भूक से भरी आँखें आसमान की जानिब तक रही हैं धरती से इक हसीन रॉकेट को जिस के सुर्ख़ परचम पर बालियाँ हैं गंदुम की भूक से भरी आँखें जानती नहीं लेकिन बालियाँ तो गेहूँ की ख़ुशनुमा बहाने हैं चमचमाते ख़ोशों में ज़हर-नाक दाने हैं सुर्ख़ सुर्ख़ दानों में एटमी बलाएँ हैं जाँ-गुसिल दवाएँ हैं
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"एक बात'" क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को उन सब बातों को जो दबी रहती हैं तुम्हारी पलकों की क़तारों में तब भी, जब लब ख़ामोश होते हैं तुम्हारे या तब, जब बस यूँँ ही मुस्कुरा देती हो मुझ सेे बात करते-करते और तब, जब होंठ तुम्हारे कुछ और ही कहते हैं और कहते कहते रुक जाया करते हैं एक बात नहीं बताई तुम्हें के तब मैं चुपके से पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को पूछ लेता हूँ हाल तुम्हारा कहता कुछ नहीं हाँ, आँखें बात करती हैं मेरी भी हज़ारों सवालात भी तुम्हारी ही तरह फिर क्यूँँ जवाब नहीं दे पातीं तुम्हारी आँखें क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को कि तुम भी पढ़ लो वो बातें जिन में होंठ ख़ामोश रहते हैं और वो सारी बातें जो अब तक नहीं कही तुम सेे या मुझे भी सिखा दो अपना आँखों से झूठ बोलने का हुनर
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा
Danish Balliavi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बिन-लादेन तोरा-बोरा में होता तो ऐसी महशरी मार जिस से पहाड़ सुर्मा बन गए ज़मीन राख हो गई आसमान सियाह पड़ गया कब का ख़त्म हो चुका होता मगर कुर्रा-ए-अर्ज़ पर जगह जगह हैबतनाक आतिशीं फुन्कारें कर्बनाक दिल-दोज़ चीख़ें इस हक़ीक़त की ग़म्माज़ हैं कि बिन-लादेन मिरा नहीं ज़िंदा है ये फुन्कारें और चीख़ें इस बात की भी दलील हैं कि लादेन तोरा-बोरा के अलावा दूसरे ख़ित्तों में भी मौजूद है सवाल ये है कि लादेन ख़त्म क्यूँँ नहीं हुआ क्या वो वाक़ई इतना ज़बरदस्त है कि सारे जहान की मजमूई ताक़त भी उस के आगे हेच है क्या उस ने आब-ए-हयात पी ली है कि कभी मर नहीं सकता क्या वो क़फ़स बिन गया है कि अपनी ख़ाकिस्तर से फिर पैदा हो जाता है क्या वो शुद सिकंदरी है कि याजूज-माजूज की ज़बानें उसे पूरी तरह चाट नहीं पातीं क्या वो रावन है कि उस का एक सर अफ़्ग़ानिस्तान में तो बाक़ी नौ दूसरे जहाँ में और क्या उस ने कोई वरदान पा लिया है कि सर कट कर फिर धड़ से आ लगता है क्या वो भीषम-पितामह है कि अपनी अच्छा के बग़ैर मर नहीं सकता क्या उस ने अपना क्लोन बना लिया है कि उस का ख़ात्मा ना-मुम्किन हो गया है सवाल ये भी है कि मीज़ाईलों का निशाना चूक क्यूँँ जाता है क्या उन के पुर्ज़े ढीले हैं कि वो अपना तवाज़ुन खो बैठती हैं बे-सम्ती का शिकार हो जाती हैं क्या वो अंधी हैं कि बिन-लादेन को देख नहीं पातीं क्या उन की बीनाई कमज़ोर है