nazmKuch Alfaaz

"क्या करूँँ मैं" कौन सी मंजिल चुनूँ कैसा सफ़र तय करूँँ मैं ऐ बेकरारी-ए-दिल बता क्या करूँँ मैं स्याही के कोहरे सजाऊँ या ख़ून का धुआँ करूँँ मैं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँँ मैं मुझे न उस की हिजरत क़ुबूल है न और से वस्ल में जा रहा हूँ न दिल की ओर बढ़ रहा मैं मैं न शक्ल पे जा रहा हूँ मोहब्बतें बिखरी हैं ज़मीं पर दिलों की ख़ाक उड़ रही है अरे कैसा रस्ता है मैं ये कहाँँ जा रहा हूँ किसे ख़ुदा मानूँ किस की दुआ करूँँ मैं मुझे कोई तो बताए आख़िर क्या करूँँ मैं नहीं पसंद ज़मीं मुझे है आसमाँ पे दस्तरस नहीं न किसी को मुझ पे है तरस किसी पे मेरा बस नहीं कहाँ चराग़ है मेरा मेरा कहाँ पे जिन मिलेगा इस के तो टुकड़े हो गए नया कहाँँ पे दिल मिलेगा ख़ुद को कहाँ पे बाँधूँ कहाँ से ख़ुद को रिहा करूँँ मैं ऐ ए'तिमाद-ए-दिल बता क्या करूँँ मैं

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"न जाने कब" न जाने कब वो उतरेगी मेरे दिल से न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा न जाने कब उस की आँखों के दरिया से मेरे ख़्वाब पानी भरना छोड़ेंगे न जाने कब मेरी क़लम की कश्ती उस की अदाओं के ज़जीरें से रवाना होगी न जाने कब मुझे कोई और साहिल मिलेगा न जाने कब उस की गली से गुज़रना फि़ज़ूल लगेगा मुझे न जाने कब ये बाँहें मोहब्बत के रास्ते पर किसी और की राह देखेंगी न जाने कब ये काग़ज़ ख़फ़ा होंगे क़िस्सों से उस के न जाने कब ये सियाही, उस पर लिखे कलाम पे गिरेगी न जाने कब वो मेरे दिल से उतरेगी न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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"तन्हाई" एक शाम जब दोस्तों से मिल कर घर लौटा मैं, अपने कमरे में गया तो देखा के तन्हाई टेबल पर रखी मेरी डाइरी पे सर रखे रो रही है। मुझे बेहद हैरानी हुई के जो मुकम्मल ज़माने को रुला सकती है, आज ख़ुद उसे ही क्यूँँ उदासी मुयस्सर है। में उस के पास गया ये सोच कर के शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उस के आँसू पोछे, साथ में कुर्सी डाल कर मैं भी बैठा, दिलासा देने की कोशिश की और फिर पूछा के आख़िर तुम क्यूँ रो रहे हो, और फिर उस के वो लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में बैठ गए, उस ने कहा "मेरे साथ कोई रहना नहीं चाहता, किसी को मैं पसंद नहीं, कोई मुझ सेे बात नहीं करता, किसीको दोस्त चाहिए, किसीको मोहब्बत, किसी को परिवार, लेकिन मेरे साथ कोई दो पल भी गुज़ारना नहीं चाहता और अब तो तू ने भी दोस्त बना लिए हैं, तुझे भी कहाँ है अब ज़रूरत मेरी, याद है जब मेरी ख़ामोशी के चलते भी तू मुझ सेे घंटों बातें किया करता था, रात-रात भर मुझ ही पर लिखा करता था, तेरी ये डाइरी आज भी मेरी नाम से भरी पड़ी है, इस के हर काग़ज़ पर लफ्ज़ कोई और हो न हो "तन्हाई" ज़रूर है उस रोज़ मुझ पर तन्हाई के अस्ल मानी खुले और मैं समझा के तन्हा तो ख़ुद तन्हाई भी नहीं रहना चाहती

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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"रो तो रहे हैं" नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं ग़म तुझ सेे कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं कहें क्या किसी से दर्द अपना छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी वजह न सही, यूँँ ही सही, रो तो रहे हैं मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँँ तो और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष' काम तो दिल ही कर सारा देता है भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर टपकना आँसुओं का सहारा देता है पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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"मैं पत्थर हूँ" कोई हम सफ़र नहीं मेरा मेरा कोई हमनवा नहीं है फ़ुर्क़तों की घुटन है सिर्फ़ क़ुर्बतों की कोई हवा नहीं है मुझे लगता था शख़्स वो जाएगा तो फ़िज़ूल मरने मारने लगूँगा मगर लगता है ख़्याल-ए-यार बिन ही दिन गुज़ारने लगूंगा कहाँ तो उस की चाहत से मन हटता नहीं था कहाँ अब मन भी नहीं करता उसे चाहने का उस की गली से गुज़रने का बहाना बना कर मैं तो शर्मसार हो गया हूँ ख़ुद ही के बहाने का ले जाए मुझे भी कोई गर जा रहा है इस जहाँ से तो भटकते हैं जहाँ साए वो भी जगह बेहतर होगी इस जहाँ से तो मोहब्बत के बग़ैर जीना ऐसे है बिना चमक के कोई नगीना जैसे है लोग जानते भी हैं के शाइ'र हूँ मैं फिर भी है सवाल, "तू इतना कमीना कैसे है?" सीख लिया है अब तो 'आकर्ष' उस के बिना भी रहना क़ैद क़ब्र में हूँ ख़ुद को मगर ज़िंदा ही कहना नज़र से नज़र नहीं मिलेगी वो सामने भी गर आए तो मेरी आँखें भी न छलकेंगी शायद वो आज मार भी गर जाए तो घरवाले कहते तो हैं मैं पत्थर हूँ लगाने मुझे भी लगा है मैं पत्थर हूँ कर दिया था सौदा दिलों का मुक़र्रर मैं ने दिल-ए-बे-रुख़ मगर चिल्ला पड़ा मैं पत्थर हूँ

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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"हद है" क्या! कैसे! मैं यहाँ कैसे मैं तो पार्क में बैठा एक नज़्म लिख रहा था ना, तो ये कैसे, मैं यहाँ कैसे! देखता हूँ कोई 'गर हो आसपास जो समझाए मुझे कि ये जो हुआ, आख़िर हुआ कैसे, मैं यहाँ कैसे हाँ, एक शख़्स नज़र आया तो है, नज़दीक जाऊँ ज़रा पूछूँ अपने इस हाल का सबब उस सेे जी आदाब, मेरे इधर होने की वजह से क्या आप वाक़िफ हैं? 'गर हाँ तो बतलाएँ ज़रा! देखिए जनाब मुआमला दरअसल ये है आप ही के दिल ने अपने काम से जी चुराया और इस सबब से ज़िंदगी आप की तमाम हो गई, ख़ैर, मैं चलता हूँ , ख़ुदा हाफ़िज़ या इलाही ये क्या ग़लती दिल की रुकी धड़कन! मगर मौत मेरी हद है

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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