"तन्हाई" एक शाम जब दोस्तों से मिल कर घर लौटा मैं, अपने कमरे में गया तो देखा के तन्हाई टेबल पर रखी मेरी डाइरी पे सर रखे रो रही है। मुझे बेहद हैरानी हुई के जो मुकम्मल ज़माने को रुला सकती है, आज ख़ुद उसे ही क्यूँँ उदासी मुयस्सर है। में उस के पास गया ये सोच कर के शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उस के आँसू पोछे, साथ में कुर्सी डाल कर मैं भी बैठा, दिलासा देने की कोशिश की और फिर पूछा के आख़िर तुम क्यूँ रो रहे हो, और फिर उस के वो लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में बैठ गए, उस ने कहा "मेरे साथ कोई रहना नहीं चाहता, किसी को मैं पसंद नहीं, कोई मुझ सेे बात नहीं करता, किसीको दोस्त चाहिए, किसीको मोहब्बत, किसी को परिवार, लेकिन मेरे साथ कोई दो पल भी गुज़ारना नहीं चाहता और अब तो तू ने भी दोस्त बना लिए हैं, तुझे भी कहाँ है अब ज़रूरत मेरी, याद है जब मेरी ख़ामोशी के चलते भी तू मुझ सेे घंटों बातें किया करता था, रात-रात भर मुझ ही पर लिखा करता था, तेरी ये डाइरी आज भी मेरी नाम से भरी पड़ी है, इस के हर काग़ज़ पर लफ्ज़ कोई और हो न हो "तन्हाई" ज़रूर है उस रोज़ मुझ पर तन्हाई के अस्ल मानी खुले और मैं समझा के तन्हा तो ख़ुद तन्हाई भी नहीं रहना चाहती
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"न जाने कब" न जाने कब वो उतरेगी मेरे दिल से न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा न जाने कब उस की आँखों के दरिया से मेरे ख़्वाब पानी भरना छोड़ेंगे न जाने कब मेरी क़लम की कश्ती उस की अदाओं के ज़जीरें से रवाना होगी न जाने कब मुझे कोई और साहिल मिलेगा न जाने कब उस की गली से गुज़रना फि़ज़ूल लगेगा मुझे न जाने कब ये बाँहें मोहब्बत के रास्ते पर किसी और की राह देखेंगी न जाने कब ये काग़ज़ ख़फ़ा होंगे क़िस्सों से उस के न जाने कब ये सियाही, उस पर लिखे कलाम पे गिरेगी न जाने कब वो मेरे दिल से उतरेगी न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"रो तो रहे हैं" नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं ग़म तुझ सेे कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं कहें क्या किसी से दर्द अपना छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी वजह न सही, यूँँ ही सही, रो तो रहे हैं मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँँ तो और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष' काम तो दिल ही कर सारा देता है भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर टपकना आँसुओं का सहारा देता है पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"मैं पत्थर हूँ" कोई हम सफ़र नहीं मेरा मेरा कोई हमनवा नहीं है फ़ुर्क़तों की घुटन है सिर्फ़ क़ुर्बतों की कोई हवा नहीं है मुझे लगता था शख़्स वो जाएगा तो फ़िज़ूल मरने मारने लगूँगा मगर लगता है ख़्याल-ए-यार बिन ही दिन गुज़ारने लगूंगा कहाँ तो उस की चाहत से मन हटता नहीं था कहाँ अब मन भी नहीं करता उसे चाहने का उस की गली से गुज़रने का बहाना बना कर मैं तो शर्मसार हो गया हूँ ख़ुद ही के बहाने का ले जाए मुझे भी कोई गर जा रहा है इस जहाँ से तो भटकते हैं जहाँ साए वो भी जगह बेहतर होगी इस जहाँ से तो मोहब्बत के बग़ैर जीना ऐसे है बिना चमक के कोई नगीना जैसे है लोग जानते भी हैं के शाइ'र हूँ मैं फिर भी है सवाल, "तू इतना कमीना कैसे है?" सीख लिया है अब तो 'आकर्ष' उस के बिना भी रहना क़ैद क़ब्र में हूँ ख़ुद को मगर ज़िंदा ही कहना नज़र से नज़र नहीं मिलेगी वो सामने भी गर आए तो मेरी आँखें भी न छलकेंगी शायद वो आज मार भी गर जाए तो घरवाले कहते तो हैं मैं पत्थर हूँ लगाने मुझे भी लगा है मैं पत्थर हूँ कर दिया था सौदा दिलों का मुक़र्रर मैं ने दिल-ए-बे-रुख़ मगर चिल्ला पड़ा मैं पत्थर हूँ
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"क्या करूँँ मैं" कौन सी मंजिल चुनूँ कैसा सफ़र तय करूँँ मैं ऐ बेकरारी-ए-दिल बता क्या करूँँ मैं स्याही के कोहरे सजाऊँ या ख़ून का धुआँ करूँँ मैं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँँ मैं मुझे न उस की हिजरत क़ुबूल है न और से वस्ल में जा रहा हूँ न दिल की ओर बढ़ रहा मैं मैं न शक्ल पे जा रहा हूँ मोहब्बतें बिखरी हैं ज़मीं पर दिलों की ख़ाक उड़ रही है अरे कैसा रस्ता है मैं ये कहाँँ जा रहा हूँ किसे ख़ुदा मानूँ किस की दुआ करूँँ मैं मुझे कोई तो बताए आख़िर क्या करूँँ मैं नहीं पसंद ज़मीं मुझे है आसमाँ पे दस्तरस नहीं न किसी को मुझ पे है तरस किसी पे मेरा बस नहीं कहाँ चराग़ है मेरा मेरा कहाँ पे जिन मिलेगा इस के तो टुकड़े हो गए नया कहाँँ पे दिल मिलेगा ख़ुद को कहाँ पे बाँधूँ कहाँ से ख़ुद को रिहा करूँँ मैं ऐ ए'तिमाद-ए-दिल बता क्या करूँँ मैं
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"हद है" क्या! कैसे! मैं यहाँ कैसे मैं तो पार्क में बैठा एक नज़्म लिख रहा था ना, तो ये कैसे, मैं यहाँ कैसे! देखता हूँ कोई 'गर हो आसपास जो समझाए मुझे कि ये जो हुआ, आख़िर हुआ कैसे, मैं यहाँ कैसे हाँ, एक शख़्स नज़र आया तो है, नज़दीक जाऊँ ज़रा पूछूँ अपने इस हाल का सबब उस सेे जी आदाब, मेरे इधर होने की वजह से क्या आप वाक़िफ हैं? 'गर हाँ तो बतलाएँ ज़रा! देखिए जनाब मुआमला दरअसल ये है आप ही के दिल ने अपने काम से जी चुराया और इस सबब से ज़िंदगी आप की तमाम हो गई, ख़ैर, मैं चलता हूँ , ख़ुदा हाफ़िज़ या इलाही ये क्या ग़लती दिल की रुकी धड़कन! मगर मौत मेरी हद है
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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