कि वो लादेन और ग़ैर-लादेन में तमीज़ नहीं कर पातीं बिन लादेन कोई सच तो नहीं कि शकुनी की चाल उस के आगे नाकाम हो जाए वो लाक्षा गिरह से बच कर निकल जाए अज्ञात-बास से वापस आ जाए उस का चीर-हरन न हो सके तीरों की शय्या पर ज़िंदा रह जाए कहीं ऐसा तो नहीं कि मिज़ाईलें उसे मारना ही नहीं चाहतीं अगर ऐसा है तो ये महशरी मार किस के लिए ये मुसलसल यलग़ार क्यूँँ हैरान-ओ-परेशान अर्जुन कुरूक्षेत्र में चीख़ता फिर रहा है मगर आज की महा-भारत में इन सवालों का जवाब देने वाला कोई कृष्न नहीं कोई कृष्न नहीं
Ghazanfar
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दिलों में हमारे मोहब्बत जगा दे रग-ओ-पै से नफ़रत का जज़्बा मिटा दे ख़ुदाया सबक़ एकता का पढ़ा दे हमें आज फिर भाई भाई बना दे कि आसान हो जाए जीना हमारा निगाहों में चमके सुकूँ का सितारा हर इक सम्त में आज हलचल मची है कहीं बेकली है कहीं खलबली है कहीं आग दीवार-ओ-दर में लगी है किसी घर की बुनियाद में थरथरी है हुआ है सुकूँ का समाँ पारा-पारा शरारत का सुलगा हुआ है शरारा शरारत के शो'लों को कोई बुझाए जुनूनी दिमाग़ों को अंकुश लगाए अहिंसा की पोथी कोई फिर पढ़ाए तशद्दुद के हाथों से हम को बचाए जलाए न अब कोई बस्ती दोबारा न छीने कोई ज़िंदगी का सहारा हमें फिर ये एहसास कोई दिलाए कोई ठीक से ये हक़ीक़त बताए नहीं फ़र्क़ रंगों में कुछ भी दिखाए लहू एक का दूसरे से मिलाए दिखाए कि दोनों का है एक धारा बताए कि दोनों का है इक नज़ारा
Ghazanfar
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कल तलक जो धरती पर सर-बुलंद परचम था आफ़्ताब की सूरत रंग जिस के चेहरे का दूर तक चमकता था आज उस से लिपटी हैं टिड्डियाँ हवाओं की सुर्ख़ियों के शोलों को ले रही हैं नर्ग़े में बदलियाँ फ़ज़ाओं की 'मार्क्स'-जी के पुतले पर बैठा काला कव्वा एक बीट करने वाला है पास ही में नारा एक इंक़लाब ज़िंदाबाद गूँजता है रह रह कर
Ghazanfar
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चैन है ख़्वाब है कहानी है माइशा मेरी ज़िंदगानी है हर तरफ़ इस से शादमानी है हर नज़ारे का रंग धानी है रंग में रूप में नज़ाकत में सब में परियों की वो तो रानी है उस की आँखों से नूर छनता है उस के होंटों पे गुल-फ़िशानी है ऐसी नाज़ुक कि पंखुड़ी भी नहीं फूल कोई वो दास्तानी है मुस्तक़िल बाम-ओ-दर महकते हैं वो मिरे घर की रात-रानी है उस की मासूम मुस्कुराहट में कुछ फ़रिश्तों की भी निशानी है नग़्मगी जिस्म-ओ-जाँ में घुल जाए ऐसी होंटों पे ख़ुश-बयानी है ऐसा गुल-कारियों में जादू है आग भी जिस के दम से पानी है हेच मख़मल है जिल्द के आगे रंग भी रश्क-ए-अर्ग़वानी है उस के तलवों के लम्स में भी अजब नशा-ए-कैफ़-ए-जावेदानी है उस से हर आँख में बसारत है उस से हर दिल में शादमानी है उस के होने से मेरे आँगन में तपिश-ए-धूप भी सुहानी है बे-ज़रर