nazmKuch Alfaaz

वो ख़ामोश थी अपने दोज़ख़ में जलती हुई नील-गूँ पानियों के शिकंजे में जकड़ी हुई इक मचलती हुई मौज-ए-महताब की सम्त लपकी मगर रेत पर आ गिरी सीप उगलती हुई ख़ामुशी के भँवर से निकलती हुई वो हँसी और हँसी ब्रज़िअर में से बाहर फिसलती हुई अब वो लड़की नहीं सिर्फ़ अँगड़ाई थी इक तवानाई थी नीम-वा आँख में कसमसाती हुई हाथ मलती हुई इक समुंदर था बिफरा हुआ इक शब थी न ढलती हुई

Related Nazm

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

216 likes

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

108 likes

More from Jawayd Anwar

मैं सफ़र में हूँ मिरे जिस्म पर हैं हज़ार रंगों की यूरिशें कहीं सुर्ख़ फूल खिला हुआ कहीं नील है कहीं सब्ज़ रंग है ज़हर का मगर आइना शब-ए-शहर का मिरी ढाल है जो विसाल है वही अस्ल हिज्र-मिसाल है मिरे सामने वही रास्ते वही बाम-ओ-दर वही संग हैं वही सूलियाँ मुझे शाम आई है शहर में मुझे शाम आई है शहर में जहाँ आसमाँ की वुसअ'तों से सवाल कासा-ब-दस्त लौटे थे याद है शब हीला जो तुझे याद है वो सलीब जिस पे मचान नज्म-ए-सहर की थी वो ख़तीब जिस का ख़िताब अबरू हुआ से था वो सदा-ए-ज़ब्त अजीब थी कहीं कोढ़ियों की शिफ़ा बनी कहीं अब्र-ओ-बाद से चोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर से बड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाब पाँव की धूल हैं मैं सफ़र में हूँ मुझे शाम आई है शहर में मिरे हाथ में भी कमान है मुझे तीर दे

Jawayd Anwar

0 likes

ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा तुझे तो मैं ढूँडने चला था मुझे ख़बर ही नहीं थी तू मेरी उँगलियों में खिला हुआ है मिरे सदफ़ में तिरे ही मोती हैं मेरी जेबों में तेरे सिक्के खनक रहे हैं नवा-ए-गुमराह-ए-दश्त-ए-शब के नुजूम तेरी हथेलियों पर चहक रहे हैं मिरे ख़ला में तमाम सम्तें तिरे ख़ला से उतर रही हैं मुझे ख़बर ही न थी कि मेरी नज़र की ऐनक में तेरे शीशे जुड़े हुए हैं तुझे तो मैं ढूँडने चला था तुझे तो मैं ढूँडने चला था किसी सलीब-ए-कुहन पे दार-ओ-रसन के तारीक रास्तों की थकन में फ़रहाद कोहकन की सदा-ए-सद-चाक में किसी चूक मैं उबलते हुए लहू में खिले गुल तिफ़्ल-ए-बे-गुनह के बिखरते रंगों की उँगली था में तुझे तो मैं ढूँडने चला था शब-ए-तरब है शब-ए-तरब में न साज़ उतरे न नूर बिखरा न बादलों ने फुवार भेजी न झील ने माहताब उगला शब-ए-तरब है ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा शब-ए-तरब में मरी तलब का रबाब बन जा बुझी रगों में शराब बन जा ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा मिरी अँगेठी का ख़्वाब बन जा कि शब का आहन पिघलने तक मेरी चिमनियों के धुएँ में जुगनू मल्हार गाएँ

Jawayd Anwar

0 likes

वही क़स्में शब-ए-ना-मो'तबर की वही रस्में हैं शहर-ए-संग-दिल की वही दीवार-ए-बे-रौज़न कि जिस को ज़बानें दिन ढले तक चाटती हैं किसे पूछें बिरुन-ए-सहन क्या है कहाँ किस खेत में गंदुम उगी है कहाँ किस झील में सूरज गिरा है कहाँ हैं तेरी ज़िरहें मेरी ढालें कहाँ वो चाँद है जिस की तलब में ख़ला में फेंक दीं चेहरों ने आँखें कहाँ है इस घनी दीवार-ए-शब में इकहरी ईंट की चुनवाई पूछें कहाँ से कोई ख़िश्त-ए-ग़म उखाड़ें कहाँ दीवार में रौज़न बनाएँ

Jawayd Anwar

0 likes

इस रेतीले बदन की झुलसी हुई रगों में है तेल का तमाशा और बर्फ़ की तहों में है सूरजों का गिर्या या पानियों की दहशत या ख़ुश्क-सालियाँ हैं महताब से टपकता तारीकियों का लावा रुख़्सार दाग़ता है उस सुब्ह का सितारा चिड़ियों के घोंसलों में बारूद बाँटता है उन चोटियों पे परचम अंजान वादियों के और वादियों पे दाइम अंजान चोटियों के सायों की हुक्मरानी ये मेरे आँसुओं में रखी हुई धनक है उस हुस्न की कहानी नमकीन पानियों की तस्कीन बन रही है उन सब्ज़ गुम्बदों पर बैठे हुए कबूतर आँखें नहीं झपकते और बरगदों के पीछे सोए हुए पयम्बर ख़्वाबों में जागते हैं इन आइनों पे मिट्टी इन खिड़कियों में जाले ये जाम रेज़ा रेज़ा ये तिश्ना-लब नवा-गर ये बे-नवा गदागर और रेतीले बदन की झुलसी हुई रगों में है तेल का ख़ज़ाना इस बर्फ़ की तहों में इन सूरजों का गिर्या सैलाब कब बनेगा ये रेत कब धुलेगी इन ख़ुश्क टहनियों में महताब कब बनेगा सदियों का बोझ उठाए सदियों से मुंतज़िर हैं क़िर्तास-ए-अहमरीं पर धब्बे से रौशनी के ला-रैब ये रिसालत ला-रैब ये सहीफ़े लेकिन तिरे उजाले दीमक ही चाटती थी दीमक ही चाटती है

Jawayd Anwar

0 likes

सूरज ढलता है और बम गिरता है और बम गिरते हैं सूरज ढलने से सूरज चढ़ने तक चढ़े हुए दिन में भी इधर उधर बम गिरते रहते हैं लेकिन कोई चीख़ सुनाई नहीं देती पहले देती थी अब कोई नहीं रोता गहरे गहरे गढ़े हैं और गढ़ों में गलता हुआ इंसानी मास है बचा-खुचा और चारों जानिब ईंटें पत्थर सरिया टूटे हुए दरवाज़े खिड़कियाँ कुत्ता बिल्ली चील और डरे डरे कुछ लोग उधर उधर से झाँकते हैं उधर उधर छुप जाते हैं बम गिरता है लेकिन एक खंडर में सिगरेट जलता है बुझता है जलता है डर ग़ुस्से में ढलता है रॉकेट चलता है रॉकेट चलता है दुनिया चीख़ती है और बम गिरता है तो किसी को सुनाई नहीं देता किसी को दिखाई नहीं देता

Jawayd Anwar

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Jawayd Anwar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Jawayd Anwar's nazm.