nazmKuch Alfaaz

कभी खुल के जब खिलखिलाती है इंशा फ़ज़ाओं में सरगम बजाती है इंशा हर इक लब पे तितली बिठाती है इंशा झड़ी क़हक़हों की लगाती है इंशा मसर्रत की दुनिया बसाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा कभी माइशा को हँसाती है इंशा कभी माइशा को रुलाती है इंशा कभी पास उस को बुलाती है इंशा कभी दूर उस को भगाती है इंशा बहन से तो कसरत कराती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा कहानी सुनाती है नानी को इंशा अदाएँ दिखाती है नानी को इंशा मसर्रत दिलाती है नानी को इंशा दिवाना बनाती है नानी को इंशा जवानी बुढ़ापे में लाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा कभी ढूँड लाती है नानू का चश्मा कभी फेंक आती है नानू का चश्मा कभी ख़ुद लगाती है नानू का चश्मा कहीं से भी पाती है नानू का चश्मा तो आवाज़ फ़ौरन लगाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा मोबाइल पर इस तरह उँगली घुमाए कि जैसे कोई शख़्स जादू चलाए मोबाइल के पर्दे पे हैरत उगाए हज़ारों तरह के करिश्में दिखाए दिखा कर करिश्में रिझाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा कभी कोई खाने का मंज़र दिखाए कभी अपनी उँगली से पिज़्ज़ा बनाए कभी तो मज़ेदार मुर्ग़ा पकाए सलादों से खाने की थाली सजाए कभी चाय काफ़ी पिलाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा फ़लक पास जा कर कभी मुस्कुराती कभी छेड़ती तो कभी गुदगुदाती महक को कभी अपना कर्तब दिखाती कभी बेबी नन्ना को पोयम सुनाती हर इक आदमी को लुभाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा मलाहत में इस की चमक है ग़ज़ब की सरापे में इस के लचक है ग़ज़ब की सदाओं में इस की खनक है ग़ज़ब की अदाओं में इस की चहक है ग़ज़ब की ग़ज़ब का नज़ारा दिखाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा चहेती किसी की किसी की दुलारी किसी को लगे सारे दुनिया से न्यारी किसी को हो महसूस फूलों से भारी सनी को तो है जान-ओ-दिल से भी प्यारी बहुत आमना को भी भाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा मोबाइल पे अब्बा को देखे तो डोले चहक कर लपक कर ज़बाँ अपनी खोले मसर्रत से लबरेज़ अल्फ़ाज़ बोले शहद कान में अपने अब्बा के घोले क़तर तक मोहब्बत लुटाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा मोबाइल पे फ़रहान ख़ाँ की ज़बानी हर इक रात सुनती है वो इक कहानी कहानी में आती है जब कोई रानी तो बच्ची से बन जाती है वो सियानी बहुत दाद अब्बास पाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा कभी अपने घोड़े से भौं भौं कराए कभी शे'र चीते को बकरी बनाए कभी सर पे बिल्ली के हाथी बिठाए कभी डॉरीमॉन को भी पट्टी पढ़ाए अनोखे तमाशे दिखाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा मगर खाने पीने से जी है चुराती ज़रा देर में मुँह में लुक़्मा गिराती बहुत अपनी अम्माँ से कसरत कराती कभी नाच तिगड़ी का भी वो नचाती खिलाने में पागल बनाती है इंशा मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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कल तलक जो धरती पर सर-बुलंद परचम था आफ़्ताब की सूरत रंग जिस के चेहरे का दूर तक चमकता था आज उस से लिपटी हैं टिड्डियाँ हवाओं की सुर्ख़ियों के शोलों को ले रही हैं नर्ग़े में बदलियाँ फ़ज़ाओं की 'मार्क्स'-जी के पुतले पर बैठा काला कव्वा एक बीट करने वाला है पास ही में नारा एक इंक़लाब ज़िंदाबाद गूँजता है रह रह कर

