nazmKuch Alfaaz

"ख़त" हम ने सोचा था करेंगे इश्क़ तो ख़त लिखेंगे सारी बातें बे-हिसाब यादें उन के संग लिखेंगे लिखेंगे मोहब्बत तो उस का ख़याल आएगा ख़त भरते भरते उन पर बे-हिसाब प्यार आएगा आएगा ख़याल उन का तो मेरी आँखें भर जाएँगी लबों पर उस का नाम होगा स्याही ख़त्म हो जाएगी हो जाएगी अगर स्याही ख़त्म तो क़लम बदले जाएँगे दिल की बात थोड़ी भी लिख गई तो ख़त भर जाएँगे ख़त भर जाएँगे तो दिल की बात अधूरी रह जाएगी समझ गई तुम तो ठीक नहीं तो हम अधूरे रह जाएँगे

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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'तलाश' कोई राह तलाशता हैं कोई शब्द तलाशता हैं सबकी अपनी मंजिल हैं कोई बस घर तलाशता हैं यहाँ मरना सब को हैं कोई बस जीवन तलाशता हैं एक मुलाक़ात के लिए कोई बस वक़्त तलाशता हैं वतन पर कुर्बान होकर कोई बस अमन तलाशता हैं सफ़र में साथ के लिए कोई बस हम सफ़र तलाशता हैं यहाँ सब मुसाफ़िर हैं हर कोई बस राह तलाशता हैं

Devansh gupta

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"मुकम्मल इश्क़" मुकम्मल इश्क़ मेरा मेरे बा'द किसी ग़ैर का ना रहा सब सज्दे मुकम्मल हुए बस तेरा आना विफल रहा तेरी नुमाइश पसंद आँखों का बढ़ा यहाँ पहरा रहा तुझे हर नज़र से बचाने को मैं तेरे साथ ठहरा रहा तुझे स्याही मानकर मैं अपनी किताब लिखता रहा तुझे उस में पाकर मैं उसे ज़िंदगी भर पढ़ता रहा तुझे इन्हीं लफ़्ज़ों से ताज का मुमताज़ बनाता रहा अपनी हर कहानी में हीर से राँझे को दूर कराता रहा तू बस इंतिज़ार कर, मैं ख़ुद को यही समझाता रहा तू बस ठहराव निकली वक़्त का, जो गुज़र जाता रहा

Devansh gupta

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जब उस का जाना होगा जीवन आसान नहीं होगा जब उस का जाना होगा पूरा अरमान नहीं होगा जब उस का जाना होगा महफ़िल ग़मगीन रहेगी मेरी उस की यादों में अब मेरा ख़्वाब अधूरा होगा जब उस का जाना होगा रात सजेगा मंडप उस का गीत विरह के बाजेंगे यार मुझे तब रोना होगा जब उस का जाना होगा इक रोज़ उसे खो कर मुझ को याद पुरानी आएगी फिर भी मुझ को जीना होगा जब उस का जाना होगा इक गीत लिखूंँगा जिस में उस का मेरा मिलना होगा फिर बा'द मेरा मरना होगा जब उस का जाना होगा

Devansh gupta

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वक़्त लेते आना उन सेे कहना आना तो बस वक़्त लेते आना कुछ चुस्कियां चाय की संग लेते जाना थोड़ी गपशप के साथ कुछ यादें बनाना लेकिन आना तो बस वक़्त लेते आना कुछ पल रुकना कुछ पल ठहरना कुछ पुरानी यादों को फिर से बनाना एक पल के लिए ही सही वो यादें लेते आना लेकिन जब आना तो बस वक़्त लेते आना

Devansh gupta

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