nazmKuch Alfaaz

हर इक ऊँची इमारत के सामने बनी होती है इक झोपड़ी सवाल ये उठता है कि झोपड़ी की वजह से इमारत है खड़ी या इमारत की वजह से झोपड़ी?

Related Nazm

"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

16 likes

"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

13 likes

"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

13 likes

रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

12 likes

More from Kumar Rishi

तुझ में बीते दिन तुझ में बीतीं रातें मेरा ये जीवन तेरी सौगातें सुब्ह की धूप रात की चाँदनी जीवन की डोर तुझी से बाँधनी तुझ सेे शुरू ज़िन्दगी तुझ पे खतम जब तू है साथ फिर ना कोई ग़म ये चार पल का फसाना आना और जाना तुम सेे दिल लगाना रूठना और मनाना चाहतों की कहानी सुन ले मेरी ज़ुबानी तोड़ना फिर जोड़ना मुझ सेे मुँह ना मोड़ना

Kumar Rishi

1 likes

ऐ दिल रूक जा थम जा ठहर जा सब्र कर धीरज धर मंज़िल अभी दूर है रास्तों का मज़ा ले यूँँ न ख़ुद को सज़ा दे बस चला चल रूक मत पीछे मत देख जो छूट गया सो छूट गया जो रूठ गया सो रूठ गया बीती बातें भुलाता चल ऐ दिल बस चला चल तेरा वास्ता तेरी मंज़िल से है तेरा ख़ुदा तेरे अंदर है कर उस पर भरोसा बस चला चल बस चला चल

Kumar Rishi

0 likes

चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं करेंगे अपनी मनमानी कभी इस प्लेटफार्म पर तो कभी उस प्लेटफार्म पर बैठेंगे पिएँगे गरम चाय गरम समोसे खाएंगे देखेंगे आती जाती ट्रेनों को चढ़ते उतरते मुसाफ़िरों को सुनेंगे कुली की आवाज़ों को देखेंगे ट्रैक पर घूमते आवारा कुत्तों को सुनेंगे रेलगाड़ी की सूचनाओं को पढ़ेंगे लोगों के चेहरे उन की भावनाओं को दृश्य बड़े ही रोचक होते हैं स्टेशन के ज़िन्दगी के हर हाल को दर्शाते हैं जगह-जगह से यात्री यहाँ आते हैं हम भी तो यात्री ही हैं इस दुनिया में बस इस की ट्रेन कभी लेट नहीं होती एक दम समय पर है आती रेलवे जैसी उदघोषणा नहीं करती मग़र काश करती तो कुछ ज़रूरी काम निपटा जाते जो हमारे जाने के बा'द छूट जाते हैं चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं

Kumar Rishi

0 likes

तुम्हीं दिल तुम्हीं धड़कन तुम्हीं साँस हो तुम्हीं तड़पन तुम्हीं से दिन तुम्हीं से रात तुम्हीं मेरी दुनिया तुम्हीं मेरी काइ‌नात तुम्हीं ज़मीं तुम्हीं आसमाँ तुम्हीं मेरा पूरा जहाँ तुम्हीं मंज़िल तुम्हीं रास्ता दुनिया से नहीं कोई वास्ता खो कर ख़ुद को पा लिया है तुझे चाहूँ हर जनम में रब से तुझे

Kumar Rishi

1 likes

अबकी पढ़ना तो अखबार पीछे से पढ़ना शायद कुछ काम की चीज़ पढ़ने को मिल जाए खेलों की दुनिया से कोई ख़बर मिल जाए मुख्य पृष्ठ तो डराने के लिए ही छपता हो जैसे दुनिया ही ख़त्म हो जाएगी लगता हो जैसे जो घटना है वो तो है घटना जीवन कैसा हो हम को है चुनना तो बस इतना ही करना अबकी पढ़ना तो अखबार पीछे से पढ़ना

Kumar Rishi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Kumar Rishi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Kumar Rishi's nazm.