Ghazanfar

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भूक से भरी आँखें आसमान की जानिब तक रही हैं धरती से इक हसीन रॉकेट को जिस के सुर्ख़ परचम पर बालियाँ हैं गंदुम की भूक से भरी आँखें जानती नहीं लेकिन बालियाँ तो गेहूँ की ख़ुशनुमा बहाने हैं चमचमाते ख़ोशों में ज़हर-नाक दाने हैं सुर्ख़ सुर्ख़ दानों में एटमी बलाएँ हैं जाँ-गुसिल दवाएँ हैं

Ghazanfar

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दिलों में हमारे मोहब्बत जगा दे रग-ओ-पै से नफ़रत का जज़्बा मिटा दे ख़ुदाया सबक़ एकता का पढ़ा दे हमें आज फिर भाई भाई बना दे कि आसान हो जाए जीना हमारा निगाहों में चमके सुकूँ का सितारा हर इक सम्त में आज हलचल मची है कहीं बेकली है कहीं खलबली है कहीं आग दीवार-ओ-दर में लगी है किसी घर की बुनियाद में थरथरी है हुआ है सुकूँ का समाँ पारा-पारा शरारत का सुलगा हुआ है शरारा शरारत के शो'लों को कोई बुझाए जुनूनी दिमाग़ों को अंकुश लगाए अहिंसा की पोथी कोई फिर पढ़ाए तशद्दुद के हाथों से हम को बचाए जलाए न अब कोई बस्ती दोबारा न छीने कोई ज़िंदगी का सहारा हमें फिर ये एहसास कोई दिलाए कोई ठीक से ये हक़ीक़त बताए नहीं फ़र्क़ रंगों में कुछ भी दिखाए लहू एक का दूसरे से मिलाए दिखाए कि दोनों का है एक धारा बताए कि दोनों का है इक नज़ारा

Ghazanfar

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मैं इक मासूम शहरी था शराफ़त से सभी के साथ रहता था मोहज़्ज़ब तौर से जीता था सब के काम आता था कभी मैं ने किसी का दिल नहीं तोड़ा किसी का सर नहीं फोड़ा किसी तरकश से कोई तीर क्या तिनका नहीं छोड़ा किसी की पीठ में ख़ंजर नहीं भोंका किसी के जिस्म पर बारूद का गोला नहीं फेंका किसी को आग में मैं ने नहीं झोंका किसी का हक़ नहीं मारा किसी का ज़र नहीं लूटा कोई ख़िर्मन नहीं फूँका किसी बिल्डिंग किसी गाड़ी किसी महफ़िल में कोई बम नहीं रक्खा मिरे हाथों किसी का घर नहीं उजड़ा किसी का दर नहीं उखड़ा कोई कुम्बा नहीं बिखरा कोई माथा नहीं सिकुड़ा किसी की राह में रोड़ा नहीं अटका किसी के काम में मैं ने कभी रख़्ना नहीं डाला किसी के वास्ते दिल में कभी कीना नहीं पाला कोई फ़रमान हाकिम का कभी मैं ने नहीं टाला कोई घेरा नहीं लाँघा कोई आँगन नहीं फाँदा मगर फिर भी क़यामत मुझ पे टूटी है अजब ग़ारत-गरी का क़हर बरसा है अजब सफ़्फ़ाक ख़ंजर दिल में उतरा है कि मेरी रूह अब तक तिलमिलाती है कि मेरा ज़ेहन अब भी झुनझुनाता है कि मेरी साँस अब भी लड़खड़ाती है समझ में कुछ नहीं आता कि मैं ने क्या बिगाड़ा है मिरे किस जुर्म की मुझ को मिली है ये सज़ा आख़िर ये गुत्थी किस तरह खोलूँ सबब किस से यहाँ पूछूँ किधर जाऊँ किसे रोकूँ सभी चेहरे यहाँ पत्थर सभी आँखें यहाँ पत्थर बसारत में भरा पत्थर समा'अत में बसा पत्थर ज़बानों में गड़ा पत्थर अदालत में खड़ा पत्थर हर इक क़ानून में पत्थर हर इक आईन में पत्थर हर इक इंसाफ़ में पत्थर हर इक आवाज़ में पत्थर हर इक एहसास में पत्थर ये पत्थर युग के पत्थर से भी भारी है नगीने की तरह तरशा हुआ है और हीरे की अनी की तरह उस की तेज़ नोकें हैं बहुत शफ़्फ़ाफ़ है ये और इस में इक तमद्दुन है मैं इस पत्थर से सर फोड़ूँ कि अपनी ज़िंदगी छोड़ूँ कि अपना रास्ता मोड़ूँ कि बन जाऊँ मैं ख़ुद पत्थर समझ में कुछ नहीं आता

