nazmKuch Alfaaz

बिन-लादेन तोरा-बोरा में होता तो ऐसी महशरी मार जिस से पहाड़ सुर्मा बन गए ज़मीन राख हो गई आसमान सियाह पड़ गया कब का ख़त्म हो चुका होता मगर कुर्रा-ए-अर्ज़ पर जगह जगह हैबतनाक आतिशीं फुन्कारें कर्बनाक दिल-दोज़ चीख़ें इस हक़ीक़त की ग़म्माज़ हैं कि बिन-लादेन मिरा नहीं ज़िंदा है ये फुन्कारें और चीख़ें इस बात की भी दलील हैं कि लादेन तोरा-बोरा के अलावा दूसरे ख़ित्तों में भी मौजूद है सवाल ये है कि लादेन ख़त्म क्यूँँ नहीं हुआ क्या वो वाक़ई इतना ज़बरदस्त है कि सारे जहान की मजमूई ताक़त भी उस के आगे हेच है क्या उस ने आब-ए-हयात पी ली है कि कभी मर नहीं सकता क्या वो क़फ़स बिन गया है कि अपनी ख़ाकिस्तर से फिर पैदा हो जाता है क्या वो शुद सिकंदरी है कि याजूज-माजूज की ज़बानें उसे पूरी तरह चाट नहीं पातीं क्या वो रावन है कि उस का एक सर अफ़्ग़ानिस्तान में तो बाक़ी नौ दूसरे जहाँ में और क्या उस ने कोई वरदान पा लिया है कि सर कट कर फिर धड़ से आ लगता है क्या वो भीषम-पितामह है कि अपनी अच्छा के बग़ैर मर नहीं सकता क्या उस ने अपना क्लोन बना लिया है कि उस का ख़ात्मा ना-मुम्किन हो गया है सवाल ये भी है कि मीज़ाईलों का निशाना चूक क्यूँँ जाता है क्या उन के पुर्ज़े ढीले हैं कि वो अपना तवाज़ुन खो बैठती हैं बे-सम्ती का शिकार हो जाती हैं क्या वो अंधी हैं कि बिन-लादेन को देख नहीं पातीं क्या उन की बीनाई कमज़ोर है कि वो लादेन और ग़ैर-लादेन में तमीज़ नहीं कर पातीं बिन लादेन कोई सच तो नहीं कि शकुनी की चाल उस के आगे नाकाम हो जाए वो लाक्षा गिरह से बच कर निकल जाए अज्ञात-बास से वापस आ जाए उस का चीर-हरन न हो सके तीरों की शय्या पर ज़िंदा रह जाए कहीं ऐसा तो नहीं कि मिज़ाईलें उसे मारना ही नहीं चाहतीं अगर ऐसा है तो ये महशरी मार किस के लिए ये मुसलसल यलग़ार क्यूँँ हैरान-ओ-परेशान अर्जुन कुरूक्षेत्र में चीख़ता फिर रहा है मगर आज की महा-भारत में इन सवालों का जवाब देने वाला कोई कृष्न नहीं कोई कृष्न नहीं

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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"तारीख़ क्या है" सुब्ह रौशन थी और गर्मियों के थका देने वाले दिनों में सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नेहरों में गोते लगाते अपने चेहरे पे कीचड़ लगा कर डराते थे एक दूसरे को किनारो पे बैठे हुए हम ने जो अहद एक दूसरे से लिए थे उस के धुंधले से नक़्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक़्श हैं ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार कर के हमारी तरफ़ भेजता था और हम साया-ए-कुफ्र में एक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थे उस का चेहरा कभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हो सका, उस का चेहरा अगर मेरी आँखों से हटता तो मैं काएनात में फैले हुए उन मज़ाहिर की तफीम नज़्मों में करता, कि जिस पर बज़िद ने ये बीमार जिन्न को ख़ुद अपनी तमन्नों की आत्माओं ने इतना डराया के इनको हवस के कफ़स में मोहब्बत की किरणों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उस सेे परे हो गए इन के बस में नहीं कि ये महसूस करते इक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स, जिस सेे इनकार कर कर के इन के बदन खुरदरे हो गए एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की इक किस्त को अगले दिन पर नहीं टाल सकते, ख़ुदा और मोहब्बत पे रायज़नी करते थकते नहीं और इस पर भी ये चाहते हैं कि मैं इन की मर्ज़ी की नज़्में कहूँ जिन में इन की तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़के हैरान हो जिस को ये इल्म कहते हैं, उस इल्म की बात हो, फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साय, समाज, अक़ीदा, ज़बान, माशी मशावात, इंसान के रंग-ओ-आदातों अतवार, ईजाद तकलीद, अम्ल इंतशार, नैनन की अज़मद के क़िस्से, खितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुलहनामा लिए तेज़ रफ़्तार, घोड़ों पे सह में सिपाही, नज़रिया-ए-समावात के काट ने क्या कहा? और उस के जुराबों के फ़ीतों की डिब्बीयाँ, किमीयाँ के ख़जानों का मुँह खोलने वाला बाबल कौन था जिस ने पारे को पत्थर में ढाला और हरशल की आँखें जो बस आसमानों पे रहती, क्या वो इग्लेंड का मोसिन नहीं समुंदर की तक्सीर और एटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ क़श्तियो जैसी क्यूँ हैं? और राफेल के हाथ पर मिट्टी कैसे लगी? ये सवाल और ये सारी बातें मेरे किस काम की पिछले दस साल से उस की आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका, और ये पूछते हैं कि हेगल के नज़दीक तारीख़ क्या है?

