की निगरानी में रखा होगा तुझे तो ज़मीन पे भेजा ख़ुदा ने पर तेरा बाल तेरी निशानी में रखा होगा ख़ुद रहगुज़र भी राह देखती है तेरी फूल तेरे छूने पे महकते हैं तेरे इशारे पे सहर होती है परिंदे तेरी आहट पे चहकते हैं आईना तेरे अक्स पे इतराता है जुगनू देखते हैं तेरे ख़्वाब रात भर तेरी ख़ुशबू की दस्तरस में क्या आया के 'आकर्ष' अब कोसता है गुलाब रात भार बेशुमार शिद्दत से तेरी रूह बनाई होगी तेरा हुस्न सादगी से ख़फ़ा हो के बनाया होगा इक बदन में काइनात क़ैद करी कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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