मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़ कर तोड़ दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्में गा नहीं सकता सकूँ लेकिन मिरे दिल को मुयस्सर आ नहीं सकता कोई नग़्में तो क्या अब मुझ से मेरा साज़ भी ले ले जो गाना चाहता हूँ आह वो मैं गा नहीं सकता मता-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी पैमाना ओ बरबत मैं ख़ुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता वो बादल सर पे छाए हैं कि सर से हट नहीं सकते मिला है दर्द वो दिल को कि दिल से जा नहीं सकता हवस-कारी है जुर्म-ए-ख़ुद-कुशी मेरी शरीअ'त में ये हद्द-ए-आख़िरी है मैं यहाँ तक जा नहीं सकता न तूफ़ाँ रोक सकते हैं न आँधी रोक सकती है मगर फिर भी मैं उस क़स्र-ए-हसीं तक जा नहीं सकता वो मुझ को चाहती है और मुझ तक आ नहीं सकती मैं उस को पूजता हूँ और उस को पा नहीं सकता ये मजबूरी सी मजबूरी ये लाचारी सी लाचारी कि उस के गीत भी दिल खोल कर मैं गा नहीं सकता ज़बाँ पर बे-ख़ुदी में नाम उस का आ ही जाता है अगर पूछे कोई ये कौन है बतला नहीं सकता कहाँ तक क़िस्स-ए-आलाम-ए-फ़ुर्क़त मुख़्तसर ये है यहाँ वो आ नहीं सकती वहाँ मैं जा नहीं सकता हदें वो खींच रक्खी हैं हरम के पासबानों ने कि बिन मुजरिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता
Asrar Ul Haq Majaz
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बोल! अरी ओ धरती बोल राज सिंघासन डाँवाडोल बादल बिजली रैन अँधयारी दुख की मारी प्रजा सारी बूढ़े बच्चे सब दुखिया हैं दुखिया नर हैं दुखिया नारी बस्ती बस्ती लूट मची है सब बनिए हैं सब ब्योपारी बोल! अरी ओ धरती बोल राज सिंघासन डाँवाडोल
Asrar Ul Haq Majaz
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आवारा शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी मेरे सीने पर मगर रखी हुई शमशीर सी ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जाल जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ फिर वो टूटा इक सितारा फिर वो छूटी फुल-जड़ी जाने किस की गोद में आई ये मोती की लड़ी हूक सी सीने में उठ्ठी चोट सी दिल पर पड़ी ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ हर तरफ़ बिखरी हुई रंगीनियाँ रानाइयाँ हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगड़ाइयाँ बढ़ रही हैं गोद फैलाए हुए रुस्वाइयाँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं और कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहीं ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ मुंतज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिए अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए पर मुसीबत है मिरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी तोड़ दूँ हाँ मुनासिब है ये ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब जैसे मुफ़्लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ दिल में इक शो'ला भड़क उट्ठा है आख़िर क्या करूँँ मेरा पैमाना छलक उट्ठा है आख़िर क्या करूँँ ज़ख़्म सीने का महक उट्ठा है आख़िर क्या करूँँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़ कर तोड़ दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँँ
Asrar Ul Haq Majaz
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फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाब उठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इंक़लाब आ रहे हैं जंग के बादल वो मंडलाते हुए आग दामन में छुपाए ख़ून बरसाते हुए कोह-ओ-सहरा में ज़मीं से ख़ून उबलेगा अभी रंग के बदले गुलों से ख़ून टपकेगा अभी बढ़ रहे हैं देख वो मज़दूर दर्राते हुए इक जुनूँ-अंगेज़ लय में जाने क्या गाते हुए सर-कशी की तुंद आँधी दम-ब-दम चढ़ती हुई हर तरफ़ यलग़ार करती हर तरफ़ बढ़ती हुई भूक के मारे हुए इंसाँ की फ़रियादों के साथ फ़ाक़ा-मस्तों के जिलौ में ख़ाना-बर्बादों के साथ ख़त्म हो जाएगा ये सरमाया-दारी का निज़ाम रंग लाने को है मज़दूरों का जोश-ए-इंतिक़ाम गिर पड़ेंगे ख़ौफ़ से ऐवान-ए-इशरत के सुतूँ ख़ून बन जाएगी शीशों में शराब-ए-लाला-गूँ ख़ून की बू ले के जंगल से हवाएँ आएँगी ख़ूँ ही ख़ूँ होगा निगाहें जिस तरफ़ भी जाएँगी झोंपड़ों में ख़ूँ, महल में ख़ूँ, शबिस्तानों में ख़ूँ दश्त में ख़ूँ, वादियों में ख़ूँ, बयाबानों में ख़ूँ पुर-सुकूँ सहरा में ख़ूँ, बेताब दरियाओं में ख़ूँ दैर में ख़ूँ, मस्जिद में ख़ूँ, कलीसाओं में ख़ूँ ख़ून के दरिया नज़र आएँगे हर मैदान में डूब जाएँगी चटानें ख़ून के तूफ़ान में ख़ून की रंगीनियों में डूब जाएगी बहार रेग-ए-सहरा पर नज़र आएँगे लाखों लाला-ज़ार ख़ून से रंगीं फ़ज़ा-ए-बोस्ताँ हो जाएगी नर्गिस-ए-मख़मूर चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ हो जाएगी कोहसारों की तरफ़ से ''सुर्ख़-आंधी'' आएगी
Asrar Ul Haq Majaz
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