Tehzeeb Hafi

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कल तलक जो धरती पर सर-बुलंद परचम था आफ़्ताब की सूरत रंग जिस के चेहरे का दूर तक चमकता था आज उस से लिपटी हैं टिड्डियाँ हवाओं की सुर्ख़ियों के शोलों को ले रही हैं नर्ग़े में बदलियाँ फ़ज़ाओं की 'मार्क्स'-जी के पुतले पर बैठा काला कव्वा एक बीट करने वाला है पास ही में नारा एक इंक़लाब ज़िंदाबाद गूँजता है रह रह कर

Ghazanfar

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भूक से भरी आँखें आसमान की जानिब तक रही हैं धरती से इक हसीन रॉकेट को जिस के सुर्ख़ परचम पर बालियाँ हैं गंदुम की भूक से भरी आँखें जानती नहीं लेकिन बालियाँ तो गेहूँ की ख़ुशनुमा बहाने हैं चमचमाते ख़ोशों में ज़हर-नाक दाने हैं सुर्ख़ सुर्ख़ दानों में एटमी बलाएँ हैं जाँ-गुसिल दवाएँ हैं

Ghazanfar

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मैं इक मासूम शहरी था शराफ़त से सभी के साथ रहता था मोहज़्ज़ब तौर से जीता था सब के काम आता था कभी मैं ने किसी का दिल नहीं तोड़ा किसी का सर नहीं फोड़ा किसी तरकश से कोई तीर क्या तिनका नहीं छोड़ा किसी की पीठ में ख़ंजर नहीं भोंका किसी के जिस्म पर बारूद का गोला नहीं फेंका किसी को आग में मैं ने नहीं झोंका किसी का हक़ नहीं मारा किसी का ज़र नहीं लूटा कोई ख़िर्मन नहीं फूँका किसी बिल्डिंग किसी गाड़ी किसी महफ़िल में कोई बम नहीं रक्खा मिरे हाथों किसी का घर नहीं उजड़ा किसी का दर नहीं उखड़ा कोई कुम्बा नहीं बिखरा कोई माथा नहीं सिकुड़ा किसी की राह में रोड़ा नहीं अटका किसी के काम में मैं ने कभी रख़्ना नहीं डाला किसी के वास्ते दिल में कभी कीना नहीं पाला कोई फ़रमान हाकिम का कभी मैं ने नहीं टाला कोई घेरा नहीं लाँघा कोई आँगन नहीं फाँदा मगर फिर भी क़यामत मुझ पे टूटी है अजब ग़ारत-गरी का क़हर बरसा है अजब सफ़्फ़ाक ख़ंजर दिल में उतरा है कि मेरी रूह अब तक तिलमिलाती है कि मेरा ज़ेहन अब भी झुनझुनाता है कि मेरी साँस अब भी लड़खड़ाती है समझ में कुछ नहीं आता कि मैं ने क्या बिगाड़ा है मिरे किस जुर्म की मुझ को मिली है ये सज़ा आख़िर ये गुत्थी किस तरह खोलूँ सबब किस से यहाँ पूछूँ किधर जाऊँ किसे रोकूँ सभी चेहरे यहाँ पत्थर सभी आँखें यहाँ पत्थर बसारत में भरा पत्थर समा'अत में बसा पत्थर ज़बानों में गड़ा पत्थर अदालत में खड़ा पत्थर हर इक क़ानून में पत्थर हर इक आईन में पत्थर हर इक इंसाफ़ में पत्थर हर इक आवाज़ में पत्थर हर इक एहसास में पत्थर ये पत्थर युग के पत्थर से भी भारी है नगीने की तरह तरशा हुआ है और हीरे की अनी की तरह उस की तेज़ नोकें हैं बहुत शफ़्फ़ाफ़ है ये और इस में इक तमद्दुन है मैं इस पत्थर से सर फोड़ूँ कि अपनी ज़िंदगी छोड़ूँ कि अपना रास्ता मोड़ूँ कि बन जाऊँ मैं ख़ुद पत्थर समझ में कुछ नहीं आता