Ghazanfar

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बिन-लादेन तोरा-बोरा में होता तो ऐसी महशरी मार जिस से पहाड़ सुर्मा बन गए ज़मीन राख हो गई आसमान सियाह पड़ गया कब का ख़त्म हो चुका होता मगर कुर्रा-ए-अर्ज़ पर जगह जगह हैबतनाक आतिशीं फुन्कारें कर्बनाक दिल-दोज़ चीख़ें इस हक़ीक़त की ग़म्माज़ हैं कि बिन-लादेन मिरा नहीं ज़िंदा है ये फुन्कारें और चीख़ें इस बात की भी दलील हैं कि लादेन तोरा-बोरा के अलावा दूसरे ख़ित्तों में भी मौजूद है सवाल ये है कि लादेन ख़त्म क्यूँँ नहीं हुआ क्या वो वाक़ई इतना ज़बरदस्त है कि सारे जहान की मजमूई ताक़त भी उस के आगे हेच है क्या उस ने आब-ए-हयात पी ली है कि कभी मर नहीं सकता क्या वो क़फ़स बिन गया है कि अपनी ख़ाकिस्तर से फिर पैदा हो जाता है क्या वो शुद सिकंदरी है कि याजूज-माजूज की ज़बानें उसे पूरी तरह चाट नहीं पातीं क्या वो रावन है कि उस का एक सर अफ़्ग़ानिस्तान में तो बाक़ी नौ दूसरे जहाँ में और क्या उस ने कोई वरदान पा लिया है कि सर कट कर फिर धड़ से आ लगता है क्या वो भीषम-पितामह है कि अपनी अच्छा के बग़ैर मर नहीं सकता क्या उस ने अपना क्लोन बना लिया है कि उस का ख़ात्मा ना-मुम्किन हो गया है सवाल ये भी है कि मीज़ाईलों का निशाना चूक क्यूँँ जाता है क्या उन के पुर्ज़े ढीले हैं कि वो अपना तवाज़ुन खो बैठती हैं बे-सम्ती का शिकार हो जाती हैं क्या वो अंधी हैं कि बिन-लादेन को देख नहीं पातीं क्या उन की बीनाई कमज़ोर है कि वो लादेन और ग़ैर-लादेन में तमीज़ नहीं कर पातीं बिन लादेन कोई सच तो नहीं कि शकुनी की चाल उस के आगे नाकाम हो जाए वो लाक्षा गिरह से बच कर निकल जाए अज्ञात-बास से वापस आ जाए उस का चीर-हरन न हो सके तीरों की शय्या पर ज़िंदा रह जाए कहीं ऐसा तो नहीं कि मिज़ाईलें उसे मारना ही नहीं चाहतीं अगर ऐसा है तो ये महशरी मार किस के लिए ये मुसलसल यलग़ार क्यूँँ हैरान-ओ-परेशान अर्जुन कुरूक्षेत्र में चीख़ता फिर रहा है मगर आज की महा-भारत में इन सवालों का जवाब देने वाला कोई कृष्न नहीं कोई कृष्न नहीं

Ghazanfar

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