"ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा" प्यार से बहुत दिल से बनाया होगा यार बड़ी मुश्किल से बनाया होगा चाँद को इंसान में तब्दील किया कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा इक मुद्दत लगी होगी तेरी आँखें बनाने में कई अरसों में जाके तेरा चेहरा बना होगा ख़ूबसूरती समेटी होगी सारे जहाँ से उस ने तब कहीं जाके तेरा लहजा बना होगा तेरी ज़ुल्फ़ बनाने में कितनी रातें लगी होंगी तेरा जिस्म कितने ही गुलाबों से बनाया होगा सँवारा होगा जन्नत की परियों ने तुझे तेरा नक़्श कितने ही हिसाबों से बनाया होगा कितने मैख़ाने ख़ाली किए होंगे आँखों में तेरी तेरा दिल कितने ही हीरों से बनाया होगा शब-ओ-रोज़ अब यही सोचते गुज़रते हैं मेरे के यार ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा ज़रूर तारों से सलाह ली होगी बादलों की निगरानी में रखा होगा तुझे तो ज़मीन पे भेजा ख़ुदा ने पर तेरा बाल तेरी निशानी में रखा होगा ख़ुद रहगुज़र भी राह देखती है तेरी फूल तेरे छूने पे महकते हैं तेरे इशारे पे सहर होती है परिंदे तेरी आहट पे चहकते हैं आईना तेरे अक्स पे इतराता है जुगनू देखते हैं तेरे ख़्वाब रात भर तेरी ख़ुशबू की दस्तरस में क्या आया के 'आकर्ष' अब कोसता है गुलाब रात भार बेशुमार शिद्दत से तेरी रूह बनाई होगी तेरा हुस्न सादगी से ख़फ़ा हो के बनाया होगा इक बदन में काइनात क़ैद करी कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"न जाने कब" न जाने कब वो उतरेगी मेरे दिल से न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा न जाने कब उस की आँखों के दरिया से मेरे ख़्वाब पानी भरना छोड़ेंगे न जाने कब मेरी क़लम की कश्ती उस की अदाओं के ज़जीरें से रवाना होगी न जाने कब मुझे कोई और साहिल मिलेगा न जाने कब उस की गली से गुज़रना फि़ज़ूल लगेगा मुझे न जाने कब ये बाँहें मोहब्बत के रास्ते पर किसी और की राह देखेंगी न जाने कब ये काग़ज़ ख़फ़ा होंगे क़िस्सों से उस के न जाने कब ये सियाही, उस पर लिखे कलाम पे गिरेगी न जाने कब वो मेरे दिल से उतरेगी न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"हद है" क्या! कैसे! मैं यहाँ कैसे मैं तो पार्क में बैठा एक नज़्म लिख रहा था ना, तो ये कैसे, मैं यहाँ कैसे! देखता हूँ कोई 'गर हो आसपास जो समझाए मुझे कि ये जो हुआ, आख़िर हुआ कैसे, मैं यहाँ कैसे हाँ, एक शख़्स नज़र आया तो है, नज़दीक जाऊँ ज़रा पूछूँ अपने इस हाल का सबब उस सेे जी आदाब, मेरे इधर होने की वजह से क्या आप वाक़िफ हैं? 'गर हाँ तो बतलाएँ ज़रा! देखिए जनाब मुआमला दरअसल ये है आप ही के दिल ने अपने काम से जी चुराया और इस सबब से ज़िंदगी आप की तमाम हो गई, ख़ैर, मैं चलता हूँ , ख़ुदा हाफ़िज़ या इलाही ये क्या ग़लती दिल की रुकी धड़कन! मगर मौत मेरी हद है
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"तन्हाई" एक शाम जब दोस्तों से मिल कर घर लौटा मैं, अपने कमरे में गया तो देखा के तन्हाई टेबल पर रखी मेरी डाइरी पे सर रखे रो रही है। मुझे बेहद हैरानी हुई के जो मुकम्मल ज़माने को रुला सकती है, आज ख़ुद उसे ही क्यूँँ उदासी मुयस्सर है। में उस के पास गया ये सोच कर के शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उस के आँसू पोछे, साथ में कुर्सी डाल कर मैं भी बैठा, दिलासा देने की कोशिश की और फिर पूछा के आख़िर तुम क्यूँ रो रहे हो, और फिर उस के वो लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में बैठ गए, उस ने कहा "मेरे साथ कोई रहना नहीं चाहता, किसी को मैं पसंद नहीं, कोई मुझ सेे बात नहीं करता, किसीको दोस्त चाहिए, किसीको मोहब्बत, किसी को परिवार, लेकिन मेरे साथ कोई दो पल भी गुज़ारना नहीं चाहता और अब तो तू ने भी दोस्त बना लिए हैं, तुझे भी कहाँ है अब ज़रूरत मेरी, याद है जब मेरी ख़ामोशी के चलते भी तू मुझ सेे घंटों बातें किया करता था, रात-रात भर मुझ ही पर लिखा करता था, तेरी ये डाइरी आज भी मेरी नाम से भरी पड़ी है, इस के हर काग़ज़ पर लफ्ज़ कोई और हो न हो "तन्हाई" ज़रूर है उस रोज़ मुझ पर तन्हाई के अस्ल मानी खुले और मैं समझा के तन्हा तो ख़ुद तन्हाई भी नहीं रहना चाहती
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"रो तो रहे हैं" नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं ग़म तुझ सेे कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं कहें क्या किसी से दर्द अपना छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी वजह न सही, यूँँ ही सही, रो तो रहे हैं मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँँ तो और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष' काम तो दिल ही कर सारा देता है भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर टपकना आँसुओं का सहारा देता है पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"मैं पत्थर हूँ" कोई हम सफ़र नहीं मेरा मेरा कोई हमनवा नहीं है फ़ुर्क़तों की घुटन है सिर्फ़ क़ुर्बतों की कोई हवा नहीं है मुझे लगता था शख़्स वो जाएगा तो फ़िज़ूल मरने मारने लगूँगा मगर लगता है ख़्याल-ए-यार बिन ही दिन गुज़ारने लगूंगा कहाँ तो उस की चाहत से मन हटता नहीं था कहाँ अब मन भी नहीं करता उसे चाहने का उस की गली से गुज़रने का बहाना बना कर मैं तो शर्मसार हो गया हूँ ख़ुद ही के बहाने का ले जाए मुझे भी कोई गर जा रहा है इस जहाँ से तो भटकते हैं जहाँ साए वो भी जगह बेहतर होगी इस जहाँ से तो मोहब्बत के बग़ैर जीना ऐसे है बिना चमक के कोई नगीना जैसे है लोग जानते भी हैं के शाइ'र हूँ मैं फिर भी है सवाल, "तू इतना कमीना कैसे है?" सीख लिया है अब तो 'आकर्ष' उस के बिना भी रहना क़ैद क़ब्र में हूँ ख़ुद को मगर ज़िंदा ही कहना नज़र से नज़र नहीं मिलेगी वो सामने भी गर आए तो मेरी आँखें भी न छलकेंगी शायद वो आज मार भी गर जाए तो घरवाले कहते तो हैं मैं पत्थर हूँ लगाने मुझे भी लगा है मैं पत्थर हूँ कर दिया था सौदा दिलों का मुक़र्रर मैं ने दिल-ए-बे-रुख़ मगर चिल्ला पड़ा मैं पत्थर हूँ
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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