बे-ज़बान है लेकिन हर तरफ़ उस की हुक्मरानी है बाप क़ुर्बान माँ फ़िदा उस पर और नानी तो बस दीवानी है दादा दादी के दिल की धड़कन है सनी मामूँ की जान-ए-जानी है शाहिदा हों कि बेबी बाजी हूँ हर कोई उस परी की नानी है फ़ख़्र इनआ'म की चहेती है सल्लू शादाब की भी रानी है दिल महक का चहक रहा उस से लब पे सफ़िया के लन-तरानी है बिन बुलाए हमें बुलाती है वो तो गुड़िया अजब सियानी है ऐ 'ग़ज़ंफ़र' बता कि महफ़िल में क्या कोई माइशा का सानी है
Ghazanfar
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कभी ये भी ख़्वाहिश परेशान करती है मुझ को कि मैं अपने भीतर के मैं को निकालूँ मगर मेरे मैं की तो सूरत बहुत ही बुरी है ख़बासत का अम्बार जिस में निहाँ है सराफ़ा से जिस की कराहत अयाँ है जबीं पर ख़तरनाक सोचों के जंगल उगे हैं भयानक इरादों के वहशी छुपे हैं निगाहों में जिस की हवसनाकियों के मनाज़िर भरे हैं मनाज़िर भी ऐसे कि जिन में ज़िना ऐसे लोगों के हमराह करने को सोचा गया है बदन जिन के जिंसी बुलूग़त को पहुँचे नहीं हैं या वो जो बुलूग़त की सारी कशिश खो चुके हैं या वो जिन से कोई मुक़द्दस सा रिश्ता जुड़ा है मिरे मैं की सूरत बुरी है कि दंदाँ दरिंदों की सूरत किसी सह में सिमटे कुँवारे बदन में गड़े हैं कि मातम-कदे में भी आँखें किसी जिस्म की बुर्जियों पर टिकी हैं कि बीवी बग़ल में मगर ज़ेहन में और ही कोई तन-मन खिला है कि पगली भिकारन के तन और अंधे भिकारी के कश्कोल पर भी नज़र है बुरी है बहुत ही बुरी है कि दिल में अइज़्ज़ा की अम्वात की ख़्वाहिशें भी दबी हैं कई बे-गुनह गर्दनें उँगलियों में फँसी हैं कि लफ़्ज़-ए-अयादत में बीमार की मौत की भी दुआ है बुरी है बुरी है कि अहबाब की जीत पर दिल दुखी है कि औलाद की बरतरी से चुभन है कि भाई के रौशन जहाँ से जबीं पर शिकन है बुरी है बुरी है कि जो पालता है उसी की नफ़ी है कि जो पूजता है उसी से दग़ा है अजब ऊबड़-खाबड़ सी मैं की ज़मीं है कि उस में कहीं भी तवाज़ुन नहीं है किसी भी तरह का तनासुब नहीं है जहाँ चाहिए हौसला बुज़दिली है जहाँ रास्ती की ज़रूरत कजी है जहाँ चाहिए अमन ग़ारत-गरी है जहाँ चाहिए क़ुर्ब वाँ फ़ासला है जहाँ सुल्ह-ए-कुल चाहिए गर्मियाँ सर्दियाँ हैं अगर मेरे मैं की ये सूरत मिरे ख़ोल की बाहर सत्ह पर आ गई तो ज़माना मुझे क्या कहेगा यही सोच कर अपनी इस आरज़ू के बदन में तबर भौंक देता हूँ अक्सर मगर ये तमन्ना कि मैं अपने भीतर के मैं को निकालूँ मिरे दिल में रह रह के क्यूँँ जागती है सबब उस का ये तो नहीं है कि मैं अपने अंदर की शफ़्फ़ाफ़ मकरूह सूरत दिखा कर ज़माने की आँखों में ख़ुद को बड़ा देखना चाहता हूँ या ये कि मुसलसल शराफ़त के नाटक से तंग आ चुका हूँ या फिर ये कि अब बाहरी शक्ल-ओ-सूरत में मेरी कशिश कोई बाक़ी नहीं है
Ghazanfar
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