फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाब उठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इंक़लाब आ रहे हैं जंग के बादल वो मंडलाते हुए आग दामन में छुपाए ख़ून बरसाते हुए कोह-ओ-सहरा में ज़मीं से ख़ून उबलेगा अभी रंग के बदले गुलों से ख़ून टपकेगा अभी बढ़ रहे हैं देख वो मज़दूर दर्राते हुए इक जुनूँ-अंगेज़ लय में जाने क्या गाते हुए सर-कशी की तुंद आँधी दम-ब-दम चढ़ती हुई हर तरफ़ यलग़ार करती हर तरफ़ बढ़ती हुई भूक के मारे हुए इंसाँ की फ़रियादों के साथ फ़ाक़ा-मस्तों के जिलौ में ख़ाना-बर्बादों के साथ ख़त्म हो जाएगा ये सरमाया-दारी का निज़ाम रंग लाने को है मज़दूरों का जोश-ए-इंतिक़ाम गिर पड़ेंगे ख़ौफ़ से ऐवान-ए-इशरत के सुतूँ ख़ून बन जाएगी शीशों में शराब-ए-लाला-गूँ ख़ून की बू ले के जंगल से हवाएँ आएँगी ख़ूँ ही ख़ूँ होगा निगाहें जिस तरफ़ भी जाएँगी झोंपड़ों में ख़ूँ, महल में ख़ूँ, शबिस्तानों में ख़ूँ दश्त में ख़ूँ, वादियों में ख़ूँ, बयाबानों में ख़ूँ पुर-सुकूँ सहरा में ख़ूँ, बेताब दरियाओं में ख़ूँ दैर में ख़ूँ, मस्जिद में ख़ूँ, कलीसाओं में ख़ूँ ख़ून के दरिया नज़र आएँगे हर मैदान में डूब जाएँगी चटानें ख़ून के तूफ़ान में ख़ून की रंगीनियों में डूब जाएगी बहार रेग-ए-सहरा पर नज़र आएँगे लाखों लाला-ज़ार ख़ून से रंगीं फ़ज़ा-ए-बोस्ताँ हो जाएगी नर्गिस-ए-मख़मूर चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ हो जाएगी कोहसारों की तरफ़ से ''सुर्ख़-आंधी'' आएगी
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उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है
BR SUDHAKAR
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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"सरकारों को गाली देंगे" सरकारों को गाली देंगे आजू बाजू ताली देंगे पास खड़े हैं दोस्त हमारे सब लोगों को धक्का मारे जम कर खेली होली सबने जान सड़क पर तोली सबने इनका लॉजिक सब सेे बढ़िया और प्रशासन सब सेे घटिया दिन भर ज्ञान सभी को देंगे लेकिन मास्क नहीं पहनेंगे
Tanoj Dadhich
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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है
Akhtar Payami
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"तुम्हारा दिन मुबारक हो" न जाने कितने दिन गुज़रे न कोई कॉल न मैसेज न कोई राब्ता रखा तुम्हें मैं याद तो हूँ ना या मुझ को भूल बैठे हो कहाँ अपना हमेशा साथ रहने का इरादा था कि चाहे जो भी हो जाए कभी भी हम न बिछड़ेंगे तुम्हारा भी तो वा'दा था तुम्हें मालूम है कैसे तुम्हारे बिन रहा हूँ मैं मैं शब भर जागता और चाँद से बातें किया करता कहीं जब बात आती थी तुम्हारे हुस्न की तो मैं उलझ पड़ता था उस से भी तुम्हारे हुस्न के हक़ में दलीलें मेरी सुन सुन कर सितारे हँसने लगते थे तुम्हारी वापसी के ख़्वाब मुझ को दिन में आते थे अरे देखो ये मैं भी ना बड़ा पागल हूँ जान-ए-जाँ ये भी क्या वक़्त है कोई शिकायत का चलो छोड़ो हटाओ सब जनम-दिन है तुम्हारा आज कि शिकवे और शिकायत को तो सारी उम्र बाक़ी है तुम्हें ये दिन मुबारक हो तुम्हारा दिन मुबारक हो
Khan Janbaz
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बोल! अरी ओ धरती बोल राज सिंघासन डाँवाडोल बादल बिजली रैन अँधयारी दुख की मारी प्रजा सारी बूढ़े बच्चे सब दुखिया हैं दुखिया नर हैं दुखिया नारी बस्ती बस्ती लूट मची है सब बनिए हैं सब ब्योपारी बोल! अरी ओ धरती बोल राज सिंघासन डाँवाडोल
Asrar Ul Haq Majaz
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मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्में गा नहीं सकता सकूँ लेकिन मिरे दिल को मुयस्सर आ नहीं सकता कोई नग़्में तो क्या अब मुझ से मेरा साज़ भी ले ले जो गाना चाहता हूँ आह वो मैं गा नहीं सकता मता-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी पैमाना ओ बरबत मैं ख़ुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता वो बादल सर पे छाए हैं कि सर से हट नहीं सकते मिला है दर्द वो दिल को कि दिल से जा नहीं सकता हवस-कारी है जुर्म-ए-ख़ुद-कुशी मेरी शरीअ'त में ये हद्द-ए-आख़िरी है मैं यहाँ तक जा नहीं सकता न तूफ़ाँ रोक सकते हैं न आँधी रोक सकती है मगर फिर भी मैं उस क़स्र-ए-हसीं तक जा नहीं सकता वो मुझ को चाहती है और मुझ तक आ नहीं सकती मैं उस को पूजता हूँ और उस को पा नहीं सकता ये मजबूरी सी मजबूरी ये लाचारी सी लाचारी कि उस के गीत भी दिल खोल कर मैं गा नहीं सकता ज़बाँ पर बे-ख़ुदी में नाम उस का आ ही जाता है अगर पूछे कोई ये कौन है बतला नहीं सकता कहाँ तक क़िस्स-ए-आलाम-ए-फ़ुर्क़त मुख़्तसर ये है यहाँ वो आ नहीं सकती वहाँ मैं जा नहीं सकता हदें वो खींच रक्खी हैं हरम के पासबानों ने कि बिन मुजरिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता
Asrar Ul Haq Majaz
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मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़ कर तोड़ दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ
Asrar Ul Haq Majaz
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आवारा शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी मेरे सीने पर मगर रखी हुई शमशीर सी ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जाल जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ फिर वो टूटा इक सितारा फिर वो छूटी फुल-जड़ी जाने किस की गोद में आई ये मोती की लड़ी हूक सी सीने में उठ्ठी चोट सी दिल पर पड़ी ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ हर तरफ़ बिखरी हुई रंगीनियाँ रानाइयाँ हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगड़ाइयाँ बढ़ रही हैं गोद फैलाए हुए रुस्वाइयाँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं और कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहीं ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ मुंतज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिए अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए पर मुसीबत है मिरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी तोड़ दूँ हाँ मुनासिब है ये ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब जैसे मुफ़्लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ दिल में इक शो'ला भड़क उट्ठा है आख़िर क्या करूँँ मेरा पैमाना छलक उट्ठा है आख़िर क्या करूँँ ज़ख़्म सीने का महक उट्ठा है आख़िर क्या करूँँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़ कर तोड़ दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ
Asrar Ul Haq Majaz
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