आग के शो'ले उतारो हल्क़ में गाड़ दो कीलें धड़कती छातियों में डाल दो गर्दन में फंदे रस्सियों के क़त्ल कर लो ख़ून की नदियाँ बहा लो हो निहत्ता कोई तो गोली चला लो फिर भी हो कोई कसर तो पूरी कर लो जीत का एलान कर दो फिर भी तुम डरते रहोगे और हर युग में तुम्हारी हार ही होती रहेगी फिर भी तुम चेहरे बदल कर हर ज़माने में रहोगे और सदियों तक यही इक सिलसिला चलता रहेगा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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यहाँ तो न पेड़ है न साया न घर है न घर में रहने वाले न ज़िंदगी है न कोई हलचल यहाँ तो ता-हद्द-ए-नज़र धूप ही धूप है रेत ही रेत है धूप ही धूप है तन को झुलसाती धूप आग बरसाती धूप धूल उड़ाती धूप रेत उड़ाती एक दम पराई धूप
Aabid Adeeb
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आरज़ुओं को वुसअ'त न दो अपने ही दाएरे में मुक़य्यद करो वर्ना ये फैल कर हर तरफ़ से तुम्हें घेर लेंगी नोच डालेंगी ज़ख़्मी करेंगी ख़ुद बिखर जाएँगे मर जाएँगे अपनी ही लाश सर पर उठाए बीच बाज़ार नंगे फिरोगे अपने ही लोग नज़दीक आ कर तुम को देखेंगे मुँह फेर लेंगे तुम को ग़लती का एहसास होगा थूक निगलोगे कड़वा लगेगा रात वीरान बे कैफ़ होगी दिन पहाड़ों सा भारी लगेगा आरज़ूओं को वुसअ'त न दो अपने ही दाएरे में मुक़य्यद करो वर्ना ये फैल कर हर तरफ़ से तुम्हें घेर लेंगी
Aabid Adeeb
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कोई मेरे लरज़ते हाथ में काग़ज़ का पुर्ज़ा और क़लम पकड़ा रहा था कभी कुछ ज़ेर-ए-लब ही बड़बड़ा कर कोई इसबात में आँखों की और माथे की जुम्बिश चाहता था कभी दाँतों में होंटों को दबा कर कोई रोने की कोशिश कर रहा था कोई तो चंद लम्हों बा'द अपने बाल बिखराने गरेबाँ नोचने की फ़िक्र में था कोई ग़मगीं चेहरा और सियाह मल्बूस में बेहद हसीं मा'लूम देता था मेरे अज्दाद के नामों को गँवा कर कोई मुझ से तअ'ल्लुक़ जोड़ता था सभी नज़दीक थे मेरे उधर भाई भतीजे थे उधर बहनें थीं भांजे थे फिर उन के बा'द रिश्ते जोड़ने वाले सफ़-आरा थे ये लगता था कि कुछ ही देर में मातम बपा होगा मैं उन बातों से बिस्तर पर पड़ा आँखों को थोड़ी सी खुली रख कर बड़े दिलचस्प मूड में था सभी ग़मगीन थे लेकिन तमन्नाएँ थीं आँखों में यकायक मैं ने करवट ली और आँखें खोल कर उठने की कोशिश की तो देखा सभी के लब पे मसनूई हँसी थी चमक आँखों से ग़ाएब थी
Aabid Adeeb
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वो जिद्द-ओ-जहद करना चाहता था मगर जब से उस ने अपने झोंपड़े को पुख़्ता मकान में बदलने का ख़्वाब देखा था वो कई दाइमी बीमारियों में मुब्तला हो चुका था
Aabid Adeeb
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रगों में दौड़ता फिरता लहू फिर थम गया है हवाएँ तेज़ हैं साँसों की हलचल रुक गई है रीढ़ की हड्डी में च्यूँँटी रेंगती है जिस्म में पूरे हरारत बढ़ गई है ज़ाइक़ा कड़वा कसीला हो गया है कि शायद फिर कोई अपना पराया हो गया है
Aabid Adeeb
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