Ghazanfar

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चैन है ख़्वाब है कहानी है माइशा मेरी ज़िंदगानी है हर तरफ़ इस से शादमानी है हर नज़ारे का रंग धानी है रंग में रूप में नज़ाकत में सब में परियों की वो तो रानी है उस की आँखों से नूर छनता है उस के होंटों पे गुल-फ़िशानी है ऐसी नाज़ुक कि पंखुड़ी भी नहीं फूल कोई वो दास्तानी है मुस्तक़िल बाम-ओ-दर महकते हैं वो मिरे घर की रात-रानी है उस की मासूम मुस्कुराहट में कुछ फ़रिश्तों की भी निशानी है नग़्मगी जिस्म-ओ-जाँ में घुल जाए ऐसी होंटों पे ख़ुश-बयानी है ऐसा गुल-कारियों में जादू है आग भी जिस के दम से पानी है हेच मख़मल है जिल्द के आगे रंग भी रश्क-ए-अर्ग़वानी है उस के तलवों के लम्स में भी अजब नशा-ए-कैफ़-ए-जावेदानी है उस से हर आँख में बसारत है उस से हर दिल में शादमानी है उस के होने से मेरे आँगन में तपिश-ए-धूप भी सुहानी है बे-ज़रर बे-ज़बान है लेकिन हर तरफ़ उस की हुक्मरानी है बाप क़ुर्बान माँ फ़िदा उस पर और नानी तो बस दीवानी है दादा दादी के दिल की धड़कन है सनी मामूँ की जान-ए-जानी है शाहिदा हों कि बेबी बाजी हूँ हर कोई उस परी की नानी है फ़ख़्र इनआ'म की चहेती है सल्लू शादाब की भी रानी है दिल महक का चहक रहा उस से लब पे सफ़िया के लन-तरानी है बिन बुलाए हमें बुलाती है वो तो गुड़िया अजब सियानी है ऐ 'ग़ज़ंफ़र' बता कि महफ़िल में क्या कोई माइशा का सानी है

Ghazanfar

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अमन का डमरू डम डम डम चैन की ढोलक ढम ढम ढम आओ बजाएँ तुम और हम झू में नाचें छम छम छम जब तक अपने दम में दम देस ये चमके चम चम चम गोली गोला और न बम आँसू आह न दर्द-ओ-अलम दहशत ख़ौफ़ न कोई ग़म ख़ुशियाँ बरसें झम झम झम झूम के गाएँ रम पम पम देस ये चमके चम चम चम गौतम की ता'बीर हैं हम ख़्वाजा की तफ़्सीर हैं हम नानक की तस्वीर हैं हम गाँधी जी की जागीर हैं हम हम से अम्न-ओ-अमाँ का दम देस ये चमके चम चम चम सुख दुख सब में साथी हम बाँटें ख़ुशियाँ बाँटें ग़म कभी न कोई आँख हो नम हम इक इक के हैं हम-दम हम से ख़ुशियों की झम झम देस ये चमके चम चम चम ऐसा कोई काम करें जग में इस को आम करें मेहनत सुब्ह-ओ-शाम करें दुनिया भर में नाम करें अपना ऊँचा हो परचम देस ये चमके चम चम चम मौला तेरा रहम-ओ-करम इस धरती पर हो हर दम रहे हमेशा मिट्टी नम फूल खिलाए हर मौसम साँसें महकें चहके दम देस ये चमके चम चम चम हर चेहरे पर फूल खिले हर माथे पर चाँद उगे आँख में इक इक दीप जले इक इक लब पर गीत सजे ढल जाए हर शाम-ए-ग़म देस ये चमके चम चम चम नफ़रत की दीवार गिरे रस्ते से बंदूक़ हटे कीना रंजिश बैर मिटे दहशत का हर शोर थमें रुक जाए ये धम धम धम देस ये चमके चम चम चम

Ghazanfar

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